गुरुवार, 28 फ़रवरी 2008

साहित्य सृजन- फरवरी 2008

मेरी बात

रूप सिंह चन्देल

हाशिये पर अनुवादक

अनुवाद के माध्यम से हम विश्व साहित्य से जुड़ते हैं । किसी भी भाषा-साहित्य की समृद्धता के लिए अन्य भाषाओं के साहित्य का अनुवाद आवश्यक है । इससे पाठक और साहित्यकार दोनों ही लाभान्वित होते हैं । यद्यपि विश्व का लगभग समस्त उत्कृष्ट साहित्य अंग्रेजी में उपलब्ध है लेकिन कितने ऐसे पाठक हैं जो अंग्रेजी में उसे पढ़ते हैं ? पाठक ही क्यों लेखक भी । अनेक अनुवादकों ने विश्व-साहित्य का इतना उत्कृष्ट अनुवाद प्रस्तुत किया कि पाठकों को, यहां तक कि उस भाषा को जानने वाले विद्वानों जिससे उस रचना का अनुवाद किया गया, यह अनुभव ही नहीं हुआ कि वे मूल नहीं अनुवाद पढ़ रहे थे । उदाहरण के लिए कथाकार स्व. अमृतराय द्वारा किए गए अनुवाद ('आदिविद्रोही' और 'अग्निदीक्षा')। स्पष्ट है कि अनुवाद दो भाषाओं के मध्य 'सेतु' का कार्य करता है । यह दायित्वपूर्ण और गंभीर कार्य होता है और उसके लिए चुनौती पूर्ण भी । अत: उसका महत्व किसी रचनाकार से कम नहीं होता । लेकिन हिन्दी में विगत कुछ समय से अनुवादक को हाशिए पर डाला जा रहा है – दूसरे शब्दों में उसकी उपेक्षा की जा रही है ।
उदाहरणार्थ पंजाबी सहित अनेक भारतीय भाषाओं के वरिष्ठ रचनाकारों की रचनाओं के साथ उनके अनुवादकों के नाम प्रकाशित नहीं होते । अनुवादक ही वह प्राणी था जिसने अमृता प्रीतम, कर्तारसिंह दुग्गल, अजित कौर आदि रचनाकारों को हिन्दी पाठकों से परिचित करवाया था । जिनके माध्यम से ये रचनाकार अपनी मूल भाषा से अधिक हिन्दी में चर्चित और समादृत हुए। अतंत: अपनी रचनाओं में उनके नामोल्लेख को अनावश्यक मानने लगे । ऐसा क्यों हुआ ? शायद रचनाकार जब हिन्दी में प्रकाशित होकर बहुचर्चित हो जाता है, अनुवादक को महत्व देना आवश्यक नहीं मानता । इस बात के लिए किसी हद तक वे अनुवादक भी दोषी हैं जो व्यावसायिक कारणों से इन रचनाकारों के नाम प्रकाशित न करने की शर्त को स्वीकार करते हुए अनुवाद करते रहते हैं ।
अनुवादकों के नाम प्रकाशित न करने की कुप्रवृत्ति का प्रारंभ संभवत: प्रकाशकों ने अपने व्यावसायिक कारणों से प्रारंभ किया जिसने अन्य भाषाओं के लेखकों में हिन्दी लेखक की पहचान पाने की दबी-छुपी आकांक्षा को उभारा । इसका परिणाम यह हुआ कि आज दूसरी भाषाओं के अनेक ऐसे रचनाकार हैं जिन्हें पाठक हिन्दी का रचनाकार मानते हैं । 'वातायन' फरवरी 2008 में प्रकाशित सुशील कुमार के आलेख से अनेक हिन्दी पाठकों को पहली बार यह सूचना प्राप्त हुई कि निर्मला पुतुल हिन्दी की नहीं, मूल संथाली की कवयित्री हैं ।
मुझे आज तक अंग्रेजी में अनूदित एक भी ऐसी कृति नहीं मिली जिसमें अनुवादक का नाम प्रकाशित नहीं था। स्पष्ट है कि वहां बेईमानी नहीं है और न ही उन भाषाओं के लेखकों को किसी अन्य भाषा का लेखक बन जाने की आकांक्षा । लेखक जिस भाषा में लिखता है यदि उस भाषा में लेखन उसमें हीनताबोध उत्पन्न करता है तो उसे लिखना छोड़ देना चाहिए । पंजाबी के रचनाकार बलवंत गार्गी को किसी ने कहा था कि उन्हें अंग्रजी में नहीं अपनी मातृभाषा में लिखना चाहिए और आजीवन गार्गी पंजाबी के लेखक रहे । उन्होंनें शायद यह कभी नहीं चाहा कि वह हिन्दी या अंग्रेजी में अनूदित होकर उन भाषाओं के लेखक कहलाएं । दरअसल, यह एक ऐसा विषय है जिस पर प्रकाशक (अपने व्यावसायिक हितों से ऊपर उठकर), मूल भाषा के लेखक और अनुवादक को विचार करना है, जिससे हिन्दी पाठक भ्रम की स्थिति से बच सके । किसी भी भाषा के रचनाकार की महानता से प्रभावित होकर उसकी शर्तों के समक्ष समर्पित हो जाने वाले अनुवादकों को भी यह सोचना होगा कि वे हिन्दी का कितना अहित कर रहे हैं । जिन अनुवादकों को अंधकार में रखकर रचनाकार या प्रकाशक उनका नाम न प्रकाशित करने की धृष्टता करते हैं उन्हें इस वास्तविकता को पाठकों में उद्घाटित करने का प्रयास करना चाहिए ।
अनुवाद के विषय में एक और कुप्रवृत्ति पिछले कुछ दिनों से देखने को मिल रही है । कुछ प्रकाशक कापीराइट से बाहर विश्व के महान रचनाकारों के वर्षों पूर्व प्रकाशित अनुवादों को कुछ शब्दों के परिवर्तन के साथ छद्म नामों या अपने किसी परिचित के नाम से प्रकाशित कर रहे हैं। ऐसा फ्रांसीसी, रशियन, अंग्रेजी आदि भाषाओं के साहित्य के अनुवादों के साथ अधिकाशंत: हो रहा है और ऐसा उन रचनाओं के अनुवादकों के जीवित रहते ही हो रहा है । अर्थात पूंजी का खेल जारी है और अनुवादक हाशिए पर ।
यह एक ऐसी समस्या है जिस पर विद्वान रचनाकारों, अनुवादकों और साहित्य अकादमी जैसी संस्थाओं, जो अनुवाद को प्रोत्साहन देती हैं, को गंभीरतापूर्वक विचार करना चाहिए ।

बी-3/230 , सादतपुर विस्तार ,
दिल्ली -110094
ई-मेल :roopchandel@gmail.com


हिंदी कहानी

मोबाइल
एस आर हरनोट


उसके छोटे-छोटे पांव थे। देख कर नहीं लगता था कि किसी बच्ची के होंगे। लम्बे, बेतरतीब बढ़े हुए नाखूनों से ढके उंगलियों के छोर। चमड़ी ऐसी मानो किसी नाली में कीचड़ के बीच महीनों से पड़ा पुराने जूते का चमड़ा हो। नंगे पांव जैसे ही ज़मीन पर पड़ते, बिवाईयां उधड़ने लगतीं। दर्द की टीस उठती पर भीतर ही भीतर कहीं दब कर रह जाती। उनसे खून रिसता रहता। लोगों की नजरें उन पर कम, बच्ची की अधनंगी टांगों पर ज्यादा फिसलती रहती। इससे पहले कि आखें कुछ टटोलती हुई मैली-फटी फ्राक के बीच जाए, वह झटपट कटोरा उनके मुंह के आगे कर देती-

“दे दो बाबू, दे दो… भगवान के नाम से दे दो। भला होगा।"

वह कुछ पल उनके हाव-भाव परखती। तिलों में तेल न देख कर आगे चल देती। वही सब दुहराते-गिड़गिड़ाते। किसी ने कभी एक-दो रूपए का सिक्का कटोरे में फेंक दिया तो टन्न की आवाज से उसके चेहरे पर धूप की चमक छा जाती। पथराई और उनींदी सी आंखे सहज ही भोर होने लगती। यह सिलसिला सूर्य से सूर्य तक चलता रहता। दिन भर सिक्के समेटने के चाव में उसकी भूख-प्यास उसी तरह गायब रहती जैसे उसकी देह से बचपना।

उसके हाथ का कटोरा खाली नहीं रहता। उसमें दिन-वार के हिसाब से भगवान जी बैठे रहते। सोमवार को भगवान शिवजी की मैली-सी फटी फोटो और उसके आगे धूप की जलती हुई बत्ती। इस रोज शिव सेना के कार्यकर्ता और सोमवार के व्रती लोग खूब सिक्के डाल कर पुण्य कमा लेते। शिव मन्दिर के आगे उसने कई बार बैठने का प्रयास भी किया लेकिन उधर पहले से अड्डा जमाए सीनियर भिखारी उसे भगा देते। उस वक्त अपने छोटे होने का मलाल उसे अवश्य होता।

मंगल को भगवान जी बदल जाते। शिवजी की जगह हनुमान जी ले लेते। कटोरे के ओर-छोर सिंदूर पुता रहता। इस दिन वह घूमती नहीं थी। हनुमान मन्दिर के रास्ते एक जगह डेरा जमा देती। लेकिन पूरे दिन मुश्किल से दस–बारह सिक्के भी नसीब न होते। लेकिन कटोरा प्रसाद से अवश्य भर जाया करता। कभी भाग्य में वह भी न होता। मांगते-मांगते दिन भर की थकान से अनायास जब भी उसकी आंख लगती तो हनुमान भक्त शरारती बन्दर कटोरा छीन लेते। आधा उनके पेट में तो आधा नीचे बिखर जाता। उसकी आंख जगती तो वह उन्हें भगाने-डराने की बहुत कोशिश करती पर बन्दरों पर कोई असर न होता। उल्टा जैसे उसी की खिल्ली उड़ा रहे हो। देवदार के पेड़ पर चढ़ते हुए कटोरा फेंक देते। परसाद के बीच रखे सिक्के जगह-जगह बिखर जाते। नालियों में। ढलानों पर उगी हरी घास के बीच। वह मन में रोती-विलखती उन्हें तलाशती रहती। अच्छी-खासी मशक्कत करनी पड़ती। उसके बैठने की जगह के आसपास सिंदूर पुता रहता। बाहर से आए पर्यटकों के लिए यह जगह भी श्रद्धेय हो गई थी। कई बार तो बच्ची जब वहां नहीं होती तो दो-चार सिक्के उधर फेंके रहते।

बुध और वीरवार को बच्ची का कटोरा खाली होता। उस दिन पता नहीं क्यों कोई भगवान उसमें नहीं होते। वह जगह-जगह भटकती रहती। जैसे ही कोई विदेशी पर्यटक दिखता, दौड़ती उनके पास पहुंचती। मुंह से कुछ न कहती। जानती होगी कि ‘दे दो न बाबू' से यहां काम चलने वाला नहीं। अंग्रेजी तो वह नहीं जानती। जिस अंग्रेज का पीछा पकड़ती उससे लेकर ही कुछ हटती। दिन भर यदि चार-छ: अंग्रेज भी मिल गए तो और दिनों की बनिस्बत कटोरे में अधिक धन इकट्ठा हो जाता। शाम ढलते ही वह खिलखिलाती अपनी झोंपड़ी की ओर भागती। झोंपड़ी सड़क के नीचे एक पैरापिट के बीच बनी थी। उतरते-उतरते उसका वास्ता कभी बकरी, कभी कुत्ते और कभी बच्चों से पड़ जाता। पर वह अपने में मस्त उन्हें प्यारती-दुलारती चली जाती। क्षणों में जैसे उसका बचपना लौट आया करता। उसके अम्मा-बापू भी इस कमाई से बहुत खुश हो जाते। एवज़ में उस दिन उसे खूब खाना मिल जाता।

शुक्रवार को संतोषी माता की तस्वीर कटोरे की मालिक हो जाती। कंवारी लड़कियों का पीछा बच्ची तब तक नहीं छोड़ती जब तक वह एक-आध रूपया न ले ले। शनिवार को कटोरा शनिदेव जी का हो जाता। सरसों के तेल से भरे कटोरे में एक पुराने टीन के जंग लगे टुकड़े का भगवान डोलता रहता। बच्ची को इस दिन बहुत भाग-दौड़ करनी पड़ती। असली पंडों से बचती-बचाती वह कई बार गिर भी पड़ती।

इतवार को बच्ची नहीं दिखती थी। शायद अवकाश पर रहती होगी।


आज जब वह काम पर निकली तो सड़क में पहुंचते ही उसका सामना एक चुनाव पार्टी से हो गया था। उसे यह पता नहीं था कि चुनाव का मौसम आ गया है। और दिनों की बनिस्बत हर जगह चहल-पहल हो गई थी। पार्टी ने उसे घेर लिया और कटोरे में पहले से विराजमान भगवान जी की जगह उन्होंने देवी-नुमा मुकुट पहने किसी महिला की तस्वीर सजा दी। पल भर में उसका कटोरा सिक्कों से भर गया। नए भगवान से बच्ची खूब प्रसन्न हो गई। उससे पहले कभी भी उसने उस तस्वीर को नहीं देखा था।

लेकिन दूसरे दिन उसका सामना एक दूसरी पार्टी से हो गया। उन्होंने बच्ची को खूब गालियां दीं। उसका कटोरा नीचे फेंक दिया। कटोरे में विराजमान तस्वीर को अपने पैरों तले रौंद दिया। जो कुछ सिक्के उसमें थे, उन्हें भी गिरा दिया। लेकिन एक नेता ने अपने साथियों को तत्काल समझा बुझा कर शान्त कर दिया। वह बच्ची के पास गया और उसे प्यार से दुलारा। खूब स्नेह जताया। फिर अपने झोले से एक भगवे रंग में रंगा कटोरा निकाला और उसके हाथ में पकड़ा दिया। फिर एक फोटो उसमें रख दी। कहा कि यह भगवान राम की है। बच्ची एकटक देखती रही। उसके लिए भगवान राम नए रूप में थे। रथ पर बैठे, पगड़ी बांधे, हाथ में धनुष पकड़े हुए हल्की छोटी मूछों वाले भगवान। उनके गले में लाल-हरे रंग का पट्टा था। जैसे ही फोटो कटोरे में सजी, सिक्कों की बरसात होने लगी। कई बार कटोरा भर जाता तो वह घर भाग कर उसे मां को दे आती और फिर निकल जाती। स्टिक्करनुमा धनुरधारी भगवान उसे दूसरे भगवानों से ज्यादा पावरफुल लगे थे।

अगले दिन जब इसी भगवान को कटोरे में सजा कर वह सड़क पर पहुंची तो अचानक उसका सामना पहले वाली पार्टी से हो गया। कार्यकर्ता उसके कटोरे में धनुषधारी भगवान को देख कर आग बबूले हो गए। एक-दो कार्यकर्ता जैसे ही उसकी तरफ बढ़े, दूसरी पार्टी अचानक धमक गई। फिर क्या था सभी एक दूसरे पर टूट पड़े। बच्ची जान बचा कर भाग निकली। उसकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था। उस दिन हर जगह शहर में दंगे हुए थे। बच्ची के मां-बाप ने उसे कई दिनों बाहर नहीं भेजा। लेकिन न कमाने का मलाल उन दोनों के चेहरों पर बना रहा।


चुनाव का मौसम शान्त हुआ तो एक दिन जैसे ही बच्ची अपने काम पर निकली, एक नई पार्टी से उसका सामना हो गया। उस पार्टी ने उसे प्यार से अपने पास बिठाया। घर का अता-पता पूछा और उसे वापस घर ले आए। उसके मां-बाप घर पर ही थे। उन्होंने बच्ची का सौदा अपने मोबाइल के विज्ञापन के लिए तय कर दिया। मां-बाप को एक बार ही इतने पैसे मिल गए जितने बच्ची ने आज तक की मेहनत से भी न कमाए थे। इस पर हर महीने पांच हजार और। उन्हें क्या चाहिए था।

अब बच्ची के हाथ में न कोई कटोरा होता और न कोई भगवान। न मैली फ्राक से उसका बदन ही ढका रहता। वह बिल्कुल नंगी होती। उसके नंगे बदन पर कम्पनी के नाम और मोबाइल फोन के स्टिक्कर चिपके रहते। वह दिन भर कम्पनी के बताए रास्तों पर चलती रहती। शाम होती तो कम्पनी वाले उसके बदन से अपने विज्ञापन उतार देते और वही पुरानी फ्राक पहनाकर उसे घर भेज देते।

उस मोबाइल कम्पनी ने पहाड़ों के दूर-दराज इलाकों तक पहुंचने की जद्दोजहद में अब भोले-भाले लोगों और उनके बच्चों का पुरजोर इस्तेमाल करना शुरू कर दिया था। लेकिन लोगों के पास यह सोचने का समय ही नहीं था कि यह घुसपैठ, बाजार को उनकी बहु-बेटियों के कमरों तक ले जा रही है।


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तीन ग़ज़लें
देवी नागरानी




कोई षडयंत्र रच रहा है

क्या जन्मदाता बना हुआ है

क्या राहगीरों को मिलके राहों पर

राह को घर समझ रहा है

क्या रात दिन किस ख़ुमार में है

तू तुझ को अपना भी कुछ पता है

क्या सुर्खियां जुल्म की हैं चेहरे पर

इस पे खुश होने में मज़ा है
क्या दुष्ट 'देवी' हो कोई तुमको क्या

छोड़ इस सोच में रखा है क्या
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ये सायबां है जहां, मुझको सर छुपाने दो

करम ख़ुदा का है सब पर, वो आज़माने दो.

जो दिल के तार न छेड़े थे हमने बरसों से

उन्हें तो आज अभी छेड़ कर बजाने दो.

ख़फा न तुम हो किसी से भी देखकर कांटे

कि फूल कहता है जो कुछ, उसे बताने दो.

कभी तो दर्द भुलाकर भी मुस्कराओ तुम

न दर्द के वो पुराने कभी बहाने दो.

ख़फ़ा हुई है खुशी इस क़दर भी क्यों हमसे

ग़मों का जश् ने-मुबारक हमें मनाने दो.

उदासियों को छुपाओ न दिल में तुम 'देवी'

कभी लबों को भी कुछ देर मुस्कराने दो.

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बाकी न तेरी याद की परछाइयां रहीं

बस मेरी ज़िंदगी में ये तन्हाइयां रहीं.

डोली तो मेरे ख़्वाब की उठ्ठी नहीं, मगर

यादों में गूंजती हुई शहनाइयां रहीं.

बचपन तो छोड़ आए थे, लेकिन हमारे साथ

ता- उम्र खेलती हुई अमराइयां रहीं.
चाहत, ख़ुलूस, प्यार के रिश्ते बदल गए

जज़बात में न आज वो गहराइयां रहीं.

अच्छे थे जो भी लोग वो बाक़ी नहीं रहे

'देवी' जहां में अब कहां अच्छाइयां रहीं. 0




कवयित्री परिचय-
जन्म : 11 मई 1949, कराची में।
शिक्षा : बी ए अर्ली चाइल्ड हुड, एन जे सी यू
कृतियाँ : दो ग़ज़ल संग्रह सिन्धी में तथा एक ग़ज़ल संग्रह हिन्दी में प्रकाशित।
संप्रति : शिक्षिका, न्यू जर्सी, यू एस ए।
ई-मेल : devi1941@yahoo.com


दो लघुकथाएं
अशोक भाटिया

कपों की कहानी

आज फिर ऐसा ही हुआ। वह चाय बनाने रसोई में गया तो उसे फिर वही बात याद आ गई। उसे फिर चुभन हुई कि उसने ऐसा क्यों किया।
दरअसल उसके घर की सीवरेज पाइप कुछ दिन से रुकी हुई थी। आप जानते हैं कि ऐसी स्थिति में व्यक्ति घर में सहज रूप में नहीं रह पाता। यह आप भी मानेंगे कि यदि जमादार न होते, तो हम सचमुच नरक में रह रहे होते। ख़ैर ! दो जमादार जब सीवरेज खोलने के लिए आ गए, तो उसकी सांस में सांस आयी। वे दोनों पहले भी इसी काम के लिए आ चुके हैं। एक आदमी थक जाता, तो दूसरा बांस लगाने लगता। कितना मुश्किल काम है! वह कुछ देर पास खड़ा रहा, फिर दुर्गन्ध के मारे भीतर चला गया। सोचने लगा कि इनके प्रति सवर्णों का व्यवहार आज भी कहीं-कहीं ही समानता भरा दिखता है। नहीं तो अधिकतर अमानवीय व्यवहार ही होता है। इतिहास तो जातिवादी व्यवस्था का गवाह है ही, आज भी हम सवर्ण इनके प्रति नफरत दिखाकर ही अपने में गर्व अनुभव करते हैं। यह संकीर्णता नहीं तो और क्या है? उसके मन में ऐसा बहुत कुछ उमड़ रहा था कि बाहर से आवाज़ आयी- “बाबूजी, आकर देख लो।" वह उत्साह से बाहर गया। पाइप साफ हो चुकी थी।
“बोलो, पानी या फिर चाय,” उसने पूछा।
“पहले साबुन से हाथ धुला दो,” वे बोले। शायद, वे उसकी उदारता को जानते थे। वह उनके प्रति अपनी उदारता को याद कर खुश होने लगा। हाथ धुलवाते हुए उसने जान-बूझकर दोनों के हाथों को स्पर्श किया ताकि उन पर उसकी उदारता का सिक्का जमने में कोई कसर न रह जाए। पैसे तो पूर देगा ही, पर लगे हाथ एक अवसर मिल गया। बोला- “एक बार साबुन लगाने से हाथों की बदबू नहीं जाती। रसोई की नाली रुकी थी तो मैंने कल हाथ से गंद निकाला था। उसके बाद तीन बार हाथ धोये, तब जाकर बदबू गई।"
“बाबूजी, हमारा तो रोज़ का यही काम है। थोड़ी चाय पिला दो।"
वह यही सुनना चाहता था। यह तो मामूली बात है। इनके प्रति हमारे पूर्वजों द्वारा किए अन्याय से प्रायश्चित के रूप में हमें बहुत कुछ करना चाहिए। लेकिन क्या? यह वह नहीं सोच पाया। वह रसोई में बड़े उत्साह के साथ चाय बनाने में जुट गया। चाय का सामान डालकर उसने तीन कप निकाले। एक कप बड़ा लिया और दो कप छोटे। फिर सोचा, यह भेदभाव ठीक नहीं। उन्हें चाय की ज़रूरत मुझसे ज्यादा है। सोचकर उसने तीनों कप एक-से उठाये। ऐसे और कई कप रखे थे लेकिन उसने एक कप साबुत लिया और दो ऐसे लिए जिनमें क्रैक पड़े हुए थे। उधर चाय में उफान आया, तो उसने फौरन आंच धीमी कर दी।

बेपर्दा

नज़मा आज सुबह तक लियाकत अली की पहली बीवी थी। वह तमाम वक्त शौहर के हुक्म की तामील करती रही थी। उसने भी रिवायत के मुताबिक नज़मा को पैरों की जूती बनाकर रखा था।
लेकिन आज न जाने क्यों लियाकत ने “तलाक, तलाक, तलाक” कहकर नज़मा पर क़हर बरसा दिया। नज़मा ने कहा, “खुदा के वास्ते ऐसा न करो।"
लियाकत बोला, “अब तुम जहाँ चाहो, जा सकती हो।"
नज़मा पढ़ी-लिखी थी। वह भावना में बहकर बोली, “सुनो, तुम्हारे बिना मैं नहीं रह सकती।"
“बेगैरत, हमारी रवायत में आज तक किसी ने अपने शौहर से ऐसे लफ्ज नहीं कहे। मेरी तरफ से चाहे तुम ज़हन्नुम में जाओ।"
यह सुनकर नज़मा के दिलो-दिमाग में आँधियाँ चलने लगीं। पलभर में बहुत कुछ नेस्तोनाबूद हो गया। उसने कहा, “जो सुख मैंने तुम्हें दिया है, उसके बदले क्या यह ज़हन्नुम ही मुझे मिलेगा?” लियाकत फुंकार भरकर बोला, “कमबख़्त, बदजात कहीं की! मेहर की रकम मैंने तुम्हें किसलिए दी थी?”
“तुमने तो पहली रात मुझे अपने तन-मन में बसाने का वादा भी किया था। वो क्या हुआ?”
“देखो, हमारे यहाँ एक अच्छी बीवी हमेशा अपने शौहर का हुक्म मानती है। औरत को एक औरत से ज्यादा होना शोभा नहीं देता।"
नज़मा तीखी हो गई, “ये फतवे पुराने हो चुके हैं। मेरा क्या दिल नहीं, कोई तमन्ना नहीं जो तुम…”
लियाकत ने बीच में टोक दिया, “जबान सम्हालो, वरना तुम्हें ज़हन्नुम में भी जगह नहीं मिलेगी।"
नज़मा ने उठते हुए कहा, “ज़हन्नुम में मैं और रहना भी नहीं चाहती।"
वह बेटों का हाथ थामकर उठी और बोली, “चलो बेटा, तुम्हारा बाप मर चुका है।" कहकर दहलीज लाँघ गई।
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भाषांतर
धारावाहिक रूसी उपन्यास(किस्त-1)

हाजी मुराद
लियो तोलस्तोय
हिन्दी अनुवाद : रूपसिंह चंदेल

‘हाजी मुराद' लियो तोलस्तोय द्वारा उम्र के आखि़री दौर में लिखा गया ऐतिहासिक उपन्यास है। यह एक ऐसी उत्कृष्ट कृति है, जो उनके जीवनकाल में प्रकाशित नहीं हुई थी या जिसकी पर्याप्त चर्चा नहीं हो सकी थी। इस उपन्यास का नायक वास्तविक जीवन से लिया गया है, जो तत्कालीन इतिहास का अति महत्वपूर्ण व्यक्तित्व है। वह काकेशस प्रांत के क़बीलाई फौजों का जनरल था, जिसने उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में रूसी प्रभुसत्ता का प्रतिरोध किया था, लेकिन वह चेचेन्या के शासक शमील का भी विरोधी था और उससे प्रतिशोध लेने के लिए उसने रूसियों के समक्ष आत्मसमर्पण किया था। हाजी मुराद के माध्यम से तोलस्तोय ने चेचेन्या समस्या का गंभीर अध्ययन प्रस्तुत किया है।

‘हाजी मुराद' का हिन्दी अनुवाद वरिष्ठ कथाकार रूपसिंह चन्देल ने किया है और पहली बार यह उपन्यास ‘संवाद प्रकाशन' आई.-499, शास्त्रीनगर, मेरठ-250004 (उ प्र) से प्रकाशित हुआ है। “साहित्य सृजन” के इस अंक से हम इस उपन्यास का धारावाहिक प्रकाशन प्रारंभ कर रहे हैं। प्रस्तुत है- “हाजी मुराद” की पहली किस्त…

हाजी मुराद की भूमिका

मध्य गर्मियों का दिन था, मैं खेतों के रास्ते घर जा रहा था । खेतो में घास मौजूद थी और राई कटने के लिए तैयार थी । वर्ष के इन दिनों में खिले फूलों का चुनाव अदभुत था । लाल-सफेद-गुलाबी, सुगन्धित और रोंयेदार तिपतिया; दूध जैसे सफेद पर केन्द्र में चमकीले, पीले एवं मधु-कटु गन्ध वाले अक्षिपुष्प; मधुर सुगन्धि फैलाती पीली जंगली सरसों; लंबे, गुलाबी और सफेद धतूरे के घण्टाकार फूल; मोठ की चढ़ती बेलें; पीले, लाल और गुलाबी खुजलीमार पौधे; शान्त- गम्भीर बैंजनी कदली, जो नीचे पीली होने का सन्देह देती है और जिसमें से एक तीखी सुवास फूटती है; चमकीली नीली अनाज बूटियॉं जो सन्ध्या होने पर अरुणिम हो जाती हैं तथा बादामी गंध वाली कोमल वल्लरियॉं खिली हुईं थीं।
मैंने अलग-अलग फूलों के बडे़-बड़े गुच्छ तोड़ लिए थे और मैं घर की ओर बढ़ रहा था। तभी मैंने खाईं में उगा और पूरी तरह खिला बैंजनी गोखरू का एक शानदार पौधा देखा। इसे हम ‘तातार' कहते हैं। यह कभी दरांती से काटा नहीं जाता और यदि कभी संयोग से कट भी जाये तो घसियारे अपने हाथों को इसके कांटों से बचाने के लिए इसे घास में बीन कर फेंक देते हैं। मैंने सोचा, मैं इस कंटीले फूल को उठा लूं और इसे अपने फूलों के गुच्छे के बीच रख लूं। बस, मैं खाईं में उतर गया। एक झबरा-सा भौंरा तृप्त होकर फूल के बीच गहरी नींद में सोया पड़ा था। पहले मैंने उसे वहॉं से भगाया। अब मैंने फूल तोड़ने का प्रयत्न किया। लेकिन यह दुष्कर सिद्ध हुआ, क्योंकि डंठल कांटों से भरा हुआ था। मैंने अपने हाथ पर रूमाल लपेट लिया था, लेकिन वे रूमाल को बेध गये। डंठल भयंकर रूप से इतनी मजबूत थी कि मैं पॉंच मिनट तक उससे जूझता रहा और उसके रेशों को एक-एक करके तोड़ता रहा। अंतत: जब मैं फूल तोड़ने में सफल हुआ, तब डण्ठल फूटकर छितर चुकी थी। यह फूल भी उतना ताजा और सुन्दर प्रतीत नहीं हुआ। उसका रुक्ष स्थूल स्वरूप गुच्छे के दूसरे फूलों से मेल नहीं खा रहा था। मुझे पश्चाताप हुआ कि मैंनें एक फूल को खराब कर दिया, जो अपनी जगह खिला हुआ ही सुन्दर था। मैंने उसे फेक दिया। ‘‘कितनी ऊर्जा और जीवन-शक्ति!" अपने उस प्रयास को याद करते हुए मैंने सोचा, जो मैंने उसे तोड़ने में किया था। ‘‘कैसी निराशोन्मत्तता के साथ उसने अपना जीवन बचाने के लिए संघर्ष किया और फिर कैसे प्यार के साथ स्वयं को समर्पित कर दिया था।"
मेरे घर का रास्ता ताजे जुते और परती पड़े खेतों के बीच से होकर धूल भरी काली धरती पर से ऊपर की ओर जाता था। जुती हुई जमीन एक बहुत विस्तृत धर्मशुल्क भूमि थी और इसके दोनों ओर और सामने जहाँ तक नजर जाती थी, बस हल से बने सीधे खांचे, जिन पर अभी हेंगा नहीं चलाया गया था, ही दीख पड़ते थे। खेतों को भलीभॉंति जोता गया था, जिससे एक भी पौधा या घास की कोई पत्ती ऊपर निकली दीख नहीं रही थी। केवल काली जमीन ही सामने थी। ‘‘मानव कितना विध्वसंक प्राणी है ! अपने जीवन निर्वाह के लिए वह किस प्रकार प्राकृतिक जीवन को ही नष्ट कर डालता है," उस जड़ काली धरती पर किसी सचेतन जीव को अनजाने ही खोजते हुए मैंने सोचा। तभी सामने मार्ग के दाहिनी ओर एक गुच्छा-सा कुछ मुझे दीख पड़ा। जब मैं निकट गया तो मैनें देखा कि यह भटकटैया (तातार) का एक गुच्छा था।
इस ‘तातार' की तीन शाखाएं थीं। एक टूट कर नीचे पड़ी हुई थी। इसका बचा हुआ भाग, कटी बांह के टुकडे़ की भॉंति पौधे से चिपका हुआ था। शेष दो में से प्रत्येक में एक फूल था। वे फूल कभी लाल रहे होगें लेकिन अब काले पड़ चुके थे। एक डंठल टूटी हुई थी। इसका ऊपर का आधा भाग अपने अंतिम छोर पर एक बदरंग फूल को लिए लटक रहा था। लेकिन इसका दूसरा हिस्सा ऊपर की ओर सीधा तना हुआ था। पूरा पौधा हल के पहिए के द्वारा कुचला जाकर विखंडित हो वक्राकार हो गया था। लेकिन वह तब भी खड़ा हुआ था, जबकि उसके शरीर का एक भाग विनष्ट हो चुका था, इसकी अंतडि़यॉं निकल आयी थीं, इसका एक हाथ और एक आँख समाप्त हो चुके थे, फिर भी वह उद्धत खड़ा दिख रहा था, इसके बावजूद कि मनुष्य ने इसके आस-पास के सहोदरों को पूरी तरह नष्ट कर दिया था। ‘‘कितनी ऊर्जा" मैंने सोचा, ‘‘मनुष्य ने सब कुछ जीतने में, घास की लाखों पत्तियों को नष्ट करने में खर्च की होगी, फिर भी यह अपराजित-सा खडा़ है।"
तभी मुझे काकेशस की एक पुरानी कहानी याद आ गयी, जिसके कुछ हिस्से को मैंने स्वयं देखा, कुछ प्रत्यक्षदर्शियों से सुना और शेष को मैंने अपनी कल्पना से पूरा किया। वही कहानी, जिस रूप में मेरी स्मृति और कल्पना में साकार हुई, यहॉं प्रस्तुत है …
-तोलस्तोय
हाजी मुराद

॥ एक ॥

1851 के नवम्बर की एक ठण्डी शाम। रूसी सीमा से लगभग पन्द्रह मील दूर चेचेन्या के एक लड़ाकू गांव मचकट में जलते हुए उपलों का तीखा धुआं उठ रहा था, जब हाजी मुराद ने वहॉं प्रवेश किया। अजान देनेवाले मुअज्जिनों का उच्च तीखा स्वर अभी-अभी रुका था और जलते उपलों की गंध से भरी शुद्ध पहाड़ी हवा में नीचे झरने के पास इकट्ठे, बहस करते पुरुषों, स्त्रियों और बच्चों की कंठ ध्वनियॉं सुनाई दे रही थीं। ये ध्वनियॉं बाड़ों में बन्द किए जा रहे पशुओं और भेड़ों के रंभाने और मिमियाने से ऊपर उठी सुनी जा सकती थीं। पशु और भेड़ें बाड़ों में वैसे ही ठूंसी जा रही थीं जैसे मधुमक्खी के छत्ते में मधुमक्खियॉं।
हाजी मुराद शमील का एक लेफ्टीनेण्ट था जो रूसियों के विरुद्ध शौर्यपूर्ण कार्यों के लिए विख्यात था। वह उसे घेर कर चलते दर्जनों मुरीदों-अनुयाइयों या शिष्यों के साथ, अपने निजी ध्वज के नीचे ही युद्धों में भाग लिया करता था। वह सिर पर टोपी पहने हुए था और उसने लबादा ओढ़ रख था। उसकी राइफल की नाल बाहर निकली दीख रही थी। अपने एक मुरीद के साथ, सड़क पर मिले ग्रामीणों के चेहरों पर अपनी सतर्क काली, तेज आँखों से एक सरसरी दृष्टि डालता हुआ और अपनी ओर उनका ध्यान कम से कम आकर्षित करने का प्रयास करता हुआ वह आ रहा था। हाजी मुराद जब गॉंव के बीच में पहुंचा, तो चौराहे तक जाने वाली सड़क के बजाय वह बांयीं ओर संकरी गली में मुड़ गया। गली में वह दूसरे मकान के सामने पहुंचा, जो पहाड़ी के नीचे दबा-सा दीखता था। यहॉं वह रुका और उसने चारों ओर देखा। उस मकान के आगे सायबान के नीचे कोई नहीं था, लेकिन छत पर नया पलस्तर की गई मिट्टी की चिमनी के पीछे फर का कोट पहने एक आदमी खड़ा था। हाजी मुराद ने चाबुक फटकार कर और जीभ से ट्क-ट्क की आवाज कर उसका ध्यान आकर्षित किया। रात की टोपी और फर के कोट से झिलमिलाता हुआ दिखाई देता एक पुराना वस्त्र पहने वह एक वृद्ध व्यक्ति था। उसकी धुंधली आँखों पर बरौनियाँ नहीं थीं और पलकों को खोलने के लिए वह उन्हें मिचका रहा था। हाजी मुराद ने रिवाजी ढंग से उसे ‘सलाम आलेकुम' कहा और अपना चेहरा दिखाया।
‘आलेकुम सलाम' वृद्ध ने कहा, जिससे उसके दंतहीन मसूढ़े दीखाई पड़े। हाजी मुराद को पहचानते ही वह अपने दुर्बल पैरों को घसीटते हुए चिमनी के पास पड़ी लकड़ी के तलों वाली अपनी चप्पलों तक ले गया। फिर घीमे से और सावधानीपूर्वक उसने अपनी बाहें सकुड़नों भरी मिरजई की आस्तीनों में डालीं और छत से लगी सीढ़ी से चेहरा सामने करके नीचे उतरने लगा। वृद्ध ने धूप से झुलसी दुबली-पतली गर्दन पर टिका सिर हिलाया और दंतहीन जबड़ों से निरंतर बुदबुदाता रहा। जब वह नीचे पहुंचा तब उसने विनम्रतापूर्वक हाजी मुराद के घोड़े की लगाम और दाहिनी रकाब पकड़ ली, लेकिन हाजी मुराद का मुरीद फुर्ती से घोड़े से उतरा और उसने वृद्ध का स्थान ले लिया। उसे एक ओर हटाकर उसने घोड़े से उतरने में हाजी मुराद की सहायता की। हाजी मुराद घोड़े से उतरकर हल्का-सा लंगड़ाता हुआ सायबान के नीचे आया। लगभग पन्द्रह वर्ष का एक लड़का दरवाजे से निकलकर उसकी ओर आया और अपनी छोटी चमकदार आँखों से आगन्तुक को विस्मयपूर्वक देखने लगा।

‘‘दौड़कर मस्जिद तक जा और अपने पिता को बुला ला।" वृद्ध ने उससे कहा। इसके पश्चात् उसने बत्ती जलाई और चरमराहट के साथ हाजी मुराद के लिए घर का दरवाजा खोला। जिस समय हाजी मुराद घर में प्रवेश कर रहा था पीले ब्लाउज और नीले पायजामे पर लाल गाउन पहने एक कृशकाय वृद्धा कुछ गद्दे लिए हुए अंदर के दरवाजे से आयी।

‘‘आपका आगमन सुख-शान्ति लाए," वह बोली और अतिथि के लेटने के लिए सामने की दीवार के साथ दुहरा करके गद्दे बिछाने लगी।

‘‘आपके बेटे जीवित रहें”, हाजी मुराद ने अपना लबादा, राइफल और तलवार उतारकर वृद्ध के हवाले करते हुए कहा।

वृद्ध ने सावधानीपूर्वक राइफल और तलवार गृहस्वामी के हथियारों के साथ दो बड़े प्लेटों के बीच खूंटी पर लटका दिये जो अच्छे ढंग से पलस्तर की हुई सफेदी पुती दीवार पर चमक रहे थे। हाजी मुराद ने पिस्तौल को संभालकर अपने पीछे रख लिया। वह गद्दे के पास आया। उसने अपनी ट्यूनिक उतारकर रख दी और गद्दे पर बैठ गया। वृद्ध अपनी नंगी एडि़यों पर टिककर उसके समने बैठ गया। उसने अपनी आँखे बंद कर लीं और हथेलियों को उभारते हुए हाथ ऊपर उठाये। हाजी मुराद ने भी वैसा ही किया। फिर दोनों चेहरे पर धीरे-धीरे हाथ फेरते हुए इस प्रकार सस्वर नमाज अदा करने लगे कि उनके हाथ दाढ़ी की नोक का बार-बार स्पर्श करते रहे।

‘‘ ने हबार ? (कोई समाचार)? " हाजी मुराद ने वृद्ध से पूछा।

‘‘हबार योक (कोई समाचार नहीं है)।" वृद्ध ने लाल और उदासीन आँखों से हाजी मुराद के चेहरे के बजाय उसकी छाती की ओर देखते हुए उत्तर दिया। ‘‘मैं मधुमक्खियों में गुजारा करता हूँ, और इस समय मैं अपने बेटे को देखने आया हूँ। समाचार वही जानता है।"

हाजी मुराद ने अनुमान लगाया कि वृद्ध बात नहीं करना चाहता। उसने अपना सिर हिलाया और अधिक कुछ नहीं कहा।
‘‘अच्छा समाचार नहीं है।" वृद्ध बोला, ‘‘समाचार केवल यह है कि खरगोश सदैव चिन्तित रहते हैं कि उकाबों को किस प्रकार दूर रखा जाये और उकाब उन्हे एक-एक कर झपट रहे हैं। पिछले सप्ताह रूसी कुत्तों ने मिशिको में भूसा जला डाला था। लानत है उनकी आँखों को," वृद्ध गुस्से से बुदबुदाया।
हाजी मुराद का मुरीद मजबूत लंबे डग भरता हुआ धीमे से प्रविष्ट हुआ। अपना लबादा, राइफल और तलवार उसने उतार दी जैसा कि हाजी मुराद ने किया था और उन्हे उसी खूंटी पर टांग दिया जिस पर उसके स्वामी के टांगे गये थे। केवल अपनी कटार और पिस्तौल उसने अपने पास रखी।
‘‘ वह कौन है?” मुरीद की ओर देखते हुए वृद्ध ने पूछा।
‘‘वह एल्दार है, मेरा मुरीद," हाजी मुराद ने कहा।
‘‘बिल्कुल ठीक" वृद्ध बोला और हाजी मुराद के पास गद्दे पर आसन गृहण करने के लिए उसे इशारा किया। एल्दार पैर पर पैर रखकर बैठ गया और बातें कर रहे वृद्ध के चेहरे पर अपनी बड़ी खूबसूरत आँखें स्थिर कर दीं। वृद्ध ने उन्हें बताया कि उनके योद्धाओं ने सप्ताह भर पहले दो रूसी सैनिकों को पकड़ा था। एक को मार दिया था और दूसरे को शमील के पास भेज दिया था। हाजी मुराद ने दरवाजे की ओर सरसरी दृष्टि डाली और बाहर से आने वाली आवाज पर ध्यान केन्द्रित करते हुए अन्यमनस्क भाव से वृद्ध की बात सुनी। घर के सायबान के नीचे कदमों की आहट थी। तभी दरवाजा चरमराया और गृहस्वामी ने प्रवेश किया।
गृहस्वामी, सादो, लगभग चालीस वर्ष का व्यक्ति था। उसकी दाढ़ी छोटी, नाक लंबी और आँखें उसी प्रकार काली थीं, यद्यपि उतनी चमकदार नहीं थीं, जैसी उसके पन्द्रह वर्षीय पुत्र की थीं जो उसे बुलाने गया था। वह भी अंदर आया और दरवाजे के पास बैठ गया। सादो ने अपने लकड़ी के जूते उतार दिए। बिना हजामत किए हुए ठूंठी जैसे काले बालोंवाले बड़े सिर पर से जीर्ण-शीर्ण फर की टोपी को उसने पीछे हटाया और तुरंत हाजी मुराद के सामने पाल्थी मारकर बैठ गया।
उसने उसी प्रकार आँखें बंद कर लीं, जिस प्रकार वृद्ध ने की थीं और हथेलियों को उभारते हुए हाथों को ऊपर उठाया। उसने सस्वर नमाज अदा की और बोलने से पहले चेहरे पर धीरे-धीरे अपने हाथ फेरे। फिर उसने कहा कि शमील ने हाजी मुराद को जीवित या मृत पकड़ने का आदेश भेजा था। शमील का दूत कल ही वापस गया था, और इसलिए सावधान रहना उनके लिए आवश्यक था।
‘‘मेरे घर में, जब तक मैं जीवित हूँ” सादो ने कहा, ‘‘कोई भी मेरे मित्र को नुकसान नहीं पहुँचा सकता। लेकिन बाहर के विषय में कौन जानता है ? हमें इस पर विचार करना चाहिए।"
हाजी मुराद ने एकाग्रतापूर्वक उसकी बात सुनी और सहमति में सिर हिलाया, और जैसे ही सादो ने बात समाप्त की, वह बोला -
‘‘हूँ … अब मुझे पत्र देकर एक आदमी रूसियों के पास भेजना है। मेरा मुरीद जाएगा, लेकिन उसे एक मार्ग-दर्शक की आवश्यकता है।"
‘‘मैं अपने भाई बाटा को भेजूंगा," सादो ने कहा। ‘‘बाटा को बुलाओ," उसने अपने बेटे से कहा।
लडका उत्सुकतापूर्वक अपनी टांगों को उछालता और बाहों को लहराता हुआ तेजी से घर से बाहर निकल गया। दस मिनट बाद वह गहरे ताम्बई रंग, छोटी टांगों वाले एक हृष्ट-पुष्ट चेचेन के साथ लौटा। उसने आस्तीनों पर रोंयेदार मुलायम चमड़े का पैबंद लगा चिथड़ा पीला ट्यूनिक, और लंबी काली पतलून पहन रखी थी। हाजी मुराद ने आगन्तुक को अभिवादन किया और एक भी शब्द व्यर्थ किए बिना तुरंत बोला :
‘‘क्या तुम मेरे मुरीद को रूसियों के पास ले जाओगे ?"
‘‘मैं ले जा सकता हूँ।" बाटा ने प्रसन्नतापूर्वक उत्तर दिया। ‘‘मैं कुछ भी कर सकता हूँ। कोई भी चेचेन ऐसा नहीं है जो मुझसे बढ़कर हो। कुछ लोग आते हैं और आपसे दुनिया भर के वायदे करते हैं, लेकिन करते कुछ नहीं, लेकिन मैं यह कर सकता हूँ।"
‘‘अच्छा" हाजी मुराद बोला। ‘‘इस काम के लिए तुम्हें तीन रूबल मिलेंगे।" तीन उंगलियॉं दिखाते हुए उसने कहा।
बाटा यह प्रदर्शित करता हुआ सिर हिलाता रहा कि वह समझ गया है, लेकिन उसने आगे कहा कि वह पैसा नहीं चाहता, वह केवल आदर भाव के कारण हाजी मुराद की सेवा के लिए तैयार हुआ था। पहाड़ों में सभी इस बात को जानते हैं कि हाजी मुराद ने किस प्रकार रूसी सुअरों की पिटाई की थी।"
‘‘इतना ही पर्याप्त है।" हाजी मुराद बोला, ‘‘एक रस्सी को लंबा होना चाहिए, लेकिन भाषण छोटा होना चाहिए।"
‘‘तो मैं चुप रहूंगा।" बाटा बोला।
‘‘झरने के सामने जहॉं आर्गुन मोड़ है, वहॉं जंगल में एक खुला स्थान है और वहॉं सूखी घास के दो ढेर हैं। तुम्हे उस स्थान के विषय में मालूम है ?"
‘‘ मुझे मालूम है।‘‘
‘‘मेरे तीन घुड़सवार वहॉं मेरा इंतजार कर रहे हैं।" हाजी मुराद ने कहा।
‘‘अहा।" सिर हिलाते हुए बाटा बोला।
‘‘खान महोमा को पूछना। खान-महोमा जानता है कि क्या करना है और क्या कहना है। क्या तुम उसे रूसी प्रधान, प्रिन्स, वोरोन्त्सोव के पास ले जा सकते हो ?"
‘‘मैं ले जा सकता हूँ।"
‘‘उसे ले जाओ और वापस ले आओ। ठीक ?"
‘‘बिल्कुल ठीक।"
‘‘उसे लेकर जंगल में वापस आओ। मैं वहीं हूंगा।"
‘‘मैं यह सब करूंगा," अपनी छाती पर अपने हाथों को दबाकर, उठकर खड़े होते हुए और बाहर जाते हुए बाटा ने कहा।
‘‘एक दूसरा आदमी मुझे घेखी के पास भेजना आवश्यक है," बाटा के चले जाने के बाद हाजी मुराद ने अपने मेजबान से कहा। ‘‘यह घेखी के लिए है," ट्यूनिक की एक थैली को पकड़ते हुए उसने कहना जारी रखा, लेकिन जब उसने दो महिलाओं को कमरे में प्रवेश करते हुए देखा, उसने तुरन्त हाथ बाहर निकाल लिया और रुक गया।
उनमें से एक सादो की पत्नी थी। वही दुबली-पतली अधेड़ महिला, जिसने लाकर गद्दे बिछाये थे। दूसरी लाल पायजामे पर हरे रंग का वस्त्र पहने एक युवती थी जिसके वस्त्र के वक्ष भाग में धागे से चॉंदी के सिक्के जड़े हुए थे। चॉंदी का एक रूबल उसके मांसल स्कंधस्थल के बीच लटकती मजबूत काली चोटी के अंत में लटका हुआ था। वह कठोर दिखने का प्रयास कर रही थी, लेकिन पिता और भाई की भॉंति मनकों जैसी उसकी आँखें उसके चेहरे पर झपक रही थीं। उसने आगन्तुकों की ओर नहीं देखा, लेकिन स्पष्ट रूप से वह उनकी उपस्थिति से अवगत थी।
सादो की पत्नी एक नीची गोल मेज में चाय, मक्खनवाले मालपुआ, चीज, पावरोटी और मधु लेकर आयी थी। लड़की एक कटोरा, एक सुराही और एक तौलिया लायी थी।
जब तक दोनों महिलाएं मुलायम तलों वाले जूतों से खामोश कदम रखती हुई मेहमानों के सामने सामान रखती रहीं; तब तक सादो और हाजी मुराद चुप रहे। जब तक महिलाएं कमरे में रहीं एल्दार अपनी बड़ी आँखें आड़े-तिरछे रखे पैरों पर गड़ाये पूरे समय मूर्तिवत बैठा रहा था। जब दोनों महिलाएं कमरे से बाहर चली गयीं और दरवाजे के पीछे उनके कदमों की आवाज आनी बंद हो गयी, तब एल्दार ने राहत की ठण्डी सांस ली और हाजी मुराद ने अपनी ट्यूनिक की एक थैली को पकड़ा, उसके अंदर ठुंसी एक गोली, और उसके नीचे लपेट कर रखा पत्र निकाला।
‘‘इसे मेरे बेटे तक पहुँचाना है।" पत्र दिखाते हुए वह बोला।
‘‘ और उत्तर ?" सादो ने पूछा।
‘‘तुम उसे ले लेना और उसे मुझे भेज देना।"
‘‘यह हो जाएगा,” सादो ने कहा और पत्र को अपनी ट्यूनिक की जेब में रख लिया। फिर उसने सुराही अपने हाथ में पकडा और कटोरा हाजी मुराद की ओर सरकाया। हाजी मुराद ने बाहें उघाड़ी, जिससे उनका गोरापन और मांसपेशी दिखाई दीं। उसने अपने हाथों को स्वच्छ ठण्डे पानी की धार के नीचे किया जिसे सादो सुराही से ढाल रहा था। जब हाजी मुराद ने मोटे साफ तौलिये से हाथ सुखा लिये, वह भोजन के लिए मुड़ा। एल्दार ने भी वैसा ही किया। जब वे भोजन कर रहे थे, सादो उनके सामने बैठा रहा था और उनके आगमन के लिए उसने उन्हें अनेक बार धन्यवाद कहा था। लड़का दरवाजे के पास बैठा, अपनी चमकती काली आँखों से उन पर मुस्करा रहा था मानो वह अपने पिता के शब्दों की पुष्टि कर रहा था।
यद्यपि हाजी मुराद ने चौबीस घण्टों से अधिक समय से भोजन नहीं किया था, फिर भी उसने बहुत थोड़ी ब्रेड और चीज खायी और ब्रेड पर चाकू से थोड़ा-सा मधु लगाया।
‘‘हमारा शहद अच्छा है। यह वर्ष शहद के लिए प्रसिद्ध रहा है। यह पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है, और अच्छी गुणवत्ता वाला है," वृद्ध ने कहा और यह देखकर प्रसन्न हुआ कि हाजी मुराद उसका शहद खा रहा था।
‘‘शुक्रिया," हाजी मुराद ने कहा और भोजन लेना छोड़ दिया। एल्दार अभी भी भूखा था, लेकिन अपने स्वामी की भॉंति ही वह भी मेज से हट गया और उसने हाजी मुराद की ओर कटोरा और सुराही बढ़ाया।
सादो जानता था कि हाजी मुराद को रखकर वह अपने जीवन को खतरे में डाल रहा था। जब से हाजी मुराद का शमील के साथ झगड़ा हुआ था, मृत्यु का भय दिखाकर सभी चेचेन- वासियों के लिए उसका स्वागत ममनूअ (निषिद्ध) कर दिया गया था। वह जानता था कि ग्रामीणों को किसी भी क्षण उसके घर में हाजी मुराद के मौजूद होने की जानकारी हो सकती है और वे उसके आत्मसमर्पण की मांग कर सकते हैं। लेकिन घबड़ाने के बजाय वह प्रसन्न था। वह मानता था कि यह उसका कर्तव्य है कि वह अपने मेहमान की रक्षा करे, भले ही इसके लिए उसे अपने प्राण गंवाने पड़ें। उसने इस बात से अपने को प्रसन्न और गौरवान्वित अनुभव किया कि वह एक ‘ड्यूटी कमाण्डेण्ट' की भॉंति व्यवहार कर रहा था।
‘‘जब तक आप मेरे घर में हैं और मेरा सिर मेरे कंधों पर है, कोई भी आपको नुकसान नहीं पहुँचा पायेगा," उसने पुन: हाजी मुराद से दोहराया।
हाजी मुराद ने उसकी चमकदार आँखों की ओर देखा और समझ गया कि वह सच कह रहा था।
‘‘ तुम्हे खुशी और लंबी उम्र मिले।" उसने औपचारिकतापूर्वक कहा।
सादो ने नेक शब्दों के लिए इशारे से इल्तज़ा करते हुए अपनी छाती को अपने हाथों से दबाया।
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जब हाजी मुराद ने किवाड़ बन्द किये और जलाने के लिए तैयार लकडि़यॉं अंगीठी में डालने लगा, सादो विशेषरूप से प्रसन्नचित और सजीव मन:स्थिति में कमरे से विदा हुआ और घर के पीछे की ओर परिवार के लिए बने कमरों में चला गया। महिलाएं उस खतरनाक मेहमान के विषय में बातें करतीं हुई, जो आगे के कमरे में रात बिता रहा था, अभी तक जाग रही थीं।
(क्रमश: जारी…)

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गतिविधियाँ

छठा अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी उत्सव : एक रिपोर्ट
हिन्दी का उत्सवी विमर्श

''हिन्दी में अन्य भारतीय भाषाओं के शब्दों के बढ़ते प्रयोग और समन्वय से हिन्दी और अधिक समृद्ध होगी... हिन्दी के संबंध में जो भी अभियान चलाया जाना है वह गैर सरकारी संस्थाओं की पहल से ही संभव हो सकेगा... हिन्दी के बढ़ते आयामों और वैश्विक प्रभाव को देखते हुए यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि हिन्दी अब सही मायनों में विश्व भाषा बन गई है...'' भारत के गृहराज्यमंत्री श्री श्रीप्रकाश जायसवाल की इस उद्धोषणा के साथ अक्षरम् का छठा अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी उत्सव प्रारंभ हुआ।
वैश्विक हिन्दी विमर्श और सांस्कृतिक कार्यक्रमों से सजा-धजा यह त्रिदिवसीय हिन्दी उत्सव 1 से 3 फरवरी, 2008 को नई दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर और हिन्दी भवन में भव्यता और गरिमा के साथ चला। विश्व में प्रतिवर्ष होने वाला हिन्दी का यह सबसे बड़ा अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी उत्सव देश-विदेश में चर्चा का विषय बना है। उत्सव में बड़ी संख्या में प्रवासी साहित्यकारों, हिन्दी सेवियों, हिन्दी के विदेशी विद्वानों की सक्रिय भागीदारी से इसका अन्तरराष्ट्रीय स्वरूप सामने आता है जो कि वैश्विक स्तर पर हिन्दी को प्रतिष्ठित करने के प्रयासों को निरन्तर पुष्ट कर रहा है। इस उत्सव को भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद्, साहित्य अकादमी और उत्तर प्रदेश भाषा संस्थान का विशेष सहयोग तो प्राप्त हुआ ही साथ ही अन्यान्य व्यक्तियों, संस्थानों और न्यासों ने भी हिन्दी के इस महायज्ञ में अक्षरम् को यथासंभव सहयोग-सहायता प्रदान की है।
उत्सव की उल्लेखनीय विशेषता यह रही कि इस बार एक ही समय में तीन-तीन समानान्तर आकादमिक सत्रों के आयोजन का अभिनव प्रयोग किया गया। हिन्दी से जुड़े कई नये विषयों को समाहित किया गया और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के स्वरूप में भी महत्वपूर्ण परिवर्तन किये गए ताकि उत्सव में और निखार आ सके।
भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद् के महानिदेशक पवन वर्मा, साहित्य अकादमी के अध्यक्ष डा. गोपीचन्द नारंग, उत्तर प्रदेश भाषा संस्थान के उपाध्यक्ष गोपाल चतुर्वेदी, अक्षरम् के संरक्षक डा. प्रभाकर श्रोत्रिय, डा. अशोक चक्रधर, डा. सीतेश आलोक, अंतरराष्ट्रीय हिन्दी उत्सव 2008 की आयोजन समिति के अध्यक्ष और गीतांजलि बहुभाषी समुदाय, बर्मिंघम ;ब्रिटेन के अध्यक्ष डा. कृष्ण कुमार के मार्गदर्शन में आयोजित इस हिन्दी महोत्सव में भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद् की ओर से गगनांचल के संपादक अजय गुप्ता और साहित्य अकादमी की ओर से उपसचिव ब्रजेन्द्र त्रिपाठी ने सक्रिय भागीदारी करते हुए समुचित समन्वय किया।
तीन दिन के इस उत्सव का मुख्य संयोजन अक्षरम् के संयोजक अनिल जोशी ने किया। उत्सव के समन्वय का दायित्व अक्षरम् के अध्यक्ष नरेश शांडिल्य ने संभाला और सभी अकादमिक संत्रों के संयोजन में हिन्दी के प्रखर विद्वान डॉ. विमलेश कांति वर्मा ने प्रमुख भूमिका निभाई।
उद्धाटन समारोह
'हिन्दी में अन्य भारतीय भाषाओं के शब्दों के बढ़ते प्रयोग और समन्वय से हिन्दी और अधिक समृद्ध होगी' तीन दिवसीय अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी उत्सव का उद्धाटन करते हुए माननीय गृह राज्यमंत्री श्री श्रीप्रकाश जायसवाल ने यह बात कही।
भाषाई समन्वय विषय पर आयोजित उद्धाटन सत्र में विचार रखते हुए वरिष्ठ साहित्यकार कन्हैयालाल नंदन ने कहा कि हिन्दी और उर्दू के बीच की खाई में हाल के वर्षों में काफी कमी आई है और इस दिशा में हिन्दी प्रेमियों को और अधिक प्रयास करना चाहिए। अमेरिका के टैक्सास विश्वविद्यालय के प्रो. हरमन वॉन ऑल्फन ने विभिन्न देशों के संदर्भ में पिछले 10 वर्षों में अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर हिन्दी की उपलब्धियों को महत्वपूर्ण मानते हुए भारत से बाहर के देशों में हिन्दी और उर्दू में किसी भी प्रकार के अन्तर की स्थिति से इंकार किया। महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा के कुलपति प्रो. जी. गोपीनाथन ने डॉ. रामविलास शर्मा की हिन्दी जाति की अवधारणा को अस्वीकार करते हुए कहा कि हिन्दी जाति का विस्तार अब उत्तर भारत ही नहीं दक्षिण भारत और गैर हिन्दी क्षेत्रों में भी तेजी से हो रहा है। इस अवसर पर भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद् के महानिदेशक डॉ. पवन वर्मा ने उत्सव के सफल आयोजन की शुभकामना दी, जबकि आन्ध्राप्रदेश हिन्दी अकादमी के अध्यक्ष वाई. लक्ष्मी प्रसाद ने दक्षिण के हिन्दी लेखकों को हिन्दी में समुचित स्थान देने की बात पर जोर दिया। दिल्ली विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग के प्रो. सादिक ने अनेक उदाहरणों के माध्यम से हिन्दी के धार्मिक ग्रन्थों और साहित्य के उर्दू में अनुवाद को महत्वपूर्ण माना।
भाषाई समन्वय विषय का प्रवर्तन करते हुए ब्रिटेन के गीतांजलि बहुभाषी समुदाय के अध्यक्ष डॉ. कृष्ण कुमार ने विभिन्न भारतीय भाषाओं के समन्वय की दिशा में काम करने की जरूरत पर बल दिया। उत्सव की प्रस्तावना करते हुए उत्सव के मुख्य संयोजक अनिल जोशी ने कहा कि हिन्दी के लिए अब किसी राजनैतिक आन्दोलन की नहीं एक रचनात्मक अभियान की जरुरत है, जिसके लिए समन्वयकारी सोच और प्रयासों की आवश्यकता है ताकि हिन्दी का अत्याधुनिक तकनीक जैसी चीजों से समन्वय हो सके। उत्सव का संचालन चैतन्य प्रकाश ने किया। वाणी प्रकाशन के प्रमुख अरूण माहेश्वरी इस सत्र के स्वागताध्यक्ष थे। सत्र का संयोजन डॉ. कृष्ण कुमार ने किया।

वैश्वीकरण के दौर में मीडिया
उत्सव के पहले दिन वैश्वीकरण के दौर में हिन्दी मीडिया विषय पर अपना वक्तव्य देते हुए दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष प्रो. सुधीश पचौरी ने कहा कि हिन्दी क्षेत्र को मीडिया ने अंग्रेजी के चश्मे से देखा है जो ठीक नहीं है। साथ ही उन्होंने मीडिया में हो रहे बदलावों का स्वागत भी किया। वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव ने आशंका व्यक्त करते हुए कहा कि आने वाले 20 वर्षों में हिन्दी मीडिया का अस्तित्व लगभग खत्म हो चुका होगा, जबकि माखन लाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्राकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति अच्युतानन्द मिश्र ने हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं के अखबारों में गम्भीर विमर्श के लगभग गायब रहने पर चिन्ता व्यक्त की। अपना अध्यक्षीय व्यक्त्व देते हुए डॉ. वेदप्रताप वैदिक ने अंग्रेजी के वर्चस्व का विरोध पूरी ताकत के साथ किए जाने की वकालत की। इस अवसर पर वरिष्ठ पत्रकार एवं आउट लुक के सम्पादक आलोक मेहता ने वैश्वीकरण की चुनौतियों से निपटने के सूत्र खोजने की जरूरत बताई। अजीत द्विवेदी, पंकज दूबे, संजय तिवारी आदि ने विषय पर अपने महत्वपूर्ण विचार रखे। सत्र का संयोजन एवं संचालन प्रख्यात पत्रकार ओंकारेश्वर पांडे ने किया। हिन्दी जागरण से जुड़े पत्रकार चंडीदत्त शुक्ल सत्र के सह-संयोजक थे।

दलित सन्त साहित्य
उत्सव में दलित सन्त साहित्य विषय पर आयोजित सत्र में पूर्व राज्यपाल श्री माता प्रसाद ने जहां दलित का स्वरूप प्रस्तुत करते हुए संतों का व्यापक संदर्भ दिया वहीं इष्ट देव सांकृत्यायन ने भक्ति आंदोलन के परिप्रेक्ष्य में कबीर, तुलसी आदि भक्तों-संतों का मंतव्य रखा, जबकि संतों के आर्थिक दृष्टिकोण को रखते हुए उनकी आर्थिक प्रासंगिकता तथा वैश्विक सार्थकता को रामसजन पांडेय ने उद्धाटित किया। इस सत्र की अध्यक्षता करते हुए प्रख्यात साहित्यकार डॉ. महीप सिंह ने कहा कि वेद समर्थक और वेद विरोधी दो समानान्तर चिंतन परम्पराएं मिलती हैं, लेकिन संसार में सभी धर्मों को उन धर्मों के पुरोहितों ने अपने निहित स्वार्थों के लिए दिग्भ्रमित किया है। सत्र में रमेशचन्द्र मिश्र, डा. सुनीता रानी आदि वक्ताओं ने भी अपने विचार व्यक्त किए। इस सत्र में विषय प्रवर्तन हिन्दी के प्रसिद्ध कवि-लेखक डा. बलदेव वंशी ने किया। सत्र का संचालन डा. जवाहर कर्नावट ने किया। डा. बलदेव वंशी इस सत्र के संयोजक भी थे।




रचना संसार
राजनीतिक दलों अथवा विचारधाराओं से परे हिन्दी साहित्य ही हिन्दी समाज का वास्तविक प्रतिपक्ष हैं यह बात अंतरराष्ट्रीय हिन्दी उत्सव के दूसरे दिन आयोजित 'रचना संसार' सत्र के दौरान प्रख्यात आलोचक अशोक वाजपेयी ने कही। इस अवसर पर ब्रिटेन से आए प्रवासी साहित्यकार श्री सत्येन्द्र श्रीवास्तव ने कहा कि प्रवासी लेखकों की पीड़ा भारत के लेखकों से भिन्न है और इंग्लैंड के प्रवासियों ने इस दिशा में शून्य से शुरूआत की है। समकालीन रचना संसार के संबंधा में अपना विचार व्यक्त करते हुए प्रसिद्ध आलोचक प्रो. अजय तिवारी ने कहा कि बाजारवाद के इस दौर में शिक्षा, धर्म, पुण्य सब कुछ खरीदा और बेचा जा रहा है और साहित्य भी इससे अछूता नहीं है। सत्र का विषय प्रवर्तन कथाकार डा. हरजेन्द्र चौधरी ने किया। संचालन साहित्य अकादमी के उपसचिव ब्रजेन्द्र त्रिपाठी ने किया। डा. हरजेन्द्र चौधरी सत्र के संयोजक और सुधा उपाधयाय सह-संयोजक थे।

हिन्दी और प्रौद्योगिकी
हिन्दी और प्रौद्योगिकी विषय पर आयोजित तीसरे सत्र की अध्यक्षता कर रहे प्रो. अशोक चक्रधर ने कहा कि आशा और निराशा के बीच में हिन्दी अपने विकास के लिए फड़फड़ा रही है और ज्ञान का सृजन भाषा प्रौद्योगिकी के सहयोग से होगा। ओम विकास ने बीज वक्तव्य में कहा कि हिन्दी का प्रसार अंग्रेजी की शब्दावली का प्रयोग करते हुए ही बढ़ेगा। डॉ. विजय कुमार मल्होत्रा ने कहा कि कम्प्यूटर, सूचना और नेचुरल लैंग्वेज प्रोसेसिंग को मिलाकर भाषा विकास के लिए काम करना चाहिए जबकि जयदीप कर्णिक का कहना था कि अभी हिन्दी में नौ भारतीय भाषाओं में देश का एकमात्र 'पोर्टल' वेब दुनिया है, यह स्थिति चिन्ताजनक है। सत्र में बालेन्दु दाधीच डा. एस. एस. अग्रवाल, स्वर्णलता, डा. वी.एन. शुक्ल आदि ने भी अपने विचार प्रस्तुत किए। सत्र का संयोजन व संचालन डा. कृष्ण कुमार गोस्वामी ने किया। डा. संजय सिंह बघेल ने सह-संयोजक की भूमिका निभाई।



हिन्दी ग़ज़ल और दोहा
हिन्दी ग़ज़ल और दोहा विषय पर आयोजित दूसरे सत्र में प्रख्यात ग़ज़लकार कुंअर बेचैन ने कहा कि चीजें अच्छी भी बनती हैं और बुरी भी किन्तु परिपक्वता ही रचना को कालजयी बनाती है। इस अवसर पर अपने आलेख पाठ में कमलेश भट्ट 'कमल' ने कहा कि कविता को मरने से लयात्मकता ही बचा सकती है। इस सत्र की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ साहित्यकार बालस्वरूप राही का कहना था कि विधा हमेशा अपने शिल्प के साथ आती है और शिल्प या व्याकरण को छोड़कर केवल विधा को अपनाने से रचना प्रभावशाली नहीं होती। सत्र में नरेश शांडिल्य ने बीज वक्तव्य दिया। इसके अतिरिक्त नवाब शाहाबादी, शशिकांत, हरेराम समीप ने भी अपने विचार रखे। सत्र का संयोजन व संचालन लक्ष्मीशंकर वाजपेयी ने किया।

रचनाओं और रचनाकारों पर बनी फिल्में
इस सत्र में छोटी अवधि की दो फिल्मों का प्रदर्शन किया गया। पहली फिल्म 'कालजयी मनीषा' प्रख्यात साहित्यकार स्व. रामविलास शर्मा के जीवन पर आधारित थी। इस फिल्म का लेखन-निर्देशन प्रसिद्ध कथाकार उदय प्रकाश ने किया है। दूसरी फिल्म 'कगार की आग' वरिष्ठ कथाकार हिमांशु जोशी के उपन्यास पर आधारित थी। जिसके निर्माता-निर्देशक शैलेन्द्र गोयल हैं। उल्लेखनीय बात यह रही कि स्व. डा. रामविलास शर्मा के अनुज रामशरण शर्मा 'मुंशी' इस मौके पर उपस्थित रहे और उन्होंने कुछ मार्मिक प्रसंग भी सुनाए। सत्र का संचालन व संयोजन अलका सिन्हा ने किया।

अन्तरराष्ट्रीय कवि गोष्ठी
उत्सव में होने वाले अन्तरराष्ट्रीय कवि सम्मेलन की रूपरेखा में कुछ बदलाव करते हुए पहली बार कवि सम्मेलन के अतिरिक्त 'अन्तरराष्ट्रीय कवि गोष्ठी' का आयोजन भी किया गया। कवि गोष्ठी की अध्यक्षता गगनांचल के संपादक अजय गुप्ता ने की। कवयित्री मंजू जैन, प्रवासी टुडे के संस्थापक दयाल शर्मा विशिष्ट अतिथि के रूप में विद्यमान थे। कवि गोष्ठी में देश-विदेश से लगभग 30 कवि-कवयित्रियों ने अपनी रचनाएं प्रस्तुत की। प्रवासी कवियों में जहां अजय त्रिपाठी, उषा वर्मा, विमल शर्मा, जय वर्मा आदि प्रमुख थे, वहां देश से डा. शेरजंग गर्ग, नवाब शाहाबादी, राजेश राज, गायत्री आर्य, सत्या त्रिपाठी, सुधा उपाध्याय, शशिकांत, बरखा रानी, नमिता राकेश आदि ने अपनी रचनाओं से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। इस अवसर पर डॉ. कृष्ण कुमार द्वारा संपादित पुस्तक 'सूरज की सोलह किरणें' का लोकार्पण कमला सिंघवी ने किया। प्रभात प्रकाशन से प्रकाशित इस पुस्तक में गीतांजली बहुभाषी समुदाय; बर्मिंघम, के सोलह कवि-कवयित्रियों की रचनाएं संकलित है। गोष्ठी का संचालन प्रसिद्ध ग़ज़लकार आलोक श्रीवास्तव ने और संयोजन नरेश शांडिल्य ने किया।

अनुवाद विमर्श
अनुवाद विमर्श विषय पर आयोजित सत्र की अध्यक्षता कर रहे रूस से आये वरिष्ठ साहित्यकार मदन लाल मधु ने कहा कि हिन्दी और रूसी साहित्य के अनुवादों के माध्यम से भारत और रूस के बीच मजबूत पुल बनाने में महत्वपूर्ण सहायता मिली है, जबकि मुख्य अतिथि जिलियन राइट ने अनुवाद की अनेक बारीकियों और चुनौतियों को उद्धाटित किया। केन्द्रीय अनुवाद ब्यूरो के निदेशक दंगल झाल्टे ने सरकारी क्षेत्र में हो रहे अनुवाद के महत्व को रेखांकित किया। अन्य वक्ताओं में एन.टी.पी.सी. के राजेन्द्र मिश्र, जे.एन.यू. के डॉ. रंजीत साहा, दि.वि.वि. के डा. पूरण सिंह टंडन और यूनियन धारा पत्रिका की संपादिका सुलभा कोरे ने भी अपने विचार प्रस्तुत किए। मिनी गिल और दयाशंकर पांडेय ने संवादी की भूमिका में अपने विचार रखे। कार्यक्रम का संयोजन व संचालन विनोद संदलेश ने किया।

देश में हिन्दी
'बोलियों ने ही हिन्दी को समृद्ध किया है और बोलियों को समृद्ध करना हिन्दी को ही समृद्ध करना है' यह बात 'देश में हिन्दी' विषय पर आयोजित सत्र के दौरान प्रभाकर श्रोत्रिय ने कही। अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में उन्होंने कहा कि हिन्दी के संबंध में शुद्धतावादी और स्वछंदतावादी दोनों ही दृष्टिकोणों को छोड़कर एक समन्वयवादी दृष्टिकोण को अपनाना होगा। इस सत्र में केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा के निदेशक प्रो. शम्भूनाथ ने हिन्दी शिक्षण को आधुनिक बनाने पर बल देते हुए कहा कि आधुनिक तकनीक की सहायता से ही हिन्दी से संबंधित धरोहर को सुरक्षित रखा जा सकता है। इस अवसर पर वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग के अध्यक्ष के. विजय कुमार का मानना था कि हिन्दी की वैज्ञानिक और तकनीकी कठिनाईयों के संबंध में प्रचलित धारणाएं ठीक नहीं हैं और व्यवहार में प्रयोग से इसे और आसानी से स्वीकारा जा सकेगा। दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के प्रो0 रमेश गौतम ने कहा कि अंग्रेजी और हिन्दी का बंटवारा केवल भाषिक ही नहीं आर्थिक भी है। सत्र में बीज वक्तव्य भारत भवन के प्रमुख मनोज श्रीवास्तव ने पेश किया। कवि-पत्रकार हरेन्द्र प्रताप, मानव संसाधन मंत्रालय की अपर निदेशक कुसुमवीर, साहित्य अकादमी के उपसचिव ब्रजेन्द्र त्रिपाठी ने भी अपने विचार रखे। सत्र का संचालन नरेश शांडिल्य ने किया। हिन्दी विद्वान नारायण कुमार इस सत्र के संयोजक थे। इस दौरान युवा लेखक नवरत्न पांडे के कहानी संग्रह 'चिंदी चिंदी अक्स' का लोकार्पण प्रभाकर श्रोत्रिय के हाथों सम्पन्न हुआ।

हिन्दी अध्ययन और अनुसंधान
हिन्दी अध्ययन और अनुसंधान विषय पर आयोजित सत्र में अपना बीज वक्तव्य देते हुए डॉ. विमलेश कान्ति वर्मा ने पाठय सामग्री की अनुपलब्धता के कारण विदेशी छात्रों को भारत में हिन्दी भाषा सीखने में होने वाली कठिनाईयों को चिन्ताजनक माना और विश्वभर में हिन्दी की स्वीकार्यता और अध्ययन एवं अनुसंधान के क्षेत्र में हो रही प्रगति की जानकारी दी। दूसरी तरफ गिरिराजशरण अग्रवाल ने शोध को रोजगार से जोड़ने की आवश्यकता जतायी। सत्र की अध्यक्षता कर रहे टैक्सास विश्वविद्यालय, अमेरीका के प्रो0 हरमन वान ऑल्फन ने विदेशों में हिन्दी में शोध की स्थिति की जानकारी देते हुए यह दावा किया कि एक दिन अमेरीका विश्व का सबसे बड़ा हिन्दी महाद्वीप बनेगा। सत्र में महेन्द्र वर्मा; (यू.के.), अरविन्द कुमार, डा. नवीनचन्द्र लोहानी आदि ने भी अपने विचार व्यक्त किए। सत्र का संचालन व संयोजन डा. राजेश कुमार ने किया।

तुलसी साहित्य की विश्व व्यापकता
तुलसी साहित्य की विश्व व्यापकता विषय पर आयोजित सत्र में अपना बीज वक्तव्य देते हुए प्रो0 सूर्य प्रसाद दीक्षित ने तुलसी के जन्म स्थान से जुड़ी विभिन्न भ्रान्तियों के संबंध में बहुत से उदाहरण देते हुए किसी सर्वसम्मत निर्णय तक पहुंचने पर जोर दिया। जबकि राम मूर्ति त्रिपाठी ने तुलसी की समन्वयकारी दृष्टि को उजागर करते हुए भक्ति के माध्यम से विश्वभर में इसकी लोकप्रियता को उद्धाटित किया। डॉ0 कृष्ण कुमार ने तुलसी के जन्म से जुड़े किसी भी निर्णय तक पहुंचने के लिए वैज्ञानिक तथ्यों को आधार बनाने की बात पर जोर दिया। विशिष्ट अतिथि डॉ0 सीतेश आलोक ने सम-सामयिक परिस्थितियों में रची जा रही साहित्यिक कृतियों के सामाजिक, राजनैतिक आधार को तुलसी साहित्य से जोड़कर उसकी सार्थकता को प्रकाशित किया। सभा की अध्यक्षता कर रहे लल्लन प्रसाद व्यास ने रामकृपा को आधार बनाकर रचे गए तुलसी साहित्य की व्यापकता के विभिन्न पक्षों को उजागर किया। इस अवसर पर पूर्व राजदूत डा. वीरेन्द्र ने भी अपने विचार प्रस्तुत किए। सत्र का संचालन हरजेन्द्र चौधरी ने किया। सत्या त्रिपाठी सत्र संयोजक की भूमिका में रहीं।

विदेश में हिन्दी
विदेश में हिन्दी विषय पर आयोजित सत्र में अपना बीज वक्तव्य मधु गोस्वामी ने दिया। इसके वक्ता प्रो. अश्विनी श्रीवास्तव एवं संवादी (देश) सुभाष कुमार एवं रवि टेकचन्दानी तथा संवादी (विदेश) भूदेव शर्मा, ऊषा वर्मा, बी.एम. गुप्ता, जय वर्मा, स्नेह ठाकुर और अजय त्रिपाठी थे। सत्र का संचालन डॉ. हरीश नवल द्वारा किया गया।


कारपोरेट जगत और हिन्दी
अंतिम दिन 3 फरवरी 2008 को भोजन के बाद इंडिया इंटरनेशनल सेंटर एनेक्सी में आयोजित सत्र में 'कारपोरेट जगत और हिन्दी' विषय पर चर्चा हुई। इस सत्र की अध्यक्षता कलकत्ता विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग के पूर्व अध्यक्ष, मीडिया एवं प्रौद्योगिकी से जुड़े समाज शास्त्रीय विवेचन के विशेषज्ञ डॉ. जगदीश्वर चतुर्वेदी ने की। सत्र के मुख्य अतिथि सीएनबीसी आवाज चैनल के एक्जक्यूटिव प्रोडयूसर दिलीप मंडल थे। विशिष्ट अतिथि के रूप में इंस्टीटयूट ऑफ कॉस्ट एंड वर्क्स अकाउंट्स के अध्यक्ष चन्द्र वधावा तथा पंजाब नेशनल बैंक के अंचल प्रबंधक आर.के. दूबे उपस्थित थे। सत्र के प्रारंभ में दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में रीडर डॉ. सुधा सिंह ने बीज वक्तव्य रखते हुए हिन्दी के बदलते हुए स्वरूप की व्यावहारिकता को रेखांकित करते हुए कहा कि हिन्दी जनभाषा के रूप में विकसित होने से ही बाजार के लिए उपयोगी हो सकेगी। फिक्की के व्यापार मेला निदेशक संजय गंजू ने कहा कि हिन्दी की संप्रेषणीयता को समृद्ध किये जाने की जरूरत है। वॉग कमर्शियल कंपनी के गोपाल अग्रवाल ने हिन्दी को बाजार की जरूरतों के अनुसार ढालने की आवश्यकता प्रतिपादित की। चार्टर्ड अकाउंटेंट कैलाश गोदूका ने बाजार के प्रभाव से मुक्त हिन्दी की वकालत की। मुख्य अर्थशास्त्री डॉ. हरबंस सिंह गिल ने विभागों में हिन्दी के नाम पर हो रही औपचारिकता के बजाय इसे सामान्य जन तक पहुंचाने पर जोर दिया। विशिष्ट अतिथि श्री चन्द्र वधवा ने व्यावहारिक और उपयोगी हिन्दी के कारपोरेट जगत में उज्ज्वल भविष्य की संभावनाओं को उद्घाटित किया। श्री आर.के. दूबे ने हिन्दी की समृद्धी के लिए इसे सामान्य समाज के लिए सरल और सुगम बनाए जाने का विचार रखा। मुख्य अतिथि दिलीप मंडल ने कारपोरेट जगत में हिन्दी की उपयोगिता और महत्ता पर प्रकाश डाला। अध्यक्षता करते हुए डॉ. जगदीश्वर चतुर्वेदी ने मीडिया, समाज और कारपोरेट जगत के संबंधों को विद्वतापूर्ण शैली में स्पष्ट करते हुए हिन्दी को देश के स्वाभाविक जनजीवन की भाषा की तरह विकसित करने और भारतीय भाषाओं के साथ जुड़े रहने की जरूरत पर जोर दिया। डॉ. चतुर्वेदी ने ऐतिहासिक उतार चढ़ावों की मीमांसा करते हुए बाजारवाद के दुष्प्रभाव में भाषाओं की दुर्गति पर चिंता व्यक्त की। संचालन चैतन्य प्रकाश ने किया।
वैश्विक प्रभाव और हिन्दी बाल साहित्य
अक्षरम् के अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी उत्सव 2008 के अन्तर्गत प्रख्यात बाल साहित्यकार और अपने समय की बच्चों की लोकप्रिय पत्रिका 'पराग' के संपादक डॉ. हरिकृष्ण देवसरे की अध्यक्षता में 3 फरवरी को अपराह्न 2 बजे इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के कांफ्रेंस रूम में 'वैश्विक प्रभाव और हिन्दी बाल साहित्य' विषय पर एक अकादमिक सत्र का आयोजन किया गया। विमर्श की शुरुआत करते हुए श्री ओमप्रकाश कश्यप ने कहा कि बाल साहित्य सदैव हमारे घर-परिवार और लोकाचार का हिस्सा रहा है लेकिन तीव्र शहरीकरण की मार से किस्सागोई की परंपरा को भुला दिया गया। अब वही बाल साहित्य इंटरनेट के अलावा सीडी, डीवीडी जैसे इलेक्ट्रानिक माध्यमों से अपने पाठकों तक पहुंचने का प्रयास कर रहा है। हिन्दी, मराठी और अंग्रेजी की प्रतिष्ठित बाल साहित्य लेखिका श्रीमती सुरेखा पाणंदीकर ने चर्चा को आगे बढ़ाते हुए जोर देकर कहा कि आज के समय में हमें बच्चों के प्रश्नों से भागना नहीं चाहिए, बल्कि उनका समुचित जवाब देना चाहिए। बच्चों और नवसाक्षरों के लिए अनेक पुस्तकें लिख चुके साहित्यकार श्री रामकुमार कृषक ने हिन्दी और तमाम भारतीय भाषाओं के व्यापक परिप्रेक्ष्य की चर्चा में हस्तक्षेप किया तो बाल मनोविज्ञानी डॉ. कविता अरोड़ा ने कहानियों के शैक्षिक प्रभाव पर जोर देते हुए हिन्दी में ऐसी किताबों के अभाव की बात की जिनसे बच्चे तादात्म्य स्थापित कर सकें। कुल्लू मनाली से आये लोकप्रिय बाल साहित्यकार श्री सैन्नी अशेष ने टूटे हुए परिवारों के बच्चों को केन्द्र में रखकर कहा कि हमारा ध्यान हाशिए के इन बच्चों पर भी जाना चाहिए। प्रतिष्ठित हिन्दी कवि और आलोचक डॉ. दिविक रमेश, जो इस कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि थे, ने कहा कि ऐसा लगता है जैसे हमसे बच्चों के पालन-पोषण में ही चूक हो रही है। संवादी विजय मिश्र ने बच्चों के पाठयक्रम में रंगमंच को शामिल करने की जोरदार मांग की। कार्यक्रम की मुख्य अतिथि राष्ट्रीय बाल भवन की पूर्व निदेशक डॉ. मधु पंत ने बच्चों में सकारात्मक बालचेतना विकसित करने की बात की तो अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. हरिकृष्ण देवसरे ने मीडिया द्वारा बच्चों को अंधविश्वासी बनाये जाने की प्रवृत्ति पर चिंता जाहिर करते हुए कहा कि आज की विचार गोष्ठी से जो मुद्दे सामने आये हैं, निश्चित तौर पर उनके दूरगामी प्रभाव होंगे और ये गोष्ठी आगे और भी विमर्शों का मार्ग प्रशस्त करेगी। इस पूरे कार्यक्रम का संयोजन युवा कवि और आलोचक देवेन्द्र कुमार देवेश ने किया था और संचालन युवा साहित्यकार रघुवीर शर्मा ने किया।
सम्मान अर्पण समारोह एवं कवि सम्मेलन
तीन दिवसीय अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी उत्सव के समापन समारोह में देश-विदेश के हिन्दी के विविध क्षेत्रों के 18 विद्वानों जिनमें डॉ कैलाश वाजपेयी को अक्षरम् साहित्य शिखर सम्मान, राहुल देव को अक्षरम् मीडिया शिखर सम्मान, महामहिम मुकेश्वर चुन्नी; (मॉरीशस) को अक्षरम् प्रवासी शिखर सम्मान, अरविन्द कुमार को अक्षरम् विशिष्ट हिन्दी सेवा सम्मान, दाऊजी गुप्त को अक्षरम् हिन्दी सेतु सम्मान, डॉ. गोविन्द व्यास को अक्षरम् वाचिक परम्परा सम्मान, पंकज जैन; (वेब-दुनिया - सी.ओ.ओ.) को अक्षरम् हिन्दी प्रौद्योगिकी सम्मान, विश्वनाथ को अक्षरम् हिन्दी प्रकाशन सम्मान, गिरिराज शरण अग्रवाल को अक्षरम् हिन्दी सेवा सम्मान, मीना अग्रवाल को अक्षरम् हिन्दी सेवा सम्मान, जगदीश मित्तल को अक्षरम् हिन्दी सेवा सम्मान, डा. नरेन्द्र व्यास को अक्षरम् विशिष्ट हिन्दी सेवा सम्मान, जिलियन राइट (ब्रिटेन) को अक्षरम् अनुवाद सम्मान, भूदेव शर्मा (अमेरीका) को अक्षरम् विशिष्ट हिन्दी सेवा सम्मान, प्रो. हरमन वॉन ऑलफन (अमेरीका) को अक्षरम् हिन्दी शिक्षण सम्मान, बी.एम. गुप्ता (ब्रिटेन) को अक्षरम् संस्कृति सम्मान, महेन्द्र वर्मा (ब्रिटेन) को अक्षरम् प्रवासी हिन्दी शिक्षण सम्मान, उषा वर्मा (ब्रिटेन) को अक्षरम् प्रवासी साहित्य सम्मान, गंगाधार जसवानी (दुबई) को अक्षरम् हिन्दी सेवा सम्मान से सम्मानित किया गया।
इस अवसर पर विश्व हिन्दी सचिवालय की महानिदेशक श्रीमती विनोद बाला अरुण ने अपना उदगार व्यक्त करते हुए कहा कि भारतीय डायसपोरा के देश मिलकर हिन्दी को विश्व भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करेंगे। जबकि साहित्यकार व राजनेता श्री रत्नाकर पांडेय ने कहा कि अब वह समय आ गया है जब हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र में उचित स्थान मिलना चाहिए।
समापन समारोह के अवसर पर अक्षरम् के अध्यक्ष नरेश शांडिल्य द्वारा उत्सव प्रतिवेदन पढ़ा गया, जिसमें उत्सव के दौरान आयोजित विभिन्न अकादमिक सत्रों एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों की जानकारी दी गई। छठे अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी उत्सव के मुख्य संयोजक अनिल जोशी ने इस अवसर पर सातवें अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी उत्सव के 26, 27, 28 दिसंबर 2008 के आयोजन की घोषणा की और उपस्थित विद्वानों एवं आयोजन से जुड़े सदस्यों का धन्यवाद ज्ञापन किया।

सांस्कृतिक कार्यक्रम
वैश्विक-हिन्दी विमर्श से जुड़े भिन्न-भिन्न विषयों पर केन्द्रित 15 अकादमिक सत्रों में गंभीर विचार-मंथन के साथ-साथ हमेशा की तरह इस बार भी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी उत्सव में सायंकालीन सांस्कृतिक कार्यक्रमों के कारण ही इस भव्य आयोजन को एक उत्सवी रूप मिलता है। ऐसे सत्रों की लोकप्रियता के कारण इनमें भारी मात्रा में दर्शक-श्रोता भाग लेते हैं, जिससे उत्सव को सार्थकता तो मिलती ही है साथ ही साथ भाषा और संस्कृति का परस्पर लगाव भी दृष्टिगोचर होता है। इस बार 'अक्षरम्' ने पूर्व की तरह नाटक और भव्य अन्तरराष्ट्रीय कवि सम्मेलन का कार्यक्रम तो रखा ही, इसके साथ-साथ पहली बार एक रंगारंग 'संगीत संध्या' का आयोजन भी किया जिसमें देश-विदेश के प्रतिष्ठित व नवोदित रचनाकारों की रचनाओं का गायन किया गया। कवि सम्मेलन में इस बार कवियों की संख्या को बहुत सीमित रखा गया ताकि प्रत्येक कवि को पर्याप्त समय मिल सके और श्रोता काव्य-पाठ का भरपूर आनन्द ले सकें। इन सभी कार्यक्रर्मों में दर्शकों-श्रोताओं की उत्साहजनक भागीदारी ने हमें भी स्फूर्ति और उल्लास से भर दिया। इन सभी कार्यक्रमों का आयोजन हिन्दी भवन के मुख्य सभागार में किया गया।

नाटक
उत्सव के पहले दिन प्रतिष्ठित नाटय संस्था 'अस्मिता थिएटर ग्रुप' द्वारा तैयार नाटक 'कोर्ट मार्शल' का प्रदर्शन किया गया। स्वदेश दीपक द्वारा लिखित और सुप्रसिद्ध नाटय-निर्देशक अरविन्द गौड़ द्वारा निर्देशित यह नाटक पहले से ही काफी चर्चित रहा है। इस नाटक को 'दलित-विमर्श' की एक सशक्त रचना के रूप में भी देखा जा सकता है। किस प्रकार एक छोटी जाति में पैदा हुआ व्यक्ति प्रतिभावान होते हुए भी जातिगत विसंगति को उम्र भर 'अभिशाप' की तरह ढोता है, यहां तक कि सेना जैसे अनुशासित सेवा क्षेत्र में भी। नाटक में दिखाया गया है कि कैसे रामचन्दर नाम का छोटी जाति में पैदा हुआ एक सिपाही सवर्ण जाति के अपने अधिकारियों के तानों और शोषण से इस कदर तंग आ जाता है कि वह अपने एक अधिकारी की हत्या तक कर बैठता है। सेना, जहां जाति के आधार पर आरक्षण का प्रावधान नहीं है, वहां भी जातिगत वितृष्णा के कुत्सित-स्वरूप से रूबरू कराता यह नाटक हमें झकझोर कर रख देता है। 'कोर्ट मार्शल' हमें एक साथ कानूनी और कविताई न्याय का आस्वाद भी देता है, जिसे एक कुशल निर्देशक ने मंझे हुए कलाकारों के जरिए बड़ी ही खूबसूरती और कसे हुए अंदाज में पेश किया है। अपने चुस्त संवादों, नाटकीय पहलुओं और धारदार व्यंग्य के कारण भी यह नाटक दर्शकों की स्मृति में देर तक रहेगा। अक्षरम् की ओर से इस सत्र का संयोजन डॉ. विक्रम सिंह ने किया। सह-संयोजक के रूप में गीता जोशी व श्रीकांत की भूमिका सराहनीय रही।
संगीत संध्या
उत्सव के दूसरे दिन एक शानदार और रंगारंग 'संगीत संध्या' का आयोजन किया गया। इसमें देश-विदेश के प्रतिष्ठित हिन्दी कवियों-ग़ज़लकारों की प्रसिद्ध रचनाओं की शर्मा बहनों द्वारा संगीतमय प्रस्तुति ने श्रोताओं को भाव-विभोर कर दिया। लगा कि मानो मंच पर साक्षात संगीत की 'त्रिधारा' आन मिली तो - माधुरी शर्मा, कीर्ति शर्मा और विधि शर्मा के रूप में संगीत की 'गंगा-यमुना-सरस्वती' का यह अनूठा संगम एक आध्यात्मिक आनंद की अनुभूति करा रहा था। देश के कोने-कोने में 200 से अधिक संगीत-कार्यक्रम देने के अतिरिक्त इन बहनों के चार संगीत-एलबम जारी हो चुके हैं। विधि शर्मा तो हाल ही में आयोजित ए.आर. रहमान की गायन-प्रतियोगिता 'एफ.एम. फीवर-104' में उप-विजेता भी रही हैं।
इस कार्यक्रम का शुभारम्भ अक्षरम् के मुख्य संरक्षक रहे, स्व. लक्ष्मीमल्ल सिंघवी के हिन्दी-गीत - 'हिन्दी हम सबकी परिभाषा' के गायन से किया गया। विश्व हिन्दी सम्मेलन के लिए विशेष तौर पर लिखे उनके इस गीत को जब श्रद्धांजलि स्वरूप गाया गया तो पूरा सभागार अश्रुमिश्रित करतल ध्वनि से गूंज उठा। आदरणीया कमला सिंघवी की मौजूदगी ने भी इन क्षणों को और अधिक यादगार बना दिया। उनकी डबडबाई आंखें न बोलते हुए भी बहुत कुछ बोल रही थीं।
इसके अतिरिक्त कार्यक्रम में माखनलाल चतुर्वेदी, जयशंकर प्रसाद के गीत, बालस्वरूप राही व सोहन राही (ब्रिटेन) की ग़ज़लें, मदनलाल मधु (रूस) व सत्येन्द्र श्रीवास्तव (ब्रिटेन) के गीतों के साथ-साथ शशिकांत की ग़ज़ल व नरेश शांडिल्य के दोहों की भी संगीतमय प्रस्तुति हुई। श्रोताओं की जबरदस्त तालियों ने इस कार्यक्रम की सफलता पर अपनी मुहर लगाई।
कार्यक्रम की अध्यक्षता पद्मभूषण विदुषी डॉ. शन्नो खुराना ने की। विशिष्ट अतिथि पुंज लॉयड के सत्यनारायण पुंज, समाज सेवी संतोष तनेजा, नन्दकिशोर गर्ग, भुवन मोहन, ब्रजमोहन गुप्ता (ब्रिटेन) आदि की उपस्थिति ने कार्यक्रम को और अधिक गरिमा प्रदान की। कार्यक्रम का संचालन नरेश शांडिल्य ने किया। शशिकांत ने कार्यक्रम के संयोजक की भूमिका निभाई।

अन्तरराष्ट्रीय कवि सम्मेलन
अक्षरम् के इस चर्चित और प्रतिष्ठित अन्तरराष्ट्रीय कवि सम्मेलन में इस बार देश-विदेश के जाने-माने मंचीय कवियों को ही आमंत्रित किया गया था। कवि सम्मेलन की अध्यक्षता देश के प्रख्यात गीतकार ग़ज़लकार बालस्वरूप राही ने की। विशिष्ट अतिथि के रूप में पधारे अग्रवाल पैकर्स एवं मूवर्स के प्रमुख रमेश अग्रवाल और महाराजा अग्रसेन मेडिकल कॉलेज, अग्रोहा के उपाध्यक्ष जगदीश मित्तल ने आमंत्रित कवियों को 'स्मृति चिन्ह' भेंट कर सम्मानित किया।
प्रवासी कवियों में जहां वेदप्रकाश 'वटुक' (अमेरीका) और मदनलाल मधु (रूस) ने अपनी कविताओं और गीतों से समा बांधा, वहीं डॉ. सत्येन्द्र श्रीवास्तव (ब्रिटेन) ने अपने ही अंदाज और तेवर की कविताएं प्रस्तुत कर खूब वाहवाही लूटी।
डा. अशोक चक्रधर के हास्य-व्यंग्य का अपना ही अंदाज था। उन्होंने 'नैनो' कार पर एक बहुत ही चुटीली रचना पेश की। डॉ. कुंवर बेचैन का आती-जाती सासों वाला गीत खूब सराहा गया। गजेन्द्र सोलंकी ने राष्ट्रीय चेतना के स्वर गुंजाए तो मुम्बई से पधारे राजेश रेड्डी ने रोजमर्रा जिन्दगी से जुड़ी अपनी ग़ज़लों के एक-एक शेर पर भरपूर दाद दी। बालस्वरूप राही अपनी पूरी फार्म में दिखे। अपने चिरपरिचित अंदाज में उन्होंने ग़ज़लों और गीतों को अत्यंत प्रभावी ढंग से पेश किया।
कवि सम्मेलन का कुशल संचालन व संयोजन आज के प्रसिद्ध कवि राजेश चेतन ने किया।
प्रस्तुति : नरेश शांडिल्य

18वाँ नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला(2 फरवरी- 10 फरवरी 2008)



नई दिल्ली के प्रगति मैदान में नेशनल बुक ट्र्स्ट, इंडिया की ओर से 18वाँ विश्व पुस्तक मेले का आयोजन (2 फरवरी 2008 से 10 फरवरी 2008) किया गया। इस मेले में हिंदी और भारतीय भाषाओं के साथ-साथ अंग्रेजी प्रकाशकों की पुस्तकों के स्टाल भी लगे। इस अवसर पर अनुराग प्रकाशन से प्रकाशित चेतना भाटिया की पुस्तक “ प्रिंट और इलैक्ट्रानिक मीडिया”, भावना प्रकाशन से सुभाष चंदर की पुस्तक “हिंदी व्यंग्य का इतिहास”, राजकमल प्रकाशन से भगवानदास मोरवाल के उपन्यास “रेत” तथा एक कहानी संग्रह आदि पुस्तकों का लोकार्पण हुआ। संवाद प्रकाशन, मेरठ से प्रकाशित कथाकार रूपसिंह चंदेल द्वारा लिखित /अनुदित दो पुस्तकें - लियो तोलस्तोय का ऐतिहासिक उपन्यास “हाजी मुराद” और “दास्तोएवस्की के प्रेम” (जीवनी) आकर्षण का विषय रहीं।

इस पुस्तक मेले में 9 फरवरी को आलेख प्रकाशन के तत्वावधान में ‘भूमंडलीकरण से साहित्यिक पुस्तक–प्रकाशन जगत पर पड़ने वाले प्रभाव’ से उठते सवालों पर ‘भूमंडलीकरण के दौर में पुस्तक की भूमिका’ विषय पर एक सेमीनार का भी आयोजन किया गया। दो सत्रों के इस सेमीनार के विषय थे– ‘बदलती दुनिया, बदलता पाठक’ तथा ‘पुस्तक को लोकप्रिय कैसे बनाया जाए?’ सेमीनार के उद्घाटन के अवसर पर सुप्रतिष्ठित शिक्षाविद् एवं आलोचक डा0निर्मला जैन ने कहा कि ग्लोबलाइजेशन की चमक–दमक से हर वर्ग प्रभावित हुआ है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से खतरे भी हैं, पर निराश हो जानेवाली स्थिति नहीं है। उन्होंने कहा कि विश्व में भारत के बढ़ते प्रभाव से हिंदी भाषा का प्रचार–प्रसार बढ़ा है। अमेरिका, यूरोप के अलावा विश्व के अन्य देशों में हिंदी भाषा और साहित्य को पढ़ाया जा रहा है।
विश्व पुस्तक मेले के उदघाटन सत्र की अध्यक्ष एव नेशनल बुक ट्रस्ट इंडिया की निदेशक नुज़रत हसन ने कहा कि फेंकफर्ट पुस्तक मेले में भारत को अतिथि देश बनाकर सम्मान दिया गया था। उन्होंने कहा कि इंटरनेट तो केवल एक इंफोमे‍र्शन टूल है। वह आपको कौन–कौन सी पुस्तकें छपी हैं और उनके विषय क्या है, इसे बताने में आपकी सहायता करता है। उदघाटन सत्र का संचालन युवा कवि एवं आलोचक सुरेश यादव ने किया।
‘बदलती दुनिया, बदलता पाठक’ विषय पर आयोजित सत्र के अध्यक्ष रत्नाकर पांडेय ने कहा कि आज के वैज्ञानिक समाज में सिर्फ साहित्य की पुस्तकों का प्रकाशन करने से काम नहीं चलेगा। ज़रूरत इस बात की है कि पाठक के अनुकूल ही पुस्तकों का प्रकाशन होना चाहिए। इलैक्ट्रॉनिक मंत्रालय के निदेशक ओम विकास, बाल भवन की पूर्व निदेशक मधु पंत, लघु उद्योग मंत्रालय के निदेशक हरीश आनंद, पत्रकार ज्योतिष जोशी, दिल्ली विश्वविद्यालय के डॉ0 पूरनचंद टंडन ने भी इस विषय पर अपने-अपने विचार रखे। इस सत्र का संचालन केन्द्रीय हिंदी संस्थान, आगरा के सेवानिवृत्त प्रो0 कृष्ण कुमार गोस्वामी ने किया।
‘पुस्तक को लोकप्रिय कैसे बनाया जाए ?’ सत्र की अध्यक्षता करते हुए सुप्रतिष्ठित लेखिका मृदुला गर्ग ने कहा कि बच्चों में पुस्तकों के पढ़ने के संस्कार डालने होंगे। विडम्बना यह है कि हिंदी समाज के लोग भी बच्चों में अंग्रेजी वर्चस्व बना रहे हैं। हिंदी के प्रति उनकी रुचि कम हो रही है। बच्चों में पढ़ने की रुचि डालने का काम अभिभावक और शिक्षक को मिलकर करना होगा। स्कूलों में भी हिंदी भाषा के ज्ञान के अलावा साहित्य को भी अलग से पढ़ाने की व्यवस्था की जानी चाहिए। बच्चों से कहानी सुनाने को अनिवार्य बनाना चाहिए। लेखक महेश दर्पण ने कहा कि पुस्तकों को जनोपयोगी बनाकर मनुष्य की चेतना से जोड़ा जाना चाहिए। कादम्बिनी के कार्यकारी संपादक विष्णु नागर ने कहा कि सरकारी खरीद बंद होनी चाहिए। इससे प्रकाशन जगत में एक भ्रष्टाचार पनपा है और पुस्तकों की कीमतें बढ़ गई हैं। पुस्तकों को सस्ते मूल्य पर छाप कर पाठकों तक पहुँचाया जाए। ‘समयांतर’ के संपादक पंकज बिष्ट ने कहा कि इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के प्रभाव से पठन–पाठन कम हुआ है। विडंबना यह भी है कि 50 करोड़ हिंदीभाषी क्षेत्र में 50 हजार भी ऐसे लोग नहीं है जो साहित्य और पुस्तकों से जुड़े हों। जबकि हमारे समाज में बहुत बड़ा ऐसा वर्ग भी है जो अभी निरक्षर है।
सुप्रसिद्ध लेखक एवं ग़ज़लकार शेरजंग गर्ग ने कहा कि पुस्तकों को पाठकों तक पहुँचाने के रास्ते बनाने होंगे। पुस्तक अब भी एक संभावना है। आवश्यकता इस बात की है कि कर्मठता के साथ एक आस्था और संकल्प लिया जाए। पुस्तकों को लोक तक पहुँचाकर उसे लोकप्रिय बनाया जा सकता है। लेखक–प्रकाशक विकास नारायण ने कहा कि सस्ती, आकर्षक और समाज की रुचि की किताबों को छोटी बस्तियों तक पहुँचाने के सार्थक परिणाम सामने आए हैं। हरियाणा को एक संस्कृतिविहीन प्रदेश के नाम से प्रचारित किया गया है जबकि वहाँ साहित्य की किताबों की अच्छी–खासी बिक्री हो रही है। इनके अतिरिक्त, अमरनाथ अमर, से.रा. यात्री ने भी अपने विचार रखे। संगोष्ठी के संयोजक उमेशचंद्र अग्रवाल ने कहा कि पुस्तक को लेकर पाठक, लेखक और प्रकाशक के बीच संवाद होना चाहिए तथा आज के पाठक की मांग के अनुरूप् आधुनिक विषयों पर स्तरीय एवं विश्वसनीय पुस्तकें लिखी जानी चाहिएं। पांडुलिपि का सही चयन एवं सटीक संपादन पुस्तकों के प्रति पाठकों के विश्वास को बनाने में सहायक होगा। राष्ट्रीय स्तर पर पुस्तक अकादमी की स्थापना होनी चाहिए जिसका कार्य केवल पुस्तकों का मानकीकरण एवं स्तरीय पांडुलिपि तैयार कराने तक ही सीमित हो। पुस्तक प्रकाशन को उद्योग का दर्जा दिया जाना चाहिए ताकि इसका समुचित विकास हो सके। इस अंतिम सत्र का संचालन कथाकार बलराम अग्रवाल ने किया।
प्रस्तुति : अवधेश श्रीवास्तव


अगला अंक

मार्च 2008

-मेरी बात
-महेश दर्पण की कहानी।
-सुभाष नीरव की कविताएं।
-कमल चोपड़ा की लघुकथाएं।
-“भाषान्तर” में लियो ताल्स्ताय के उपन्यास “हाजी मुराद” के धारावाहिक प्रकाशन की दूसरी किस्त। हिंदी अनुवाद : रूपसिंह चन्देल।
-“नई किताब” के अंतर्गत द्रोणवीर कोहली के उपन्यास “चौखट” की समीक्षा
-“गतिविधियाँ” के अंतर्गत माह जनवरी 2008 में सम्पन्न हुई साहित्यिक/सांस्कृतिक गोष्ठियों की रपट तथा संक्षिप्त समाचार।

सोमवार, 14 जनवरी 2008

साहित्य सृजन- जनवरी 2008

मेरी बात



सुभाष नीरव

नव वर्ष 2008 के आगमन पर अपनी ही एक कविता को आपसे साझा करना चाहता हूँ-


शुक्र है-
निरन्तर बढ़ रहे इस विषाक्त वातावरण में
बची हुई है, थोड़ी-सी प्राणवायु।

शुक्र है-
कागज और प्लास्टिक की संस्कृति में
बचा रखी है फूलों ने अपनी सुगन्धि
पेड़ों ने नहीं छोड़ी अपनी ज़मीन
नहीं छोड़ा अपना धर्म
स्वार्थ में डूबी इस दुनिया में।

बेईमान और भ्रष्ट लोगों की भीड़ में
शुक्र है-
बचा हुआ है थोड़ा-सा ईमान
थोड़ी-सी सच्चाई
थोड़ी-सी नेकदिली।

शुक्र और राहत की बात है
इस युद्धप्रेमी और तानाशाही समय में
बची हुई है थोड़ी-सी शांति
बचा हुआ है थोड़ा-सा प्रेम
और
अंधेरों की भयंकर साजिशों के बावजूद
प्रकाश अभी जिन्दा है।

एक बेहतर दुनिया के लिए
थोड़ी-सी बची इन अच्छी चीजों को
बचाना है हमें-तुम्हें मिलकर
भले ही हम हैं थोड़े –से लोग !


आइये, इस नये साल में हम-आप ये शुभकामनाएं करें और संकल्प लें कि एक बेहतर दुनिया के लिए थोड़ी-सी बची अच्छी चोजों को हम खत्म न होने देंगे…



हिंदी कहानी

गुप्त दान
बद्री सिंह भाटिया

गंगा भाभी के मन में न जाने कब कोई बात सरका गया कि जिनके संतान नहीं होती, उनकी गति नहीं होती। इस बात से वह मन ही मन अशांत हो गई थी। संतान में बेटा होना तो लाजिमी है। अन्त समय में कपाल क्रिया और फिर धर्मराज तक की यात्रा के लिए पिंडदान, वैतरणी पार के लिए गऊदान बहुत आवश्यक होता है और गर ये सब न हो तो कोई गुप्तदान भी चल सकता है। निराकरण का निचोड़ यह था।
गांव में किसी गप्प-गोष्ठी, विशेषकर महिलाओं की, में कब कौन-सी बात उठ जाये, पता नहीं चलता। मन को उद्वेलित करने वाली बात की चर्चा चूल्हे के पास शाम को होती है। मगर गंगा भाभी इस बात की चर्चा करे तो किससे? विधवा और उस पर निस्संतान का क्या चूल्हा, क्या चौका? पकी तो पकाई, न पकी तो चुप। या किसी ने दे दी कटोरी सब्जी तो हो गया डंग निकालने का गुजारा। कहते भी हैं ‘कल्ला नी देखणा खान्दा, टब्बर नी देखणा कमान्दा।’ सो अकेले के जो बात मन में गड़ गई, वह हो गई फैसला।
गंगा भाभी का घर हमारे घर से कोई सौ-फुट होगा। पर्दा केवल इतना कि बीच में बांस का बीड़ा है जिससे ये पता नहीं चलता कि भाभी आंगन में बैठी है या पिछवाड़े। हमारे घर का रास्ता उसके आंगन की दीवार से लगता बना है। रास्ते के नीचे कोई तीन-फुट की दो पौड़ियाँ उतर कर उसके आंगन में आ सकते हैं।
गंगा भाभी से मेरी बात इतनी ही थी कि रास्ते से गुजरते नमस्कार और एक वाक्य निकलता, ‘ठीक-ठाक हो न।’ यह वाक्य इतना चलते कहा जाता कि प्रत्युत्तर की आशा न होती, चलते-चलते तब तक उसके घर के कोने तक पहुंच जाता जब तक वह कहती–‘ठीक ही हूं।’ कई बार पीछे से आवाज आती– ‘मंया बैठा बी कर, कब्बी।’ पता नहीं मैं क्यों भाभी से कतराता हूं। ...उसका सामना नहीं करना चाहता।
यदि भाभी से रास्ते में सामना हो ही जाये, जैसे वह मवेशी खाने से लौट रही हो या दुकान से बीड़ी का बंडल लाकर आ रही हो, तो इतना उल्हाना देती ‘मैं ठीक कां हूं। देख मेरी नाड़ी।’ और अपनी सूखी, सूनी कलाई मेरे आगे कर देती। मानों मैं कोई नामी वैद हूं।

मैं शहर और गांव के बीच सातवें दिन से जुड़ा हूँ। शहर तक हमारे गांव से बस से दो-अढ़ाई घंटे का रास्ता है। सो प्रति शनिवार उपस्थिति हो जाती है। रविवार को घर के काम, गांव वालों से मिलना, कोई समाज-सेवा का कार्यक्रम या दुकान पर गप्पों में रम जाना आदि दिनचर्या रहती।

कोई दो महीने पूर्व भाई साहब ने आंगन में धूप सेंकते हुए कहा, ‘तू नीचे चला जाया कर...गंगा भाभी के पास। बहुत पूछती रहती है।’
‘क्यों क्या बात?’ मैं सहज ही पूछ गया।
‘उसने कोई बात करनी है तुझसे।’
‘मुझसे क्या बात? मेरे नाम वसीयत तो नहीं करनी?’ सहसा निकला मेरे मुंह से। फिर अपनी बात का अर्थ समझा। मैं हँस दिया। अपने को सही करते हुए मैंने तर्क दिया कि यह मैंने यूं कहा कि उसके संतान तो है नहीं। सूख कर कांटा सी हो गई है। जीवन का क्या पता, सो ऐसे लोग बुढ़ापे का सहारा ढूंढते रहते हैं। शायद...।
‘नई यार। ऐसा नहीं है। और हो भी तो बुरा क्या है?’ भाई ने द्विअर्थी बात फिर कही।
भाई की बात के दूसरे अर्थ को अपनी सोच से मेल खाता समझा मैंने। उसी तरह कुर्सी से चिपके हुए कहा, ‘साफ क्यों नहीं कहते?’ सामने बैठी मां भी हमारी बात सुन रही थी। उसने ही कहा, ‘वो’ बीमार है, काफी। उस दिन सौ गज दूरी तीन बार बैठ कर पार की उसने?’

‘मतलब?’
‘उसे रास्ते में आराम के लिए रूकना पड़ा।’
मैंने फिर बात को हवा में उड़ाना चाहा– ‘वह तो रोज की बीमार है। दुनिया के सारे भूत-प्रेत उसे ही लगे हुए हैं। मुझे तो पसंद नहीं।’ अब मैं पहले की तरह नहीं था, थोड़ा गम्भीर हो गया था।
‘पर वह तो तुझे ही चाह रही है। तू एक बार जाकर तो आ उसके पास। तेरे लिए तड़पती रहती है। कितनी बार आ गई यहां।’ मां ने कातरता से कहा।
दुकान तो जाना ही था। गंगा भाभी के घर के पास से गुजरते आवाज दी–‘भाभी।’
भीतर से प्रत्युत्तर आया– ‘हां। इधर आ।’ ऐसा लगा मानो वह मेरी ही बाट जोह रही हो। बाहर से बोले मेरे शब्द उसने पहचान लिए, जैसे उसे इनकी ही आशा हो। मेरे कदम फाटक की ओर हो लिए। फाटक पार कर आंगन के दस कदमों में मैंने महसूस किया कि वह चारपाई पर से उठने का उपक्रम कर रही हैं। दरवाजे पर से कहा–‘भीतर आऊं या तुम बाहर आ रही हो।’
‘बाहर आ रही हूँ पिछवाड़े चल। बहुत काम है तुझ से।’ भाभी के बोलने में यद्यपि पूर्ववत् की कराहट थी, मगर थोड़ा अन्तर भी था जो यह स्पष्ट कर रहा था कि वह अब वास्तव में बीमार है।
पिछवाड़े जाड़े के दिनों में धूप बहुत अच्छी लगती है। बोरी बिछा कर बैठ गये हम। उसने उल्हाना दिया– ‘मंया थक गई मैं तो बुलाती, पर तू तो निठुर निकला।....मेरा कुण है। सारा गांव दुश्मणों से भरा है, लोक नजर लगाये हैं कि कब मुर्दा उठे।’
‘क्यों तेरे वो हिसाबी जो हैं।’ मैंने दूर के एक वारिस का जिक्र किया।
‘मुए हिसाबी, लेणे के। आज छ: महीने हुए मेरे को, ली खबर किसी ने। दवा लेणे को तेरे भाई को भेजती हूँ।’ भाभी के चेहरे पर पीड़ा उभर आयी।
‘मेरे से कुछ काम बता रही थी।’ मैंने प्रसंग बदला।
‘हां, अच्छा ये बता, पर तू हंसणा नी, ये गुप्तदान क्या होता है?’ उसने जरा हंस कर कहा। और बीड़ी निकालने के लिए पाकेट में हाथ डाला मानों अपने कहे शब्दों से उठ आई शर्मिन्दगी को छुपाने का बहाना मिल गया हो।
‘गुप्तदान तो गुप्तदान होता है.....जो गुप्त रूप से दिया जाये।’
‘क्या भला?’
‘कुछ भी, धन, जमीन तक...।’
‘मैंने सुना जिनके बच्चे नहीं होते, उनकी गति नी होती।’ फुसफुसाई वह और, प्रश्न-भरी दृष्टि मेरे चेहरे पर डाली।
‘ये तो चन्दू पंडित को होगा पता। वो ई करता रहता है, ऐसी बातें?’
‘उसने नी बताया।’
‘तो फिर किसने कहा?’
‘कोई कह रहा था। बताऊंगी, पर मेरे मन में बी है कि मैं बी दान करूं।’ हल्का मुस्कराई वह।
‘तो करो। मुझे बता क्या करना है।’
‘पैले इसका अर्थ समझा, फिर बताऊंगी? तू तो ज्ञान-ध्यान वाला है।’ सम्भवत: उसने कभी दुकान पर उठी बहस के बीच मुझे धर्म पर बोलते सुन लिया होगा, जिसे मैं दुकानदार को हराने के लिए और अपनी टांग ऊपर रखने के लिए हथियार स्वरूप इस्तेमाल किया करता था और इसने ऐसा अन्दाज लगा लिया होगा। पर मैं क्या बताता। मुझे तो ये सब चोंचले लगते हैं। फिर सोचा अगर यह बात नहीं है तो इसने जरूर किसी भागवत या सत्यनारायण की कथा में कोई प्रसंग सुना होगा या किसी ने कहा होगा कि फलां आदमी ने मंदिर बनवाने को इतना गुप्तदान दिया...। जाने कितने पक्ष मेरे जहन में उभर गये। फिर बोला– ‘भाभी जी, यदि मन में कुछ विचार उठा है, और उसकी आप में सामर्थ्य है, तो उसे पूरा कर लेना चाहिए। ये नहीं पूछना या देखना चाहिए कि क्या होता है और क्या फल? इसमें कुछ तो होता ही होगा। कम से कम मन तो शांत हो जाता है। जीवन का उतरार्द्ध है, अब तुम्हें अपने बारे में भी सोच लेना चाहिए। मैंने सुना तुम ज्यादा बीमार हो? डाक्टर को दिखाना था।’
‘दिखाया था। दस दिन अस्पताल रह कर आई हूँ। अब प्राण नहीं रहे। सो मेरा ये दान करा दो। और...।’ वह रुक गई। मन में अंत समय के डर से उठी पीड़ा उभर आई थी, गला भी भर आया था उसका।
‘क्या दान करना चाहती हो?’
अपने को संयत कर कहा उसने, ‘मैं गीता की किताब और सौ रुपया दान करूंगी। मैंने पंडित से बात की थी। उसने इसके साथ जो सामग्री लगती है वो लिखी है। तू बी देख, लाती हूं।’ वह बड़ी मुश्किल से उठी और दीवार के सहारे भीतर चली गई। मुझे उसकी चाल से लगा ये अब कुछ ही महीनों की मेहमान है। अकेली रहती है– क्या पता खाना भी खाती है कि नहीं? भाई से कहूंगा कि इसे खाने के लिए पूछ लिया करें। ऐसे लोग बीमारी से कम भूख से ज्यादा मरते हैं।
वह आ गई थी। कागजों का पुलिंदा लिए। उसने कुछ चीथड़े हुए कागज और एक ताजा लिखा तह किया कागज, सब मेरे हाथ में दे दिये–‘तू देख भला क्या लिखा है? चीथड़ा हुए कागजों में सबसे ऊपर वाले कागज की ओर इशारा कर कहा उसने। फिर मुस्कराई और बैठ गई।
अस्पताल से छुट्टी का कार्ड था। डायग्नोसिस की जगह डाक्टरी लिखाई में लिखा था, ‘ब्रोंकोंजेनिक कारसीनोमा...।’ दवाइयां और दस दिन बाद अस्पताल के रेडियोथेरेपी विभाग में रिपोर्ट करने की हिदायत।
‘बीमारी पढ़ कर मैं भी घबरा गया। पूछ बैठा–‘तू अकेली रही अस्पताल में?’
‘तो कौन रहता। मेरा है कुण? ये जिनको तू कैता है न टब्बर वाल़े। मुए ये....।’ भाभी का मुंह कसैला हो गया।
‘मेरी बहन का लड़का ले गया था। दो बार हुंआ भी आया। बाकी खुद भटकती रही। ऊपर-नीचे। चार बार तो एक्स-रे हुआ। तू जाणता है, अस्पताल...।’ वह रूआंसी हो गई।
‘फिर क्या बोला उन्होंने?’
‘बोले, कैंसर बी हो सकता है, सो परे जाओ अब।’
‘परे?’
‘हां, हुआं कैंसर अस्पताल को....सो मैं आ गई घर। मरना ई है तो फिर आज मरे कि कल। तू ये देख पंडत का पर्चा।’
दूसरे कागज अस्पताल में बाजार से मंगाई दवाओं की पर्चियां और बिल थे। ताजा लिखा कागज पंडित द्वारा दिया दान सामग्री का पर्चा था।
पंडित जी ने गीता की पुस्तक के साथ, जनाना, मर्दाना कपड़े, बूट, धोती, हवन आदि की सामग्री के साथ सोने-चांदी की प्रतिमाएं आदि लिखी थीं।
‘ये तो कोई पांच सौ का सामान है। तू कहती थी कि गीता की पुस्तक और सौ रुपये...।’
‘कुछ बी है पर ये करना है, जीवन का क्या भरोसा। सो जितना हो जाये ठीक है। उसने जरा रुक कर कहा– ‘पंडत से पूछा था, बोला था कि शास्त्र के मुताबिक दान में ये तो लगते हैं– दान पूरण होणा चाहिए। हां! ये तुम किसी मंदिर में भी दे सकती हो। फिर पूजा-वूजा की जरूरत नहीं। सो मैंने तो विधि के मुताबक करना है कल उल्टा न पड़े। मैं भी बाल-बच्चेदार हूं।’
और उसने अपनी बगल की पाकेट में हाथ डाल। सौ-सौ के पांच नोट निकाले, मुझे थमाये और कहा ‘तू ला दे ये, अगले इतवार को दिन अच्छा बताया है।'
‘ठीक है, मैं ला दूंगा। पैसे रहने दो।’
‘नहीं, ये तो लेणे ई पड़ने। ऐसा दिन बार-बार नी आणा।' भाभी ने आग्रह किया। उसके आग्रह से लगा मानो बहुत परिवर्तन आ गया है उसमें। वरना गांव के भण्डारे का जोड़ लेते समय वह अपने अकेले होने का रोना रो कर, दस की जगह दो रुपये देती थी।
‘हां! एक बात और।’ भाभी ने कहा।
‘कहो।’
‘मैं वसीयत बी करना चाहती हूं।’
‘ये ठीक है, भाभी। तुझे अब किसी को अपने साथ रख लेना चाहिए। बहुत थक गई है तू।’ मैंने उसकी बात का समर्थन किया। परोक्ष में कैंसर से होने वाली मृत्यु की ओर भी इशारा था।
‘तू दस(बता) किसको रखूं? हिंया सब लुटेरे हैं। बोलते हैं, पैले लिख दे। फिर करेंगे सेवा? अब तू दस जे मैंने लिख दिया। होर फेर नी पूछा किसी ने तो मेरा क्या होगा?’
‘नहीं ऐसा नही होता।’ मैंने कहा।
‘क्यों नी होता? देख उस मनभरू को। कर मरी न हिब्बा। फेर क्या दिया उसने। मुआ अंत में लकड़ी डालने बी नहीं आया। आखिरी कर्म करना तो दूर बेचारा वो टब्बर वाला हिसाबी ई खरा था जो काम आया। वो हिसाबी जिसकी परछाई नी लेणा चाहती थी। सो मैंने नी करना ऐसा– तू जाण। मेरे बचार में तो तू है, सो तू देख ले।’ अपने मन की बात आखिर कह ही दी उसने।
‘मैं?’
‘होर क्या?’
‘मैं भी तो इसी गांव का हूँ, मुझ पर ऐसा विश्वास क्यों?’
‘ये मैं जाणती हूं, मैंने सबको परखा है, भैया मैं नी जाणती जे कितनी दया करता है तू...।’ उसका गला भर आया था।
‘मैं तो ऐसे बी देख लिया करूंगा। पर तू होर बता, क्या है तेरे मन में?’
उसने बताया कि मेरा एक बचार और भी है– मेरा घर गांव की सभा में रहे। गवाइण ग्राम देवता को। उस पर पांच हजार रुपया खर्च कर देणा। मेरे पास बीस हजार रुपया है– मेरा कर्म-पिंड और सेवा, दवा-दारू उसी तरह करना जैसे अपने पिता के किए थे। वह रो दी। मुझे लगा– बे-औलाद देखो अपने अंत समय को किस तरह सुरक्षित रखते हैं! फिर कहा– ‘अरे! भाभी, आप घबराती क्यों हो। हर शनिवार को आता हूँ। भाई है, घरवाली है, तुम चिंता न करो। वसीयत को छोड़ो, पहले ठीक तो हो लो। यूं दिल छोटा नहीं करते।’ सांत्वना के दो शब्द।
‘जिंदगी का क्या भरोसा। मैं अपनी जमीन उनको नी देणा चाहती, जो मेरे टब्बर के बणते हैं होर मेरा मुरदा उठणे की प्रार्थना करते हैं।’ उसने अपनों के प्रति उठी मन की कड़वाहट उगल दी।
‘अपनी बहन के लड़के को दे दो।’
‘उसके अपणी ही नहीं सम्भाली जाती। अकेला मुझे क्या देखेगा। यूं भी पिछले एक साल से तेरा भाई ई देख रा है।’ मुझे उसकी बात से हैरानी हुई। भाई ने कभी जिक्र ही नहीं किया?
‘ठीक है। अगले इतवार को सोचेंगे? सामग्री मैं ले आऊंगा।’ मैं उठ गया, पर्चा लेकर।
घर आया तो भाई को सारी स्थिति बताई। उसे उल्हाना भी दिया। फिर नई जिम्मेवारी के सभी पहलुओं पर विचार किया– कैंसर की मरीज, कौन सेवा करेगा? आप अकेले। बच्चे तो मानते नहीं। मैं भी घर का कम शहर का ही ज्यादा हूँ। नौकरी से छुट्टी नहीं मिलती। वैसे एक बात और है यह ब्रोकोंजेनिक कारसीनोमा है– क्या पता कब फट जाये? गारंटी कोई नहीं।
‘सोच लो। जमीन यूं ही नहीं मिल जाती।’ भाई ने निराश आवाज में कहा।

सोमवार को मैं शहर चला गया। उसका सामान एकत्र करने लगा था। बाकी सामग्री तो आसान थी, मगर सुनार से प्रतिमा बनवाना कठिन था। शहर के सुनार इस प्रकार के काम को हुज्जत समझते हैं।
वीरवार को मैं बाजार से होता हुआ गुजर रहा था कि गांव का एक आदमी मिला। ‘अरे ! मैं तो थक गया ढूंढता। वो सयाणी ज्यादा बीमार है। तुझे घर बुलाया है– किसी को अपने नेडे़ नहीं मानती। बस, तुम्हारी ही रट लगा रखी है।’
‘क्यों क्या हुआ? सण्डे को तो ठीक थी।’
‘बस कल ही हुआ कुछ? तुम्हारा भाई बता रहा था कि थूक में खून भी आया। चक्कर भी और वह तब से बिस्तर में है। मुझे भेजा यहां।’
अगले दिन में सारी सामग्री लेकर गांव आ गया। भाभी की तबीयत ज्यादा खराब थी। उसने गुप्तदान की बात फिर दोहराई। आवाज में फुसफुसाहट थी। मैंने बाहर देखा तो उसके दो टब्बर वाले और उनकी घरवालियां खड़ी थी। शंकालू दृष्टि से देखते। बड़के ने मुझे बुलाया और एक ओर ले जा कर कहा, ‘ये हमारी प्रापर्टी है चाचा जी। देखना कुछ गलत न कर देना?’ बाकी लोग भीतर चले गये थे। बड़के की बात का मैंने कोई उत्तर नहीं दिया। भीतर जा कर भाई को कहा कि वे घर चले जाएं, यहां ये कर लेंगे। स्वयं स्थानीय सुनार के पास सोने के घोड़े की प्रतिमा बनवाने चला गया। सोचता इसके हिसाबियों को अब पता चल गया है कि ये नहीं रहेगी। कहीं वसीयत न कर दे इसलिए, टोक दो। पर एक वायदा है जो निभाना है, इसका गुप्तदान करवा देना है, चाहे कुछ जेब से ही खर्च क्यों न हो जाये...।
सुनार पहले तो हँसा– ‘यार।! और बता कुछ। मरने दे बुढि़या को– सारी उम्र तो अन्न दान नी किया। अब करेगी घोड़े और गीता का दान। तब होनी बैतरणी पार। होर धर्मराज कहेगा कि दानवीर कर्ण के बाद यदि कोई हुआ है तो वह है गंगा भाभी।’ हँसा वह।
मैं प्रतिमा के लिए आग्रह करता इससे पहले ही उसने सोने की तार का टुकड़ा अरणी पर पतला करना शुरू कर दिया। प्रतिमा सुबह मिल जायेगी। आश्वस्त हो मैं भाभी के घर आया। वे लोग उसकी सेवा में मशगूल थे। और वह बेबश। लगभग बेहोश सी।

मैं गहरी नींद में सोया था कि दरवाजे पर दस्तक हुई। दरवाजा खोला, भाभी के हिस्सेदारों का बड़का था, ‘चाचा जी ! नीचे चलो जरा।’
समय की नजाकत समझ मैं नीचे आया देखा, भाभी की सांसों की गति धीमी और मुंह खुलता-बंद होता जा रहा था। मैंने सिरहाने रखा गंगा जल का एक चमच भाभी के मुंह में डाला। उसने पानी की तरावट से आंखें खोलीं, मुझे देख एक प्रश्न भरा हुआ लगा– गुप्तदान। मैंने कहा, ‘हौंसला रख, सुबह हो जायेगा।'
पर ये क्या यह तो आंखें पलटने लगी। नाड़ी पर हाथ रखा, नाड़ी हटने लगी। फिर एक क्षण में ही मैंने सिरहाने के नीचे से पंचरत्न की पुड़िया निकाली और मुंह में झाड़ दी। पीछे मुड़ कर टोकरी से गीता की पुस्तक उठाई और उसके ठण्डे हाथों में रख दी। पर ये क्या, उसकी नाड़ी तो बंद हो गई थी। पुस्तक यूं ही पकड़ी और फिर टोकरी में रख दी। सोने का घोड़ा तो सुबह मिलना था– यदि पास होता तो शायद मैं उसे भी उसके हाथ पर रखता।
गंगा भाभी की इहलीला समाप्त होई गई थी। हमने उसे बिस्तर से उतारा। केले के पत्तों की सेज बिछाई और उत्तर सिरहाना कर लिटा दिया। तभी बड़के ने शंख में सीधी फूंक मारी। शंख किनारे रख कर जेब से एक स्टॉंप पेपर निकाला, दिखाते हुए कहा, ‘चाचा जी इन्होंने अपनी चल-अचल सम्पत्ति मुझे दान कर दी है।’ कोर्ट के कागजों पर भाभी का अंगूठा था। बड़के ने कागज तह कर अपनी जेब में रख दिये। फिर बोला, ‘चाचा जी, आप गवाह रहेंगे। लोग आने वाले हैं सो दस्तखत बाद में कर लेंगे। आप जानते हैं प्रापर्टी का मामला है। हां ! यदि दस्तखत आप नहीं करेंगे तो उसका भी इंतजाम मैंने किया है।’ उसकी धमकी समझ मैं अवाक किनारे हट गया।


लेखक संपर्क :
2, हरबंस काटेज
संजौली, शिमला-171006
दूरभाष : 0177-2842308
094184-78868





तीन कविताएं/ अंजना बख्शी
(1) बेटियाँ






बेटियाँ रिश्तों-सी पाक होती हैं
जो बुनती हैं एक शाल
अपने संबंधों के धागों से।

बेटियाँ धान-सी होती हैं
पक जाने पर जिन्हें
कट जाना होता है जड़ से अपनी
फिर रोप दिया जाता है जिन्हें
नई ज़मीन में।

बेटियाँ मंदिर की घंटियाँ होती हैं
जो बजा करती हैं
कभी पीहर तो कभी नैहर में।

बेटियाँ पतंगें होती हैं
जो कट जाया करती हैं अपनी ही डोर से
और हो जाती हैं परायी।

बेटियाँ टेलिस्कोप-सी होती हैं
जो दिखा देती हैं– दूर की चीज पास।

बेटियाँ इन्द्रधनुष-सी होती हैं, रंग-बिरंगी
करती हैं बारिश और धूप के आने का इंतजार
और बिखेर देती हैं जीवन में इन्द्रधनुषी छटा।

बेटियाँ चकरी-सी होती हैं
जो घूमती हैं अपनी ही परिधि में
चक्र-दर-चक्र चलती हैं अनवरत
बिना ग्रीस और तेल की चिकनाई लिए
मकड़जाले-सा बना लेती हैं
अपने इर्द-गिर्द एक घेरा
जिसमें फंस जाती हैं वे स्वयं ही।

बेटियाँ शीरी-सी होती हैं
मीठी और चाशनी-सी रसदार
बेटियाँ गूँथ दी जाती हैं आटे-सी
बन जाने को गोल-गोल संबंधों की रोटियाँ
देने एक बीज को जन्म।

बेटियाँ दीये की लौ-सी होती हैं सुर्ख लाल
जो बुझ जाने पर, दे जाती हैं चारों ओर
स्याह अंधेरा और एक मौन आवाज़।

बेटियाँ मौसम की पर्यायवाची हैं
कभी सावन तो कभी भादो हो जाती हैं
कभी पतझड़-सी बेजान
और ठूंठ-सी शुष्क!

(2) कराची से आती सदाएँ

रोती हैं मजारों पर
लाहौरी माताएँ।

बांट दी गई बेटियाँ
हिन्दुस्तान और पाकिस्तान की सरहदों पर।

अम्मी की निगाहें
टिकी हैं हिन्दुस्तान की धरती पर
बीजी उडि़कती है राह
लाहौर जाने की।

उन्मुक्त विचरते पक्षियों को देख-देख
सरहदें हो जाती हैं बाग-बाग।

पर नहीं आता कोई
पैगाम काश्मीर की वादियों से
मिलने हिन्दुस्तान की सर-ज़मीं पर।

सियासी ताकतों और नापाक इरादों ने
कर दिया है क़त्ल
अम्मी-अब्बा के ख्वाबों का
सलमा की उम्मीदों का
और मचा रही हैं स्यापा लाहौरी माताएँ
बेटियों के लुट-पिट जाने का
मौन गमगीन है
तालिबानी औरतों-मर्दों के
बारूद पे ढेर हो जाने पर।

लेकिन कराची से आ रही है सदाएँ
डरो मत...
मत डरो...
उठा ली है
नुसरत ने बंदूक।

(3) औरतें


औरतें मनाती हैं उत्सव
दीवाली, होली और छट्ट का
करती है घर भर में रोशनी
और बिखेर देती हैं कई रंगों में रंगी
खुशियों की मुस्कान
फिर, सूर्य देव से करती हैं
कामना पुत्र की लम्बी आयु के लिए।

औरतें मुस्कराती हैं
सास के ताने सुनकर
पति की डांट खाकर
और पड़ोसियों के उलाहनों में भी।

औरतें अपनी गोल-गोल
आँखों में छिपा लेती हैं
दर्द के आँसू
हृदय में तारों-सी वेदना
और जिस्म पर पड़े
निशानों की लकीरें।

औरतें बना लेती हैं
अपने को गाय-सा
बंध जाने को किसी खूंटे से।
औरतें मनाती है उत्सव
मुहर्रम का हर रोज
खाकर कोड़े
जीवन में अपने।

औरतें मनाती हैं उत्सव
रखकर करवाचौथ का व्रत
पति की लम्बी उम्र के लिए
और छटपटाती हैं रात भर
अपनी ही मुक्ति के लिए।

औरतें मनाती हैं उत्सव
बेटों के परदेश से
लौट आने पर
और खुद भेज दी जाती हैं
वृद्धाश्रम के किसी कोने में।

कवयित्री संपर्क :
207, साबरमती हॉस्टल
ज्वाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी
नई दिल्ली–110067



दो लघुकथायें/रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
विजय–जुलूस
नेताजी का विजय-जुलूस निकल रहा था। ‘जिन्दाबाद’ और ‘जय हो, जय हो’ के नारे लगाती हुई भीड़ आगे बढ़ी। जुलूस के आगे-आगे चलने वाला युवक सड़क के बीचोंबीच पड़ी लाश को देखकर झपटा। उसने टाँग पकड़कर लाश को घसीटा और एक किनारे कर दिया।
‘‘इसे भी आज ही मरना था।’’
‘‘जीकर क्या करता?’’
‘‘अपने देश में भिखारियों की संख्या बढ़ती जा रही है।’’
पास से गुज़रता एक भिखारी ठिठक गया– ‘‘अरे! ये तो जोद्धा है।’’
‘‘जोद्धा! किस लड़ाई का जोद्धा?’’ किसी ने व्यंग्यपूर्ण लहजे में पूछा।
‘‘आज़ादी की लड़ाई में गोलियाँ खाई थीं इसने साहब। हाथ-पैर छलनी हो गए थे। न किसी ने रोटी दी न काम दिया। भीख माँगकर पेट भरता था…’’ भिखारी बोला।
उसने पास में मैली-कुचैली झोली उलट दी। कई बदरंग चिट्ठियाँ इधर-उधर बिखर गईं। जोद्धा को बड़े-बड़े नेताओं के हाथ की लिखी चिट्ठियाँ!
विजय-जुलूस आगे निकल चुका था।

प्रवेश-निषेध
एक बार राजनीति वेश्या के अड्डे पर पहुँची। दरवाज़े पर खड़े बूढ़े दलाल ने उसको सिर से पैर तक घूरा–‘‘तुम कौन हो?’’
“मैं राजनीति हूँ। बाई जी से मिलना है।’’
दोनों की बातचीत सुनकर बाई जी दरवाजे़ की ओट में खड़ी हो गई और बोली–‘‘यहाँ तुम्हारी ज़रूरत नहीं है। हमें अपना धंधा चौपट नहीं कराना। तुमसे अगर किसी को छूत की बीमारी लग गई तो मरने से भी उसका इलाज नहीं होगा।’’ कहकर उसने खटाक् से दरवाज़ा बंद कर लिया।


प्राचार्य, केन्द्रीय विद्यालय

आई ई एफ हज़रतपुर-283103

ज़िला- फिरोजाबाद(उत्तर प्रदेश)

ई मेल - rdkamboj@gmail.com

दूरभाष : 03991805777





भाषांतर

बंगला कहानी

आंधी
नीला कर
मूल बंगला से अनुवाद : श्याम सुन्दर चौधरी


बिजली ने यह अच्छा मजाक बना रखा है। रोज़ रात को सोते वक्त ही चली जाती है। इस लोड-शेडिंग से कब छुटकारा मिलेगा पता नहीं। बत्ती का अभाव अधिक नहीं खटकता, पर पंखे के बगै़र तो मानो दम ही निकल जाता है। कितनी भीषण गर्मी है। कहीं भी हवा का नामोनिशान नहीं। आज शाम से ही सुतपा के सिर में दर्द है।
गांव के जिस छोटे-से स्कूल में वह नौकरी करती है, वहाँ पंखा है ही नहीं। रोज़ दस मील दूर बस से जाना पड़ता है। उसके बाद एक मील पैदल। जाते समय भी धूप, आते समय भी। छाता भी सहायता करने में असमर्थ रहता है। बस के अन्दर भी किसी तरह की राहत नहीं। भीड़ भरी बसों में खड़े-खड़े ही जाना पड़ता है।



पसीने की दमघोटू गंध, ऊपर से धक्का-मुक्की। सुतपा का जी मिचलाने लगता। आज लौटकर वह काफी देर तक तसल्ली से नहाती रही। लेकिन उस पर भी आराम कहाँ। शाम के वक्त भी पानी इतना गर्म! ऊपर की टंकी का पानी दिन भर की धूप से तपकर अगर नीचे आएगा तो यही होगा।
स्विच को हाथ लगाते ही पता चला, पंखा बन्द। ‘ओफ, यह लोड-शेडिंग...’ शरीर से फिर पसीना बहने लगा। वह तेजी से लगभग भागती हुई छत पर जा पहुँची, शायद थोड़ी-बहुत हवा मिल जाए। लेकिन, वहाँ भी हवा नहीं है, अपितु मच्छरों का उत्पात मचा हुआ है। वह नीचे उतर आयी। अकारण ही विरक्ति-सी महसूस करने लगी।
चौका-बर्तन करने वाली लड़की जया उससे खाने के बारे में पूछती है तो वह झल्ला उठती है, ‘कुछ नहीं खाना है, तुम जाओ यहाँ से।'
सुतपा का सिर मानो दर्द से फटा जा रहा था। वह फर्श को एक भीगे कपड़े से पोंछकर उस पर लेट गई।
पूरे दो घंटे किस तरह बीत गए, सुतपा जान नहीं पायी। अब पंखा पूरी गति से चल रहा था। हवा में अब कोई ज्यादा गर्मी भी नहीं थी। घर में अंधेरा था। शायद, जया ने ही सोती हुई दीदी की सुविधा के लिए बत्ती बुझा दी थी। उसकी नींद टूटी जया की आवाज़ पर।
‘दीदी, खाना खा लीजिए।'
हड़बड़ा कर उठ बैठी वह। उसे लगा, रात बहुत हो चुकी है। बेचारी जया! बहुत देर से इंतज़ार करती रही होगी। जया को खाना लगाने के लिए कहकर वह बाथरूम की ओर चली गई।
आह, इतना सो चुकने पर भी सिर-दर्द अभी खत्म नहीं हुआ। उसने आँख और मुँह पर पानी की छींटे मारे। हाँ, अब पानी कुछ ठंडा लग रहा है। पलकें कुछ भारी लग रही थीं, शायद अधिक देर सोने के कारण। भूख लग रही थी, पर खाने की इच्छा खत्म हो चुकी थी। आज महीने का अन्तिम बृहस्पतिवार है। आज तो रेडियो में नाटक आ रहा होगा। वह रेडियो चला देती है।
हाँ, नाटक आ रहा है। अब तो दस बज कर पच्चीस मिनट हो चुके हैं। नाटक बहुत पहले से ही शुरू हो गया होगा। वह ध्यान से सुनने की कोशिश करने लगी। रेडियो में एकाएक तेज आंधी चलने की आवाज़ आयी जैसे कोई किसी को बुला रहा है। लेकिन कोई जवाब नहीं। कुंडी खटखटाने की आवाज़, कोई फिर किसी को आवाज़ देता है। कौन बुला रहा है। क्यों बुला रहा है?
कुछ देर तक सुतपा सुनती रही। ऊंह, कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है। वह रेडियो बन्द कर देती है। सिर का दर्द शायद आज खत्म नहीं होगा। वह न चाहते हुए भी नींद की गोली ले लेती है। सिर के ऊपर कृष्णा नगर की बनी हुई काली की मूर्ति लगी हुई थी। सुतपा उसे प्रणाम करती है।
सफेद हल्की लाइन वाली मसहरी को जया ने बहुत खींचकर बांधा है। घर के अन्दर जैसे एक और छोटा-सा घर बन गया हो। नींद का घर लेकिन वहाँ पर भी एक अजीब-सी आंधी। पाँच नंबर पर चलते हुए पंखे की आंधी। अच्छा, रेडियो में जो बुला रहा था, वह क्या अजनबी था– कोई आगंतुक था?
तभी कहीं से कोई आवाज़ आयी। ओह कॉल बेल। हाँ-हाँ... कॉल बेल की ही आवाज़ है। काफी देर से घंटी बजती जा रही है। लेकिन इतनी रात को कौन आया है?... कौन बुला रहा है?... फर्श पर सो रही जया को उठाते हुए बोली, ‘उठ जया, देख तो कौन घंटी बजा रहा है?’ लेकिन फिर कहती है, ‘अच्छा, रहने दे। मैं ही देखती हूँ।'
उसने बत्ती जलानी चाही पर रुक गई। बाहर गेट के पास ही तो लाइट पोस्ट है। पहले खिड़की से देख लूँ, कौन आया है, क्यों आया है।
‘कौन... कौन है उधर?’
‘मैं... मैं हूँ।'
‘मैं कौन?’
‘मैं... मैं...’
सुतपा कुछ समझ नहीं पा रही थी। अंधेरे में उस व्यक्ति को देख पाना आसान नहीं था। तेज आवाज़ में कहती है, ‘इधर खिड़की के पास आइये, यहाँ आकर कहिये।'
हाँ, अब वह आदमी रोशनी में दिख रहा है। नहीं, आदमी नहीं, कोई लड़का है। उस लड़के को अब वह ठीक से देख सकती है।
‘मैं पुरुलिया से आया हूँ... रातुल सेन नाम है मेरा...’
‘क्या बात है... मैं तो आपको... मेरा मतलब तुम्हें ठीक से पहचान नहीं पा रही हूँ।'
‘आप मुझे नहीं पहचान सकेंगी। मैं... मेरा मतलब... मेरे पिता का नाम सुदीप्त सेन है।'
‘सुदीप्त... सुदीप्त नाम तो...’
‘सुदीप्त सेन... यानी बारासात के सुदीप्त सेन... वही, जिनके साथ आप काव्य पाठ किया करती थीं।'

‘ओह... सुदीप्त... बारासात के सुदीप्त सेन... तुम उन्हीं के पुत्र हो?...’
रेडियो क्या फिर किसी ने चालू किया है। अभी भी क्या उसमें वही आंधी चल रही है। इतनी तेज आंधी एकाएक कहाँ से आ गई। आज जैसे बैशाख के आकाश में काला मेघ उतर आया है। उड़ते हुए बालों और आंचल को संभालते हुए सुतपा ने कहा, ‘आओ... आओ... भीतर आओ। जया बाहर का किवाड़ खोल दे। बरामदे की बत्ती जला दे।'
बत्ती जला कर जया ने सदर दरवाजे का ताला खोला। रातुल भीतर आ गया। पहनी हुई साड़ी ठीक करते हुए सुतपा ने डायनिंग टेबल की कुर्सी की ओर इशारा करते हुए बैठने को कहा। आश्चर्य, अब उसे ज़रा भी गर्मी नहीं लग रही है। एक अजीब-सी सिहरन दौड़ गई सारे शरीर में। हथेली को कुछ देर तक रगड़ती रही। दोनों ही हाथ ठंडे लग रहे हैं। अकारण ही थोड़ा झुककर पैर से खींचकर साड़ी को और नीचे करती है। अजीब बात है, ज़बान तो जैसे जड़ हो चुकी है। कुछ बोलते ही नहीं बन रहा।
लेकिन, बात तो कुछ करनी ही है। यह नीरवता कुछ अच्छी नहीं लग रही। सामने बैठा है सुदीप्त सेन का बेटा रातुल सेन। बीसेक साल किस तरह सुतपा के शरीर और मन से दूर जा चुके थे, उसको याद ही नहीं। पर आज सामने उपस्थित हैं वही बीस साल। सुदीप्त सेन का दूसरा जन्म या बीस साल बाद का वर्तमान रातुल सेन। एक...दो... तीन... नहीं, पूरे बीस वर्ष इस तरुण की देह मन और चरित्र में जमा हो गए हैं। इधर बीस बरस किस तरह से सुतपा के शरीर, मन और जीवन से निकल चुके थे।
‘यहाँ कहाँ आये थे? इतनी रात को कहाँ से आ रहे हो?’
रातुल अब तक स्थिर और ठंडी आँखों से सुतपा को देख रहा था। धीरे से जैसे एक पर्दा-सा चेहरे से हट गया। एक हल्की-सी हँसी, कितनी सुन्दर, निर्मल हँसी।
‘मैं यहाँ एक शादी में आया हूँ। मेरे मौसेरे दादा की शादी है न...’
‘ओ, अच्छा... कहाँ है शादी? किस मुहल्ले में?’
‘काली बाजार में। काफी लोग आये हैं।'
‘इतनी रात को तुम्हारा काली बाजार से इतनी दूर आना उचित नहीं है। काफी रात हो गई है। नई जगह है, कोई भी दुर्घटना हो सकती थी।'
‘ऐसी बात नहीं। अब मैं बड़ा हो गया हूँ, डर की क्या बात है। और फिर सड़क पर थोड़े-बहुत आदमी तो चलते-फिरते रहते हैं न।'
‘घर कैसे पहचाना? पता जानते थे?’
‘पता पिताजी ने दिया था।'
सुतपा अचानक कांप उठी, ‘ओ...’
‘आपका पता बताते हुए उन्होंने यहाँ के बारे में अच्छी तरह से समझा दिया था। और एक आश्चर्य की बात मालूम है? वहाँ पर काफी लोग आपको पहचानते हैं।'
‘किसका घर है, बताओ तो...।'
‘समीर गुप्ता, एडवोकेट।'

‘ओ... हाँ... हाँ... पहचानती हूँ। वहाँ पर तो मैं सभी को जानती हूँ।' मन ही मन सुतपा शंकित हुई। परिचित घर में रातुल न ही आता तो अच्छा था।
‘जानती हैं आपके इस मोहल्ले में आकर कितना परेशान हुआ। मकान खोजते हुए सोच रहा था, किसी गलत मकान की कुंडी खटखटाने लग जाऊँ तो...’
सुतपा मन ही मन कहती है, ‘गलत घर में तुम नहीं जा सकते रातुल। भूल जैसी कोई बात तुम्हारे खून में नहीं है।’ लेकिन कहा, ‘पर इतनी रात को ही सही, घर कैसे ढूँढ़ लिया तुमने?’
‘अरे वो ... गली के नुक्कड़ पर पान की दुकान खुली हुई थी। चायवाली दुकान भी बन्द नहीं हुई थी। वो लोग आपको बहुत अच्छी तरह जानते हैं।'
‘वाह... तुम तो बहुत बहादुर हो गए। अच्छा, अब बताओ किस क्लास में हो?’
‘बी.एससी. आनर्स कर रहा हूँ।'
‘बहुत खूब... तुम्हारे और भी तो भाई-बहन होंगे।'
‘हाँ, मेरे बाद तीन बहनें और हैं– सुजाता, सुलपा और सुमना। वो सब स्कूल में पढ़ती हैं। पिताजी ने हम भाई-बहनों को आपके विषय में बहुत कुछ बता रखा है।'
कुछ असहनीय-सा लगा सुतपा को। मेरे बारे में जानते हैं, सबकुछ जानते हैं... कितना जानते हैं। मेरे संबंध में कैसी कहानी उन्हें मालूम है। सुदीप्त ने क्या मेरे खिलाफ गवाह तैयार कर रखे हैं... या यह बीस साल...आज एक स्पष्ट जिज्ञासा लेकर उसके पास आया है।
‘तुम्हारी सूरत तो बिल्कुल तुम्हारे पिता से मिलती है।' सुतपा ने एकटक उसे देखते हुए कहा।
‘आप भी क्या कह रही हैं। पिताजी तो मुझसे कितने सुंदर हैं। सभी कहते हैं कि मैं पिता जैसा लगता ही नहीं हूँ। मेरी बहनें मुझसे बहुत सुंदर लगती हैं। छोटी बहन तो एकदम उनकी तरह लगती है।'
‘अरे वाह! तुम तो बिल्कुल बड़ों जैसी बातें कर रहे हो। पिता का रंग ज़रूर तुमने नहीं पाया, लेकिन इसके अलावा और कोई कमी नहीं है। अपनी अभी की तस्वीर मिलाकर देखना, दोनों एक ही आदमी की मालूम पड़ेंगी। कारण, तस्वीर में रंग का तो पता नहीं चलता न।'
ऐसा नहीं है कि चेहरे में भिन्नता नहीं है। ज़रूर है। लेकिन फिर भी खोये हुए उन बीस सालों को वह इस वक्त पकड़कर रखना चाहती है। रातुल के किसी भी तरह के प्रतिवाद को वह इस वक्त नहीं मान सकती। उसे लग रहा है कि यह सब बातें रुक-रुककर एक आंधी की सृष्टि कर रही हैं। फिर, एकाएक जैसे खिड़की का पर्दा उड़ने लगा। सुतपा ने महसूस किया कि इस वक्त एक सवाल बहुत ज़रूरी हो चुका है, ‘सुदीप्त कैसे हैं?’
कम से कम इतना पूछना आवश्यक लग रहा है, ‘तुम्हारे पिता कैसे हैं?’ पर कोई शब्द उसकी जबान से नहीं निकला। खरखराते हुए गले को साफ करके वह पूछ बैठती है, ‘तुम्हारी माँ कैसी है?’
‘माँ ठीक नहीं है, बहुत दिनों से बिस्तर पर है।'
‘क्यों?... क्या हुआ उन्हें?’
‘ठीक से तो पता नहीं, शायद स्नायु रोग है। डाक्टर ने कहा कि माँ का बायां हिस्सा बहुत दिनों से काम नहीं कर रहा।'
‘लकवा तो नहीं?'
‘नहीं, वह भी नहीं। हाथ-पैर थोड़ा-बहुत हिला लेती हैं, पर उठना मुश्किल होता है।'
कुछ देर के लिए निस्तब्धता छा जाती है। हवा भी स्थिर हो चुकी थी। सुतपा को ध्यान आया कि शाम तक जो सिरदर्द इतनी तकलीफ़ दे रहा था, अब कैसा हल्का हो चला है। हवा में कैसी अजीब ठंडक मालूम पड़ रही है।
रातुल अचानक सुतपा की ओर स्थिर दृष्टि से कुछ पल देखने के बाद पूछता है, ‘पिताजी के बारे में तो आपने कुछ भी नहीं पूछा।'
सुतपा थोड़ी देर के लिए कांप उठी। होंठ सूखे लगने लगे। जीभ जैसे चिपकी जा रही हो। फिर भी, उसने किसी तरह रातुल से कहा, ‘मुझे तो लगता है, तुम्हारे जैसे अच्छे बच्चों के साथ वह ज़रूर सुखी हैं। असल में अक्सर हम सब फूल से ही उस पेड़ की पहचान करते हैं या उसके स्वरूप के बारे में जानने की कोशिश करते हैं। इसलिए तुम्हें देखने के बाद अलग से तुम्हारे पिता के बारे में पूछना याद ही नहीं रहा। सुतपा अपने को ही शाबासी देती हुई मन ही मन कहती है, ‘वाह! आजकल वह बहुत काव्यात्मक वाक्य बोलने लगी है।’
आंधी फिर अब शुरू होने वाली है, रातुल ने उठते हुए कहा, ‘अच्छा, अब चलता हूँ।'
सुतपा भी उठकर खड़ी हो गई। सचमुच आंधी आ रही है। बिजली की चमक उन दोनों के चेहरे पर पड़ने लगी।
‘हाँ, आंधी आ रही है। अब और ज्यादा देर करना उचित नहीं। एक काम करो न, कल सवेरे एकबार आ जाओ। बहुत खुशी होगी।'
‘बहुत मुश्किल है।' रातुल ने सुतपा के चरण-स्पर्श करते हुए कहा। सुतपा जड़वत खड़ी रही। रातुल के सिर पर हाथ रखते ही कैसी कुंठा भर गई उसके भीतर, पर अच्छा भी तो लग रहा है। आँखें थोड़ी देर के लिए बंद हो गईं।
‘भोर को ही हम लोग चल देंगे। मैं जानता था, इतनी रात को आप आराम कर रही होंगी। आप परेशान होंगी, जानकर भी चला आया। जानती हैं क्यों?...’
‘क्यों?’ सुतपा को अपनी सांसें अटकती हुई जान पड़ीं। आखि़र, रातुल क्या कहना चाहता है।

‘मेरी अपनी तो कोई बुआ नहीं। बचपन से हम लोग बुआ के रूप में आपको ही जानते हैं। पिताजी अक्सर आपका जिक्र करते हुए कहते रहे हैं कि आप उनके लिए सगी बहन से भी बढ़कर हैं। आपको देखने की बहुत इच्छा होती थी। पिताजी से कितनी बार कहा, आपके पास ले आने के लिए, लेकिन उनके पास तो समय ही नहीं रहता। आज भी आने को कहा, पर पिताजी नहीं आये। मैंने उनसे पता ले लिया था और समय निकालकर इतनी रात को आपसे मिलने चला आया।'
जया ने किवाड़ खोल दिया। रातुल चला गया। बीस वर्ष फिर जैसे कहीं खो गये। सांस लेने में कष्ट हो रहा था। फिर वहीं शोर, आंधी उठी। बिजली चली गई। फिर अंधकार! जया किवाड़ बंद करके सो गई।
सुतपा को सांस लेने में और भी कठिनाई होने लगी। ऐसे तो सो ही नहीं पायेगी। खिड़की का पर्दा उठा दिया। लाइट पोस्ट की बत्ती जा चुकी थी। उड़ी हुई धूल गीली मिट्टी के ऊपर गिरने लगी। जोरों की बरसात शुरू हो गई। उतनी ही तेज आंधी। हवा की गति इस वक्त कितनी है, कौन जानता है। पानी की बौछार में सुतपा का चेहरा-आँखें भीगने लगे। साड़ी का आँचल शरीर से चिपका जा रहा था।
बादल के गरजने की आवाज़ तीखी हो गई। बिजली की चौंध से आँखें बंद हो जातीं। पानी मुँह और होंठों को भिगोने लगा। सुतपा मुँह पोंछती है। बरसात का पानी क्या नमकीन होता है? आंधी के साथ क्या नमक का पहाड़ उड़कर आता है? उड़ती हुई हवा हल्की होकर आंधी का जन्म लेती हैं? सीने की आग में क्या इतना ही ताप रहता है जो इतने दिनों तक भीतर इसी तरह जमा हुआ था?
रेडियो की आंधी क्या अभी तक चल रही है? आंधी की रात में उस आगंतुक के सांकल खटखटाने पर क्या किसी ने आवाज़ दी है?...

अनुवादक संपर्क:
एच-61/4, साहनी कालोनीकैंट, कानपुर-208004(उत्तर प्रदेश)




नई किताब



“शहर गवाह है”-
सामाजिक विमर्श और इतिहास का अनूठा दस्तावेज
डॉ0 राहुल


रूपसिंह चन्देल ने साहित्य की विविध विधाओं में सार्थक सृजन किया है, किन्तु उनकी पहचान एक कथाकार के रूप में प्रतिष्ठित है- विशेषकर एक उपन्यासकार के रूप में। उपन्यास उनके लिए एक ऐसी विधा है जिसके माध्यम से वह अपने चारों ओर बिखरे जीवन-समाज और ऐतिहासिक परिवेश को अभिव्यक्ति देने में पूरी तरह कामयाब हुए हैं। ‘शहर गवाह है’ उनका सद्य: प्रकाशित उपन्यास है जिसमें कानपुर और उसके निकटस्थ गांवों-कस्बों और नगरों के सामाजिक-बोध के साथ क्रान्तिकारियों के जीवन-दर्शन और उनके कर्तव्य को इस औपन्यासिक कलेवर में बड़ी बारीकी से उद्घाटित किया गया है। अछूते इतिहास के इस अनूठे दस्तावेज को पॉंच भागों में विभक्त किया गया है जो कथात्मक दृष्टि से पारिवेशिक पार्थक्य के बावजूद एक दूसरे से ‘को-रिलेटेड‘ हैं । उदाहरणार्थ – कथान्विति, संवेदनशीलता और प्रभावान्विति के तत्वों का मौलिक निरूपण इसकी अपनी विशेषता है।
थामस हार्डी, लियो तोल्स्तॉ्य, चेखव, शरतचन्द्र और प्रेमचन्द के उपन्यासों की सबसे बड़ी शक्ति जन-जीवन, समाज के स्थानीय रंगों की पहचान और उन्हें उनकी वास्तविकता में गहराई से चित्रित कर देने की योग्यता थी। उन्हें यह भी लगा कि उपन्यास के पात्र अपने देश की स्थानीय मिट्टी के बने होने चाहिए। उपन्यास में नैसर्गिकता तभी आ सकती है जब पात्रों के द्वारा कहा गया एक-एक शब्द उनकी जीवनगत स्थितियों- परिस्थियों द्वारा स्वत: उद्भूत हों। चन्देल के प्रस्तुत उपन्यास में कानपुर और उसके समीपस्थ-क्षेत्रों की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, भौगोलिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों से ही पात्रों-चरित्रों का चयन-चुनाव किया गया है जिससे यह उपन्यास प्राणवान बन गया है।

उपन्यास के तीन भाग जहॉं आजादी-पूर्व के इतिहास के परिप्रेक्ष्य में महान क्रान्तिकारियों के त्याग-बलिदान, ब्रिटिश हुकूमत के काले-कारनामों तथा तत्काकालीन सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक और राजनैतिक स्थितियों के आतिशी अक्स हैं तो शेष दो भाग सामाजिक जीवन के सरोकारों की जीवन्त कथाएं है जिनमें लेखक ने अपनी लेखन-शक्ति का समुचित उपयोग किया है। पूर्वांचल के किसानों की दशा-दुर्दशा के वर्णन तो पहले भी हुए हैं लेकिन यहॉं नये नजरिये से तराशने की कोशिश है। डी0ए0वी0 कॉलेज कानपुर में उपन्यास के प्रमुख पात्र बाबू राधिकारमण सिंह की महान क्रान्तिकारी चन्द्रशेखर आजाद से भेंट और भगतसिंह, विजयकुमार सिन्हा, अजयघोष, सुरेन्द्र पाण्डे, जंगबहादुरसिंह, सुरेश भट्टाचार्य आदि देश-प्रेमियों के प्रसंग, कुरसवां क्लब, प्रकाश पुस्तकालय के संदर्भ को पढ़ते हुए लगता है, मानो इतिहास के पन्ने पलट रहे हों- मन में राष्ट्र- राग का भव्य-भाव भर जाता है । उपन्यास की शुरूआत जसवन्त नगर नामक गॉंव के किसानों के जीवन की विसंगतियों से होती है। बीच- बीच में प्रकृति की मोहक-मार्मिक छवि-छटा से मन आल्हादित होता है अनुभूति के आधार पर सृजित समीक्ष्य उपन्यास में अतीत के आइनें में समकालीन दृश्य संवेदना से समन्वित लगते हैं।
इसमें सन् 1857 की क्रान्ति और कानपुर के सामरिक महत्व के साथ-साथ कानपुर के औद्योगिक विकास, बलवन्त नगर और अन्य कस्बों के विकास- निर्माण का रूपायन अपने पूरे परिवृत्त में उत्कर्ष और ऊंचाई लिए हुए है। क्रान्तिकारी संगठनों, सामाजिक संस्थानों की देश की आजादी में महत्वपूर्ण भूमिका का बहुत यथार्थ अंकन हुआ है। कंजी आँखों वालों के खूनी-खूंखार चेहरों के कच्चे-चिट्ठे भी इस उपन्यास को ऐतिहासिकता प्रदान करते हैं। ‘‘बौखलाए अंग्रेज सिपाही ने पेड़ों की झुरमुट में एक मानवाकार ठूंठ को निशाना साध ताबड़तोड़ गोलियॉं दागी थीं।" रामचन्द्र मुसद्दी और कमला मुसद्दी (जो चन्द्रशेखर आजाद को अपना भाई मानती थीं) का जिक्र और राधिका का कथन – ‘‘ मातृभूमि के लिए आत्माहुति से बढ़कर कुछ नहीं।" उल्लेखनीय हैं।
चन्देल के पूर्व उपन्यास ‘नटसार’ में यथार्थ चेतना की जैसी ताज़गी विद्यमान है उसकी जैसी ही अनुभूति – ‘शहर गवाह है' में भी होती है। उपन्यासकार ने बड़ी शिद्दत से आँचलिकता की सभी विशेषताओं को जूही की माला में चम्पक पुष्पों की भॉंति पिरो दिया है। वृहद कलेवर में रचित इधर एक दशक के कुछ चर्चित-अचर्चित उपन्यासों को देखें और उनका आकलन करें तो यह बात साफ हो जाती है कि अन्तर्मन की अनुभूतियों को अधिक अभिव्यक्ति देने के कारण वे पाठक से जुड़ गए। यह जन-जुड़ाव ही उनकी लोकप्रियता की पहचान है। चन्देल का आलोच्य उपन्यास आत्मान्वेषण के स्तर पर समाज-जीवन के सत्य से साक्षात्कार करने वाला उपन्यास है। यह सामाजिक-ऐतिहासिक कथा का ऐसा सुष्मित समन्वय है कि ऐसा प्रतीत होता है कि अतीत की कोई महाकाव्यात्मक कथा रच दी गयी है। सचमुच साधारण सामाजिकता में ही नयी विशिष्टता की खोज साहित्यिक सृजन का सबसे बड़ा मूल्य है।
उपन्यास में सामाजिक जीवन के बीच व्याप्त खोखलापन और व्यक्तिमन की तड़प और ललक का अभीष्ट चित्रण हुआ है। लेखक व्यक्ति को उसके पूरे परिवेश मे रखकर देखना चाहता है। यद्यपि कहीं-कहीं पात्रों को उनके पूरे परिवेश सहित चित्रित करने के चक्कर में उन्हे छोड़ दिया गया है, या उनकी पकड़ कुछ ढीली पड़ गयी है, जिससे उन्हें सीधे जिन्दगी के धरातल पर खड़ा कर दिया गया है। दिलीप सिंह, भूरेसिंह ऐसे ही पात्र-चरित्र हैं। बरक्स इसके कि पात्र और परिवेश स्वत: ही सप्राणता और प्रामाणिकता पा जाते- खलीलुर्रहमान, जैतुन्निसा, हीरानन्द और सुखई सिंह परिगण्य पात्र हैं, जो ज़िन्दगी को जोड़ने के लिए अभिशप्त हैं। भीतर टूट चुके समर बहादुर सिंह बाहर से मजबूत दिखते हैं मगर इकट्ठे होकर दिशाहीन और अलग- अलग रहकर गतिहीन बने रहना कुछ लोगों की नियति होती है। लेखक ने ऐसे व्यक्तियों के द्वन्द्व- पीड़ा को भी बड़ी गहराई से उकेरा है ।

उपन्यास में वस्तुगत विस्तार है - आधुनिक सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, नैतिक विकृतियों की समस्या का विस्तार! अन्तर्बाह्य जन-जीवन के मूल्यगत सामाजिक- राजनीतिक निरूपण का मोह लेखक को निरन्तर बॉंधे हुए है। इसीलिए औपन्यासिक घटनाओं को किसी कथासूत्र में संवारने के बजाय वह मन:स्थितियों और प्रकृति का चित्रण जगह- जगह करते चलते हैं ‘‘पश्चिमी क्षितिज में सिन्दूरी रंग बिखेरे हुए सूर्य ने किरणें समेट ली थीं।" ‘‘जून के अन्तिम सप्ताह का पहला दिन था। सुबह से ही आसमान में बादल छाये हुए थे। रात वर्षा हई थी, परन्तु सुबह पॉंच बजे के आसपास वर्षा थम गयी थी। लेकिन काले-भूरे बादलों के समूह पश्चिम की ओर दौड़ते दिखाई दे रहे थे। मंथर गति से हवा बह रही थी।" ‘‘प्रभा छत पर चली गयी। उसे सारा शहर कोहरे में डूबा हुआ नज़र आया। कहीं-कहीं टिमटिमाती रोशनी दिख रही थी।" इससे कथा में सहज रोचकता आ गयी है। लेखक ने कथा-भाव में पारम्परिक रूढ़ि को तोड़ने का प्रयास भी किया है जिससे प्रस्तुत उपन्यास शिल्प के पृथक प्लेटफार्म पर अवस्थित है।
इसमें कोई सन्देह नहीं कि रूपसिंह चन्देल का उपन्यासकार अपने कथ्य के प्रति बड़ा सजग और सतर्क दिखता है । शहरी संस्कृति और सोच के साथ ग्राम्यबोध के बिम्ब मन को मुग्ध करते हैं। आंचलिकता के रंग स्वाभाविकता को बढ़ाते और प्रामाणिकता पैदा करते हैं। निर्मला कहती है ‘‘ हम पुरखन की ड्योढ़ी छोडि़ कै न जइबे।" हलधर बाजपेयी की क्रान्तिधर्मी सोच, उनकी आत्मकथा का प्रसंग और सन् 1927-28 का देशव्यापी मजदूर आन्दोलन, 9 अगस्त 1925 का काकोरी काण्ड, साइमन कमीशन और 1932 का व्यापक क्रान्तिकारी आन्दोलन राष्ट्रीय चेतना को जगाते हैं। अंग्रजों के विरुद्ध अनेक संगठनों की उठती विद्रोही लौ-लहर, और अंकित तिथियॉं साक्ष्य पेश करती हैं - ‘‘जब महान क्रान्ति-पुरुष हलधर बाजपेयी वास्तविक आज़ादी का सपना देखते असम के गोलाघाट नामक स्थान में एक मकान के मलबे में दबकर समाप्त हो गये थे। वह 18 अगस्त 1950 का दिन था।" लेखक को भी महसूस होता है कि हम स्वाधीन तो हो गए मगर स्वतन्त्र नहीं। विकास, नव-निर्माण की गति धीमी है। यहॉं मोहभंग का स्वर तो नहीं पर चेतना आक्रान्त अवश्य है – ‘‘ छुटभैय्ये सत्ता में हिस्सेदारी के लिए बेताब हैं। यही नहीं, कल तक दबे-छिपे अंग्रेजों का साथ देने वाले राजे-महाराजे, जमींदार, जागीरदार आज कांग्रेस में घुसकर अपनी जगह मजबूत बनाने की कोशिश में हैं। मुझे देश का भविष्य बहुत उज्वल नहीं दिख रहा। इनका शासन का ढंग अंग्रेजों से भिन्न नहीं होगा। क्या पता ये भी उनका अनुकरण करें … अभी न सही… बाद में … यानी जातीय संघर्ष को बढ़ावा दो - बॉंटो और शासन करो।
राधिकारमण सिंह की उक्त उक्ति को यथार्थ के परिप्रेक्ष्य में देखें तो यह अवधारणा सहज में ही हो सकती है कि वस्तुनिष्ठ सघन अनुभव होने के नाते यथार्थ में अस्तित्ववादी दर्शन की दृष्टि (भी) रहती है। अस्तित्ववादी चिन्तन ने आज जटिल परिवेश में उलझी स्थितियों को समझने की शक्ति और दिशा भी दी है। अस्तु, चाहे सही समाधान न मिले पर असली जायजा जरूर मिल जाएगा। आजादी के पार्टीशन के दौरान कानपुर में विस्थापित परिवार की दारुण दशा-व्यथा का चित्रण दिलकश है। देवेन्द्र अहूजा का परिवार एक ऐसा ही समस्याग्रस्त परिवार है जिसने बॅंटवारे के दर्दीले दंश को देखा, भोगा, जिया है। पाकिस्तान में अपने घरवालों से बिछड़ जाना, दिल्ली के कश्मीरी गेट इलाके में आकर अस्थायी रूप से बसना और फिर कानपुर प्रस्थान-विस्थापन। अकेलेपन की गहरी अनुभूति, राधे की मॉं निर्मला की मृत्यु, कहीं राधिका को पुत्र-पुत्रियों के भविष्य की चिन्ता तो कहीं अपने दायित्व और कर्तव्य के प्रति निर्णय लेने की विवशता-विफलता, तो कहीं प्रेम-प्रणय के प्रसंग आत्माविभक्ति की ओर ले जाते हैं। वितृष्णा भी जगाते हैं। प्रेम-प्रसंग से गुजरते हुए अज्ञेय ( शेखर : एक जीवनी ) के शेखर की याद ताजा हो आती है।
उपन्यास का उत्तरार्द्ध सामाजिक जीवन-बोध से विशेष जुड़ा है। राधिका रमण के अतीत जीवन की मार्मिक झांकी-मन को सिक्त और रिक्त करती है। चित्रदर्शन बाबू की मृत्यु से उनके जीवन में उदासी भर आती है। एक प्रकार की मुक्ति तथा आरोपित जीवन जीने के लिए मजबूर से बन जाते हैं राधिकारमण सिंह। पुत्री शैलजा के अपने पति के साथ उनके मानसिक असन्तुलन का लाभ उठाकर छद्म रूप से उनके द्वारा बनवाई गई ‘कोठी ठाकुरान‘ की वसीयत अपने नाम करवा लेना और छोटी बेटी नमिता का कोठी से भावात्मक जुड़ाव और अंत में शैलजा के पति शिवम सिद्धार्थ द्वारा कोठी को बेच दिये जाने के बाद उस पर- ‘‘कोठी इस्माइल खॉं" खुदा देखकर नमिता का विक्षिप्त हो जाना वाकई मनोवैज्ञानिक व्यंजना का उत्कर्ष लिए हुए है। इस प्रकार कहीं कथा-शैली, कहीं आत्मकथात्मक शैली, कहीं मनोविश्लेषणात्मक शैली, कहीं वर्णनात्मक, कहीं संवाद और कहीं पत्र शैली में रचित यह उपन्यास अपने भीतर कर्मशील प्रेरणाओं, अनुप्रेरणाओं, सम्प्रेषणाओं और संवेदनाओं को विश्वसनीय बनाता है और व्यक्तित्व की पारदर्शिता में पात्रों के चरित्र का विज़न सौंपता है - ऐसा प्राय: कम औपन्यासिक कृतियों में प्राप्त होता है।
सारत: हर उम्दा उपन्यास अपने समय-समाज को सार्थक शब्द देता है। ‘शहर गवाह है’ में भी परिवेश-जन्य युग-स्थिति और जीवन्त पात्रों का सहज सम्बन्ध स्थापित हुआ है। कालजयी कृति के विशिष्ट गुण-तत्व से युक्त यह उपन्यास आँचलिक संस्पर्श और स्थानीय रंग; त्महपवदंस बवसवनत ंदक सवबंस जवनबीद्ध से अधिक मूर्तमान हो उठा है । चन्देल के लेखन की विशेषता है कि आंचलिक बोध की तूलिका से वे अपनी कथात्मक रचना को अधिक आकर्षक, रोचक और मार्मिक बना देते हैं। अवधी, भोजपुरी शब्द-प्रयोग के साथ अंग्रेजी के शब्द कथा – प्रवाह में बाधक नहीं, बल्कि मिठास घोलते हैं। लोकोक्तियों तथा लोकगीतों के प्रयोग से अतिरिक्त स्वाभाविकता आ गयी है। यूं उपन्यास को पढ़ते हुए कानपुर शहर का एक ‘अब्सट्रेक्ट’ मन-मस्तिष्क में उभरता है और शिल्प-विध के अभिनव प्रभावी-प्रयोग से आश्वस्त कर जाता है ।
समीक्षित कृति :
‘शहर गवाह है’ – लेखक : रूपसिंह चन्देल
भावना प्रकाशन, 109 -ए , पटपड़गंज,
दिल्ली – 110 091
मूल्य – 450/ – पृ0 384






गतिविधियाँ
केन्द्रीय विद्यालय- हज़रतपुर में "लेखक से मिलिए" कार्यक्रम

गत दिनों नेशनल बुक ट्रस्ट दिल्ली की ओर से केन्द्रीय विद्यालय हजरतपुर में ‘‘लेखक से मिलिए’’ कार्यक्रम का आयोजन सम्पन्न हुआ। इस कार्यक्रम के अंतर्गत विद्यालय की छात्र-छात्राओं ने देश के जाने-माने लेखकों- श्रीमती क्षमा शर्मा–कार्यकारी संपादक नंदन, श्रीमती सुरेखा पाणंदीकर एवं द्विजेन्द्र कुमार सम्पादकीय सहायक ‘पाठक मंच बुलेटिन’ से उनकी लेखन प्रक्रिया, उपलब्धियों एवं उनकी रचनाओं के बारे में अनेक प्रश्न पूछकर अपनी ज्ञान-पिपासा को शान्त किया। छात्रों के प्रश्न के उत्तर में देते हुम श्रीमती सुरेखा पाणंदीकर ने कहा कि जीवन की छोटी से घटना भी कभी-कभी कहानी बन जाती है, जो कि बाद में पुस्तक के रूप में पाठकों के सामने आती है। अपनी पुस्तक ‘चिटकू’ का उदाहरण देकर उन्होने अपने कथन को प्रमाणित किया। एक अन्य प्रश्न के उत्तर में श्रीमती सुरेखा ने बताया कि उनकी पुस्तक ‘सहेली’ की प्रेरणा उन्हें राजस्थान यात्रा के समय एक बालिका के चरित्र से मिली। श्रीमती सुरेखा पाणंदीकर को हिन्दी साहित्य अकादमी पुरस्कार, भारतेन्दु पुरस्कार तथा एशियन कल्चरल सोसाइटी द्वारा भी सम्मानित किया गया हैं।
श्रीमती क्षमा शर्मा के मतानुसार छोटे शहरों में आज भी लड़कियों के लिए उन्नति के पर्याप्त अवसर नहीं हैं। इसकी तुलना में महानगरों में लड़कियों के लिये ज्यादा अवसर हैं। अपने संघर्षमय जीवन का उदाहरण देते हुए कहा कि व्यक्ति में अगर साहस है तो वह विपरीत परिस्थितियों में भी बड़ा कार्य कर सकता है। अपने विगत तीन दशकों में लेखन फिल्म, दूरदर्शन आदि पर अपनी प्रतिभा दिखा चुकी श्रीमती क्षमा शर्मा देश के कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित हो चुकी हैं- यथा, हिंदी साहित्य अकादमी पुरस्कार, भारतेन्दु हरिशचन्द पुरस्कार आदि।


क्या इलैक्ट्रानिक मीडिया के कारण देश की कई प्रतिष्ठित साहित्यक पत्रिकाओं का प्रकाशन बंद हुआ है? प्रश्न के उत्तर में श्रीमती शर्मा ने कहा- इसके लिये इलैक्ट्रानिक मीडिया को दोष देना गलत है। इसका वास्तविक कारण पाठक की रूचि में परिवर्तन है, वास्तव में तो इलैक्ट्रानिक मीडिया ने प्रिंट मीडिया को फायदा पहुँचाया है। अपने कथन को प्रमाणित करने के लिये उन्होने भीष्म साहनी के उपन्यास तमस का उदाहरण दिया। जिसके टी.वी. पर प्रसारित होने पर इस उपन्यास की माँग बढ़ी।
श्रीमती क्षमा शर्मा, द्विजेन्द्र कुमार एवं श्रीमती सुरेखा पाणंदीकर ने सभी छात्र-छात्राओं का आहवान किया कि वे अधिक से अधिक संख्या में लेखन से जुड़ें।
श्रीमती सुरेखा एवं श्रीमती क्षमा शर्मा ने बच्चों के साथ मिलकर ‘किताबों की दुनिया, हमारी ये दुनिया’ आशु कविता की रचना की।

आमंत्रित अतिथियों का स्वागत करते हुए केन्द्रीय विद्यालय ओ.ई.एफ. हजरतपुर के प्राचार्य रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ ने विश्वास व्यक्त किया कि नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा आयोजित कार्यक्रम से विद्यालय के छात्र-छात्राओं में लेखन के प्रति रूचि बढ़ेगी तथा लेखकों से विभिन्न प्रश्नों पर प्रश्न कर वे उनका यथोचित उत्तर पा सकेंगे। प्रश्न मंच कार्यक्रम में विद्यालय के कु. पल्लवी दीक्षित, कु. पूजा गौतम, सोनाली सिंह, शालिनी, कु. सुलेखा, आदित्य राणा, मनीष गौतम, नीरज पांडे, कु. भूमिका शर्मा, ऋचा भारती, अजीत सिंह, गजेन्द्र यादव, शेखर सुमन पांडे ने भाग लिया। कार्यक्रम के अन्त में प्रश्नकर्ता सभी छात्रों को पुरस्कृत किया गया। कार्यक्रम का संचालन ऋषि कुमार शर्मा पुस्तकालय अध्यक्ष ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन चन्द्र देव राम उप प्राचार्य द्वारा किया गया। कार्यक्रम के आयोजन में डा0 रेखा, श्रीमती गीता प्रकाश, श्रीमती सुदेश दत्त शर्मा, अखिलेश गोस्वामी, रवि मोहन एवं रवि शंकर ने सक्रिय सहयोग प्रदान किया।




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फरवरी 2008

-मेरी बात
-एस आर हरनोट की हिंदी कहानी- “मोबाइल”।
-देवी नागरानी की ग़ज़लें।
-अशोक भाटिया की लघुकथायें।
-“भाषान्तर” में लियो ताल्स्ताय के उपन्यास “हाजी मुराद” के धारावाहिक प्रकाशन की पहली किस्त। हिंदी अनुवाद : रूपसिंह चन्देल।
-“नई किताब” के अंतर्गत द्रोणवीर कोहली के उपन्यास “चौखट” पर सुभाष नीरव की समीक्षा
-“गतिविधियाँ” के अंतर्गत माह जनवरी 2008 में सम्पन्न हुई साहित्यिक/सांस्कृतिक गोष्ठियों की रपट तथा संक्षिप्त समाचार।