मंगलवार, 6 मई 2008

साहित्य सृजन – अप्रैल-मई 2008(संयुक्तांक)

मेरी बात

सुभाष नीरव

मंहगाई का गहराता संकट और खत्म होती कृषि ज़मीन
मंहगाई की मार से आज हरतरफ त्राहि-त्राहि मची है। कहते हैं कि मंहगाई की ऐसी मार पहले कभी नहीं पड़ी। इधर, ‘जनसता’ के 4 मई 2008 के अंक में सत्येंद्र रंजन का इसी समस्या पर एक बेहद महत्वपूर्ण आलेख प्रकाशित हुआ है– “अब सवाल पेट भरने का है”। सत्येंद्र रंजन अपने आलेख में इससे जुड़े प्रमुख सवालों से ही नहीं टकराते, इस समस्या के पैदा होने के कारणों को भी खोजने की कोशिश करते हैं। वह कहते हैं कि दुनिया जिस समय विकास के एक नए स्तर पर पहुंची मानी जा रही है, उसी समय मानव समाज को सबसे बुनियादी समस्या ने घेर लिया है। समस्या खाने की है। अनाज का गहरा संकट सारी दुनिया में पैदा हो गया है। उन्होंने इसकी दो वजहें बताई हैं– इंसानी और आसमानी। आसमानी वजहों जिसके पीछे एक हद तक इंसान का ही हाथ मानते हैं, में आस्ट्रेलिया में पिछले दो साल से पड़ रहे अकाल को मानते हैं। आस्ट्रेलिया दुनिया में गेहूं का दूसरा सबसे बड़ा निर्यातक है। इस अकाल के चलते वहां से निर्यात न हो पाने की वजह से विश्व बाजार में गेहूं की भारी कमी हो गई है। मलेशिया और फिलीपींस जैसे पूर्वी एशियाई देशों में चावल की पैदावार घटने से ऐसी ही स्थिति चावल को लेकर बनी है। इंसानी वजहों का जिक्र करते हुए सत्येंद्र रंजन कहते हैं कि कुदरत की मार पर आसानी से काबू पाया जा सकता था अगर अमेरिका और लातिन अमेरिका के कुछ देशों में अनाज की खेती के लिए उतनी जमीन मौजूद रहती जितनी अभी हाल तक रहती थी और वहां अनाज का इस्तेमाल खाने की बजाय दूसरे मकसद के लिए नहीं होता। दरअसल कच्चे तेल के बढ़ते दाम और तेल के भंडार खत्म होने के अंदेशे की वजह से अमेरिका जैसे देशों ने जैव–ईंधन पर जोर देना शुरू किया है। वहां मक्के और गन्ने की खेती ज्यादा जमीन पर की जाने लगी है और इन फसलों का इस्तेमाल खाने की बजाय इथोनेल और बायो-फ्यूएल यानी जैव–ईंधन बनाने के लिए होने लगा है। वह अनाज के लिए उपलब्ध जमीन और अनाज की मात्रा दोनों में आई कमी को विश्व बाजार में अनाज की कमी और कीमतों में वृद्धि का कारण मानते हैं। दूसरी तरफ, भारत की स्थिति का जायजा लेते हुए सत्येंद्र कहते हैं कि हाल के वर्षों में भारत में अनाज के बजाय कपास और ऐसी दूसरी फसलों की खेती का चलन बढ़ता गया है जिसे बाजार में बेच कर पैसा कमाया जा सके। किसान ऐसी खेती करने के लिए इसलिए मजबूर होते हैं कि अनाज का उन्हें भरपूर दाम नहीं मिलता और अनाज उपजाने वाले किसान गरीबी में दम तोड़ते रहते हैं। यही नहीं भारत में भी अब जैव–ईंधन को बढ़ावा मिल रहा है। बताया जाता है कि सरकार 2017 तक देश की परिवहन ईंधन की कुल जरूरत का दस फीसदी जैव ईंधन से हासिल करना चाहती है और इसके लिए एक करोड़ बीस लाख हेक्टेयर में जैव–ईंधन के काम आने वाली फसलें ही उगाई जाएंगी। सत्येंद्र रंजन इसे एक दुश्चक्र मानते हुए कहते हैं कि दुनिया भर के गरीबों के मुंह से आहार छीनने के हालात पैदा किए जा रहे हैं। गेहूं, चावल, अनाज, दलहन और तिलहन की खेती की जमीन में लगातार होती गिरावट के साक्ष्य में जो आंकड़े वह प्रस्तुत करते हैं, वे चौकाने वाले हैं। वे बताते हैं कि भारत में पिछले वर्ष दो करोड़ बयासी लाख चौदह हजार हेक्टेयर जमीन पर गेहूं की खेती हुई थी, मगर इस साल यह खेती सिर्फ दो करोड़ सहतर लाख अड़तालीस हजार हेक्टेयर जमीन पर हुई है। इसी तरह, मोटे अनाजों की पिछले साल सत्तर लाख सत्तावन हजार हेक्टेयर जमीन पर खेती हुई थी जो कि इस साल घट कर अड़सठ लाख सोलह हजार हेक्टेयर रह गई है। यही हाल दालों और तिलहन का भी है।मेरा मानना है कि इस समस्या के पीछे सत्येंद्र रंजन द्वारा बताए गए कारण तो हैं ही, इसके अतिरिक्त आज दुनिया भर में तीव्र गति से होता विकास भी एक कारण है। विकास के नाम पर शहरों का विस्तार इधर कुछ वर्षों में जिस तेजी से बढ़ा है वह चौकाने वाला है। भारत में दिल्ली, मुम्बई, जयपुर जैसे महानगरों में इस अंधाधुंध विकास को देखा जा सकता है। शहरों ने अपने आसपास के गांवों की खेती योग्य जमीन को बड़ी तेजी से लीला है और लीलने की यह प्रक्रिया अभी भी निरंतर जारी है। जहां पहले हरे भरे लहलहाते खेत हुआ करते थे, वहां मल्टी स्टोरी आवासीय फ्लैट्स, शापिंग माल्स, कारपोरेट दफ्तर आदि नजर आते हैं। किसानों से औने पौने दामों में खरीदी गई जमीनों की कीमतें आकाश को छूने लगी हैं। कृषि उपयोगी जमीनों को अगर इसी प्रकार खत्म करने की प्रक्रिया जारी रही तो निश्चित ही आने वाले समय में खाद्यायन और आहार की समस्या भंयकर रूप ले सकती है। सत्येंद्र रंजन ने अपने आलेख में बहुत गौरतलब बात लिखी है कि “दुनिया चाहे विकास की जिस मंजिल पर पहुंच जाए, खेती उसकी बुनियाद बनी रहेगी। बिना भोजन किए न तो अंतरिक्ष की यात्रा की जा सकती है और न इंटरनेट और सूचना तकनीक के जरिए सारी दुनिया से जुड़े रहने का आनंद लिया जा सकता है।”



हिंदी कहानी


घर बोला
सुदर्शन वशिष्ठ

‘कारो !... कारो!’ किसी ने मुझे पुकारा। बहुत ही आत्मीय संबोधन था। नेह भरा, जो सीधा मेरे अंतर्मन में समा गया। बरसों बाद मुझे किसी ने इस नाम से पुकारा।
‘कारो... ओंकारो...’ मेरा बचपन का संबोधन। पैंतालीस बरस की उम्र में कोई पांच वर्ष नाम से पुकारे...कितना रोमांचक लगता है। एक झुरझुरी-सी फैल गई एड़ी से चोटी तक। आज इतने बरसों बाद कौन मुझे इस नाम से पुकार रहा है। एकाएक पांव ठिठक गए और पलटकर देखा। पीछे दूर तक कोई न था। दुकानों में बैठे इक्का-दुक्का लोग अपनी बातों में व्यस्त थे। अपने ही बाजार में सब अजनबी से दिख रहे थे। आपस में बतियाते हुए। चारों ओर देखने पर भी कोई न दिखा तो अनमना-सा मैं आगे बढ़ गया।
एक चमक जो मन में कौंधी थी, उसी क्षण बुझ गई।
हलवाई की दुकान के साथ एक संकरी गली जाती थी। गली क्या, दो दुकानों की दीवारों के बीच न जाने किस कारण बची हुई जगह थी। इस गली से मैं बाजार आया-जाया करता था। कई बार गली में खड़ा हो जेब से सिक्के निकाल हथेली में टटोलता... कहीं गिर तो नहीं गए। घर जाती बार नमकीन सेमियां मुट्ठी भर मुंह में ठूंस लेता। गली के आगे कोल्हू था, जहां कच्ची घाणी का तेल मिलता था, जिसे मुंह पर मलते ही आंखों में आंसू आ जाते। गली के एक ओर खली और तेल की, दूसरी ओर हलवाई के पकवानों की गंध समाई रहती।
संकरी गली में गुजरते ही मेरे पांव नन्हें हो गए, जिस्म हल्का-फुल्का। मैं हवा में फुदकने लगा। जैसे बाजार से सौदा लेकर कंधे में झोला लटकाए भाग रहा हूँ। घर में माँ का इंतजार में है कि गुड़ आएगा तो चाय बनेगी। पता नहीं, कब मैं किसी के पिछवाड़े, किसी आंगन से होकर कुल्ह पर बनी बांस की पुलिया पार कर गया। पुलिया के नीचे तेजी से बह रही कुल्ह के पानी की ठंडी फुहार के छींटे ही महसूस कर पाया, बस। कुल्ह के उस पार सिलनुमा घिसे पत्थरों पर कोई औरत बर्तन मांज रही थी। उससे आगे चाचा के घर तक जाने-पहचाने चौड़े-चकले पत्थर, जिनमें से किस पर पांव रखना है, किस पर नहीं, चाहे छलांग ही क्यों न लगानी पड़े, यह मैं अभी भी नहीं भूला।
चाचा बाहर बैठे थे, लुकाठ की छाया में। मैंने पैर छुए। ‘आओ... आओ... कब आए, यह है ओ पी भारद्वाज...’ उन्होंने प्रसन्नता जाहिर करते हुए पास बैठे अजनबी से परिचय कराया। ‘भारद्वाज कौन ! मैंने पहचाना नहीं।’ अजनबी की लगभग साठ बरस पुरानी आंखों में और अजनबीपन गहरा गया। ‘भाई, यहां रहते थे ये।’ उन्होंने नीचे की ओर इशारा किया। ‘इन्हीं का था ये सब कुछ।’
चाचा की बांह के इशारे से नीचे नजर गई, तो मन धक् से बैठ गया। ढलती धूप में ढहता हुआ घर उदास खड़ा था एकदम मौन।
‘कारो।’ चाचा ने सुन में कहा। ‘हां, हां... कारो... कारो’ वे सज्जन जब ‘कारो’ नाम लेकर जोर से हंसे तो एकाएक बहुत नज़दीकी लगे। हंसते-हंसते वे पुरानी यादों में खो गए।
‘ओ हो। क्या जमाना था वह भी। भाई, आदमियों से ही होता है सब कुछ घर बार, सब। आप तो अब बाहर ही रहते हैं... बचपन के बाद देखे ही नहीं।’ उन्होंने मेरी ओर प्रश्न भरी निगाहों से देखा। मैंने स्वीकृति में सिर हिलाया।
मैं एकाएक 45 वर्ष का हो गया। पांवों की स्फूर्ति की जगह शिथिलता ने ले ली।
तभी जाना, बचपन फिर से नहीं जिया जा सकता। चाय-पानी के बाद मेरे पांव बरबस ही घर की ओर बढ़ गए।
ऊबड़-खाबड़ आंगन में एक और सिल पड़ी थी। जब इस सिल पर दाल पीसी जाती थी, तो समझ लिया जाता था कि आज या तो त्योहार है या किसी का जन्मदिन। बीच में तुलसी का चबूतरा जिसमें उगी घासफूस सूख गई थी। सावन की अंधेरी रातों में इस तुलसी के झरोखे में रखा दीपक माँ की आस की तरह टिमटिमाता था। ऊपर की ओर भाई ने एक बार नींव डाली थी, जिसके पत्थर यादों की तरह आधे डूबे, आधे उखड़े पड़े थे।
आंगन रंगमंच का नाम है। घर यदि नेपथ्य है, तो आंगन खुला मंच जहाँ दृश्य सबके सामने बेपर्दा होकर आता है। आंगन में सभी पात्र एकदम तैयार होकर निकलते हैं, खुशी में, गमी में।
घर ने मुझे देख जोर से पुकारा।
हमारे घर एक ‘घरप्पण’ गाया होती थी, जिसकी माँ, नानी तक हमारे घर की थी। मुझे दूर से आते देख ही रंभा उठती थी। करीब जाते ही वह अपना गला खुजलाने के लिए मेरी बाहों में डाल देती। ठीक गाय के रंभाने की तरह घर का आर्तनाद सुन मेरे पांव वहीं जम गए।
‘पुराने पेड़ों में जीव पड़ जाता है,’ पिता कहा करते थे। तभी पुराने पेड़ को कोई नहीं काटता। कुछ पेड़ गांव में ऐसे थे, जिनकी उम्र सौ बरस बताया करते थे। न कोई इन्हें बेचने का साहस करता, न कोई खरीदने का। जब कभी ऐसा बूढ़ा पेड़ कोई काटता है या आंधी से गिरता है तो जोर से दर्दनाक आवाज में चीत्कार उठता है। पिता ऐसे किस्से सुनाते थे कि गांव के ठीक बीच का फलां पेड़ जब आंधी में गिरा तो इतनी जोर से चिल्लाया कि पहाडि़यों में उसकी प्रतिध्वनि गूंजती रही कई दिन। उसमें रहने वाले देवता, राक्षस, भूत-प्रेत, बेआसरा होकर कई दिन राह चलते लोगों को तंग करते रहे।
पुराने घर में भी पुराने पेड़ की तरह जीव पड़ जाता है।
आंगन की ऊँची घास में एक चिडि़या फुदक रही थी, वही चिडि़या जो आंगन में आए तो समझा जाता कि घर में कोई नया आने वाला है, चाहे वह बालक हो या बछिया। चिडि़या आहट सुनकर फुर्र से उड़ गई। माँ होती तो कहती, ‘इसे मत उड़ाना, यह बढ़त की निशानी है।’ फाख्ता का एक जोड़ा अंदर चोग चुग्ग चुग रहा था, ठीक बीच में कमरे में नि:शंक भाव से।
‘घर के अंदर बुरे होते हैं ये जंगली पखेरू... उड़ा इन्हें।’ माँ की आवाज गूंजी। मैंने यंत्रवत् एक कंकर उठाकर जोर से उधर फेंका। फड़फड़ाकर फाख्ता उड़ गई। चचेरा भाई दौड़ा आया। शायद वह मुझे देख रहा था।
‘सांप तो नहीं था ? यहाँ एक रहता है आजकल।’ भाई ने दूर से देखकर कहा।
‘सांप!’ मैं चौंका, ‘नहीं-नहीं, फाख्ता थी।’
‘फाख्ता !’ वह मुझे हैरानी से देखने लगा।
‘रसोई यहीं थी न,’ मैंने कंकर मारने की झेंप मिटाने के लिए कहा। ‘रसोई, न-न, यहाँ नहीं थी, वह तो अगले कमरे में थी जो गिर गया है। यह जो है उसकी दीवार।’ मैं रसोई वाली जगह से थोड़ी दूर बैठ गया। सच ही रसोई की थोड़ी सी दीवार बची थी, जहाँ पर धुएं के निकास के लिए सुराख बना था।
ढहा हुआ घर सजीव और साकार हो गया। एकदम जिंदा। किसी बुजुर्ग की आत्मा की तरह वह मुझे बोल उठा।
रसोई में माँ के चूल्हे पर चढ़ी सब्जी की भीनी-भीनी गंध फैल रही है, चहुं ओर। न जाने कैसे, माँ चाहे उबालकर ही बनाए, हर चीज़ का अपना ही स्वाद होता है। चूल्हे में जली आग पता नहीं कितनी पीढि़यों से चली आ रही है, पता नहीं वही आदिम आग है, जो कभी अकेला बुजुर्ग यहाँ बसने के साथ अपने साथ लाया था। उपले की राख में छिपी आग हर रात के बाद सुबह ताजा होकर निकलती है। हर रात चूल्हे में उपले दबाती हुइ माँ कहती है– ‘आग मांगी नहीं जाती पगले।’ यह घर की बरकत होती है। यही आग अच्छे और बुरे काम में इस्तेमाल होती है।
पिता हुक्का गुड़गुड़ा रहे हैं, साथ के कमरे में। भाई-बहन कभी अंदर कभी आंगन में भाग रहे हैं। जब ज्यादा हल्ला मचाते हैं तो पिता हुक्के से मुंह हटाकर हुंकार भरते हैं। और हम सब रसोई में दुबक जाते हैं।
‘जिनके घर नहीं होते, वे कहाँ रहते हैं भैया।’ भाई के इस अबोध प्रश्न ने मेरी तंद्रा भंग कर दी। एक खालीपन मुझे लील गया। सच, कहाँ रहेंगे वे, जिनके घर ढहते हैं। घर कवच है जो मर्मस्थलों की रक्षा करता है। सच, घर अपने शरीर की तरह है। बहुत ही अपना, बहुत ही आत्मीय। एकदम निजी। घर एक जानी-पहचानी जगह स्थिर होता है। जाना-पहचाना आंगन, पहचाना पिछवाड़ा, बाग-बागीचा, वहाँ घुप्प अंधेरे में भी सुई तक ढूंढी जा सकती है।
यह घर भी वैसा ही था। अनुराग भरा, एकदम अपना। बैठक में पिता का तख्तपोश, उनके बैठने से घिसी दीवार, जिसके सहारे हर सफलता-असफलता के बाद पिता लेट जाते। कौन-सी खिड़की से कौन-सा दृश्य दिखेगा, कहाँ रिमझिम बारिश आंगन में कुकुरमुत्ते की तरह बरसेगी, कहाँ हवा से लहराते आम के बौर दिखेंगे, कहाँ से लहराते बांस... सब जाना पहचाना।
घर बनता है बड़े चाव से, बड़े अरमान से। बुजुर्गों के मन का नक्शा घर में साकार होता है।
वे बहुत बदनसीब होते हैं, जिनके घर ढहते हैं।
बरसात की शाम थी वह। गड़गड़ाहट के साथ दीवार गिरी थी। पिता हुक्का गुड़गुड़ाते हुए हुक्का हाथ में ही उठाए बाहर आ गए थे। कच्ची ईंटों की धूल उनकी बैठक में भर गई। उनके चेहरे पर विवशता, घबराहट और मायूसी एक साथ उभर आई। पहले कमरे की पहली दीवार गिरी थी, उस बरसात में। उस समय भाई बाहर नौकरी में थे। मैं केवल मूक दर्शक था। इस दीवार के गिरने के बाद भी घर बरसों टिका रहा। बुजु़र्गों में एक सत होता है। शायद उसी सत के सहारे घर एकदम नहीं गिरा, किन्तु ढहता रहा निरंतर। बहनें ब्याही गईं। पहले भाई ने घर छोड़ा, फिर मेरी नौकरी लग गई। पिता गए। माँ कुछ दिन अकेली घिसटती रही। घर ढहता रहा निरंतर... घर तो परिजनों से ही होता है न। दीवारें, ईंट, गारा तो घर नहीं होता।
अंत में चाचा का पत्र आया– ‘भाई तुम्हारा तो दिल्ली बस गया है। तुम अभी नजदीक हो, इसलिए तुम्हें ही लिख रहा हूँ। घर बिलकुल ढह गया है।’ पत्र पढ़ने पर एक दर्दनाक चीख गूंज गई, जो मेरे मन-मस्तिष्क को बेंधती गई।
घर का ढहना एक भयानक और कंपा देने वाली घटना होती है। बहुत आवाज करता है घर ढहती बार। जैसे भूचाल की स्थिति आ जाती है। और भूचाल आए बिना घर का ढहना और यंत्रणादायक हो जाता है, इसकी गूंज दूर-दूर तक फैलती जाती है।
रसोई की बची हुई दीवार में दो छेद बन गए थे। एक छेद जो पहले का था, जहाँ से धुआं निकलता था। उस छेद से कभी-कभी माँ आंगन में आने की आहट सुनकर देखने का प्रयास करती थी। दो छेद देख लग रहा था, माँ की दो आँखें अब भी देख रही हैं, आंगन में आहट जो हुई है। घर ढहती बार माँ ने कहा होगा– ‘घर ! तू यहाँ से मत ढहना। मेरी आँखों के लिए जगह रखना। मेरे छोटे बेटे ने मेरे पास आना है, जो मुझे बहुत प्यारा है। खाना पकाती बार शाम के समय आंगन में आहट होगी तो मैं उसे यहाँ से देखूंगी। वह चुपचाप बिना आवाज किए आता है। फिर भी उसकी आहट से तो मैं पहचान ही जाती हूँ।’
चाचा के घर रात को ठीक से नींद नहीं आई। रात भर गिरते हुए बूढ़े आदमी के सहारे के लिए फैलाईं बाहें दिखती रहीं। जैसे जमीन फट गई हो और कोई उसमें धंसता जा रहा हो। बुजु़र्ग सहारे के लिए पुकार रहा हो, ‘मुझे बचा लो ! मुझे बचा लो ! मेरी बाहों की ताकल निचुड़ गई है।’
गहराती रात में अंधेरे में डूबते जहाज-सा घर बाहें फैलाए ढहता हुआ दिखता रहा। सुबह मुंह अंधेरे ही में, मैं वापस आने लगा तो चाचा ने कहा, ‘यहीं रहना था, आज तुम्हारा भाई बता रहा था, तू वहाँ रो रहा था। बड़ी बेदण आ रही थी... जिस माटी में बढ़े हैं बच्चे, उसका मोह तो होगा ही। अब क्या करना, ऐसा ही है संसार।’ उन्होंने उच्छ्वास लिया।
जब मैंने चलने से पहले पैर छुए तो उन्होंने कहा, ‘हाँ, यदि तुम्हारा यहाँ बसने का इरादा न हो, तो बता देना। जमीन बेचनी हो तो पहले हमें ही पूछना भाई।’
चलती बार बाहर से मैंने नीचे देखा, घर अभी अंधेरे में डूबा हुआ था।
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जन्म:24 सितम्बर 1949, गांव –अरला, पालमपुर तहसील(हिमाचल प्रदेश)
शिक्षा:एम ए (हिंदी), हिमाचल विश्वविद्यालय।
कृतियाँ :सात कहानी संग्रह, दो उपन्यास, दो काव्य संकलन, दो नाटक, दो शोध प्रबंध, चार यात्रा वृतांत। इसके अतिरिक्त, चार कहानी संकलन, दो काव्य संकलनों का संपादन। सोमसी, हिमभारती आदि सरकारी पत्रिकाओं का संपादन।
संप्रति–हिमाचल कला, संस्कृति एवं भाषा अकादमी के सचिव।
दूरभाष–09418085595



ग़ज़लें- द्विजेन्द्र ‘द्विज’

(1)



ख़ुद तो ग़मों के ही रहे हैं आस्माँ पहाड़
लेकिन ज़मीन पर हैं बहुत मेह्र्बाँ पहाड़

हैं तो बुलन्द हौसलों के तर्जुमाँ पहाड़
पर बेबसी के भी बने हैं कारवाँ पहाड़

थी मौसमों की मार तो बेशक बडी शदीद
अब तक बने रहे हैं मगर सख़्त-जाँ पहाड़

सीने सुलग के हो रहे होंगे धुआँ-धुआँ
ज्वालामुखी तभी तो हुए बेज़बाँ पहाड़

पत्थर-सलेट में लुटा कर अस्थियाँ तमाम
मानो दधीचि-से खड़े हों जिस्मो-जाँ पहाड़

नदियों,सरोवरों का भी होता कहाँ वजूद
देते न बादलों को जो तर्ज़े-बयाँ पहाड़

वह तो रहेगा खोद कर उनकी जड़ें तमाम
बेशक रहे हैं आदमी के सायबाँ पहाड़

सीनों से इनके बिजलियाँ,सड़कें गुज़र गईं
वन,जीव,जन्तु,बर्फ़,हवा,अब कहाँ पहाड़

कचरा,कबाड़,प्लास्टिक उपहार में मिले
सैलानियों के ‘द्विज’, हुए हैं मेज़बाँ पहाड़

(2)


ख़ुद भले ही झेली हो त्रासदी पहाड़ों ने
बस्तियों को दे दी है हर ख़ुशी पहाड़ों ने

ख़ुद तो जी हमेशा ही तिश्नगी पहाड़ों ने
सागरों को दी लेकिन हर नदी पहाड़ों ने

आदमी को बख़्शी है ज़िन्दगी पहाड़ों ने
आदमी से पाई है बेबसी पहाड़ों ने

हर क़दम निभाई है दोस्ती पहाड़ों ने
हर क़दम पे पाई है बेरुख़ी पहाड़ों ने

मौसमों से टकरा कर हर क़दम पे दी सबके
जीने के इरादों को पुख़्तगी पहाड़ों ने

देख हौसला इनका और शक्ति सहने की
टूट कर बिखर के भी उफ़ न की पहाड़ों ने

नीलकंठ शैली में विष स्वयं पिए सारे
पर हवा को बख़्शी है ताज़गी पहाड़ों ने

रोक रास्ता उनका हाल जब कभी पूछा
बादलों को दे दी है नग़्मगी पहाड़ों ने

लुट-लुटा के हँसने का योगियों के दर्शन-सा
हर पयाम भेजा है दायिमी पहाड़ों ने

सबको देते आए हैं नेमतें अज़ल से ये
‘द्विज’ को भी सिखाई है शायरी पहाड़ों ने.


(3)



पर्वतों जैसी व्यथाएँ हैं
‘पत्थरों’ से प्रार्थनाएँ हैं

मूक जब संवेदनाएँ हैं
सामने संभावनाएँ हैं

रास्तों पर ठीक शब्दों के
दनदनाती वर्जनाएँ हैं

साज़िशें हैं ‘सूर्य’ हरने की
ये जो ‘तम’ से प्रार्थनाएँ हैं

हो रहा है सूर्य का स्वागत
आंधियों की सूचनाएँ हैं

घूमते हैं घाटियों में हम
और कांधों पर ‘गुफ़ाएँ’ हैं

आदमी के रक्त पर पलतीं
आज भी आदिम प्रथाएँ हैं

फूल हैं हाथों में लोगों के
पर दिलों में बद्दुआएँ हैं

स्वार्थों के रास्ते चल कर
डगमगाती आस्थाएँ हैं

ये मनोरंजन नहीं करतीं
क्योंकि ये ग़ज़लें व्यथाएँ हैं

छोड़िए भी… फिर कभी सुनना
ये बहुत लम्बी कथाएँ हैं.
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नाम: द्विजेन्द्र ‘द्विज’
जन्म: 10 अक्तूबर,1962.
शिक्षा: हिमाचल प्रदेश विश्व विद्यालय के सेन्टर फ़ार पोस्ट्ग्रेजुएट स्ट्डीज़,धर्मशाला से
अँग्रेज़ी साहित्य में सनातकोत्तर डिग्री
प्रकाशन: जन-गण-मन(ग़ज़ल संग्रह)प्रकाशन वर्ष-२००३
कई संपादित संकलनों में ग़ज़लें संकलित।

सम्प्रति: प्राध्यापक:अँग्रेज़ी,ग़ज़लकार, समीक्षक
ई-मेल : dwij.ghazal@gmail.com
दूरभाष : 094184-65008



व्यंग्य


जुर्माना यानी जुर्म का आना

अविनाश वाचस्पति

आजकल देश में जुर्माना लगाने पर ज्यादा जोर है, वसूलने के संबंध में ले देकर भी काम चला लिया जाता है। यह उस समय की स्थिति पर निर्भर करता है। देश को विकास की ओर खींचने में अर्थव्यवस्था की महती भूमिका से कोई अर्थशास्त्री पल्ला नहीं झाड़ सकता है और हमारे देश की इस अर्थ की व्यवस्था के विकास के लिए जुर्माने से बढ़कर कोई विकल्प है ही नहीं। ट्रैफिक नियमों के तोड़ने या उनकी अनदेखी करने पर जो चाल आन की जाती थी, अब उस चाल का दायरा बढ़ाकर पैदलों पर भी आन कर दिया गया है। बल्कि बाकायदा उसे अमली जामा पहना दिया गया है। दिलवालों की दिल्ली में रोज पैदलों से वसूल किया जा रहा जुर्माना इसकी मजबूत मिसाल है। हम जब गाड़ी चलाते हैं तब भी नियमों का कहां ध्यान रखते हैं, जो पैदल चलने पर रखेंगे।

वैसे जुर्माना में भी जुर्म का आना ही छिपा है। आप जुर्म किए जाओ, हम आकर चाल आन कर देंगे यानी चालान। वैसे मेरा यह मानना है कि पहले सख्ती साइकिल चालकों के साथ की जानी चाहिए थी, फिर पैदलों का नंबर आना था। परंतु राष्ट्रमंडलीय खेलों की वजह से साइकिल चालकों को इग्नोर कर पैदलों का नंबर पहले आ गया। जबकि आप हर चौराहे, सड़क पर देख सकते हैं कि साइकिल चालक कितने धड़ल्ले से ट्रैफिक सिग्नलों का उल्लंघन किए जा रहे हैं। वे लाल बत्ती होने पर तो जरूर सड़क क्रास करते हैं।

इससे यह भी जाहिर होता है कि सरकार को साइकिल वालों से ज्यादा चिंता पैदल चलने वालों की है। उनमें भविष्य के गाड़ी स्वामी और चालक होने की संभावनाएं छिपी हुई हैं जबकि साइकिल स्वामी चालकों के साथ ऐसा बिल्कुल नहीं है। पैदल चलने वाला एक दिन जुर्माने से तंग आकर भी गाड़ी ले सकता है। अब टाटा की लखटकिया नैनो कार के नयन दीदार होने से इसकी बलवती इच्छाएं पैदलों के मन में कुलांचे मारने लगी है। साइकिल वाला अपने ऐसे वाहन को किसी भी सूरत में नहीं बदलेगा जिसका न तो चालान होता है और न इंधन ही खरीद कर खर्च करना पड़ता है तथा ट्रैफिक में मनमानी करने की भी भरपूर आजादी है। जब तक साइकिल न चलाई जाए तब तक इन फायदों का कहां पता चलता है, वो तो मैं बतला रहा हूं जबकि यह सीक्रेट है। फिर जब चाहे साइकिल हजार रुपये में खरीद लाओ। इसके साथ हेलमेट पहनने, ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने का भी झंझट नहीं है।

अभी तो सरकार पैदल चलने वालों के लिए हेलमेट अनिवार्य करने पर विचार कर रही है। अरे नहीं, उनकी जान की परवाह नहीं है, वो तो जुर्माना लगाने के लिए यह प्रावधान किया जा रहा है। अब यह बतलाने की जरूरत नहीं है कि हेलमेट पहनना कानूनन अनिवार्य करने से उसके न पहनने पर पैदलों से जुर्माना तो वसूला ही जा सकता है। जब इंसान अपना भार ढो सकता है तो दो-ढाई किलो का हेलमेट का भार सहने में क्या दिक्कत है ? वैसे पैदल चलने वालों से एकमुश्त रोड टैक्स वसूलने की योजना भी विचाराधीन है, यह अंदर की खबर है। आप पूछेंगे कि बाहर कैसे आई, अब पैदल तो चलकर नहीं आई है, वरना इस पर भी जुर्माना लग ही जाता।

सरकार आय पर कर से छूट दे रही है। इसके लिए अनेक नेक विकल्प मौजूद हैं। आप पीपीएफ, जीपीएफ, सेंविग बांड, इंश्योरेंस प्लान इत्यादि में अपनी आय का निवेश करके जो छूट प्राप्त कर रहे हैं, अब उसमें जुर्माने की राशि की रसीद पेश करने पर सौ प्रतिशत की दर से छूट मिलेगी। सरकार को यह लाभ होगा कि जुर्माने में वसूला गया पैसा वापस नहीं देना होगा। जबकि अन्य किसी भी योजना में लिया गया पैसा न जाने कितना गुना करके लौटाने की बाध्यता होती है। आप देखेंगे कि आयकर बचाने के लिए जुर्माना कराने के लिए जनवरी से मार्च माह में हर साल तेजी देखने को मिलेगी। जितनी पिछले नौ माह में नहीं वसूली गई उससे अधिक तीन माह में वसूली जाएगी। जुर्माना करने वालों के पास भीड़ मिलेगी, हर जुर्माना करने वाला व्यस्त और त्रस्त मिलेगा। त्रस्त इसलिए कि रसीद सबको चाहिए होगी और उसे वो बनानी होगी। फिर रसीद जल्दी बनवाने के लिए रिश्वत का प्रचलन शुरू हो सकता है। इसलिए चालान काटने वाले घबराएं मत, उनकी ऊपर की आय कम तो हो सकती है पर बिल्कुल बंद नहीं।

खबर आपने भी पढ़ी होगी कि गंदगी फैलाने पर जुर्माना होगा। गंदगी फैलाने में तो हम माहिर हैं। अपनी बालकनी पर खड़े होकर मूंगफली छील-छील कर खा जाते हैं और छिलके नीचे फेंक देते हैं। आजकल तो मूंगफली छील कर खाने और उसके छिलके यहां वहां फेंक कर जाने वाले बिना ढूंढे हजार मिल जाएंगे। बस में, रेल में, प्लेटफार्म पर, आफिस में, बालकनी में, पैदल चलते हुए भी। गंदगी फैलाने पर जो जुर्माना किया जाएगा उसमें सबसे अधिक वसूली तो इसी मद में की जा सकेगी। इसके अलावा अपने घर की पिछली गली में घर का कूड़ा फेंका जाता है। जब पूछा जाए तो सब यही कहते हैं कि हमने नहीं फेंका। इसके लिए सीसीटीवी कैमरों को लगाने की जरूरत होगी। जिससे इन गंदगी फैलाने वाले चतुर सुजानों को पकड़ धकड़ कर जुर्माना वसूला जा सकेगा। पर उनका क्या होगा जो चलती कार से कोल्ड ड्रिंक्स की बोतलें, केले के छिलके सरेआम सड़क पर फेंक देते हैं। इनके चालान करने के लिए भी पुख्ता इंतजामात करने की दरकार है। इसके लिए हर कार के साथ एक सीसीटीवी कैमरा लगाना कानूनन अनिवार्य कर दिया जाए, जिसकी मॉनीटरिंग ट्रैफिक पुलिस को कहीं पर भी गाड़ी रुकवा कर करने के अधिकार सौंपे जा सकते हैं।
जुर्माने की राष्ट्र के विकास में महती भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता। जब सरकार कर वसूलना चाहती है तो बहुत सारे विशेषज्ञ जुट जाते हैं उससे बचाने के रास्ते तलाशने में और उन्हें बता-बता कर फीस वसूलते हैं। पर अभी तक एक भी ऐसा मामला प्रकाश में नहीं आया है कि किसी विशेषज्ञ ने जुर्माने से बचने की तरकीबें बताई हों। बल्कि जब वे भी पैदल चलते हैं तो संभलकर चलते हैं।

अविनाश वाचस्पति
साहित्यकार सदन,
195, सन्त नगर,
नयी दिल्ली 110065
दूरभाष : 09868166586
ई मेल : avinashvachaspati@gmail.com


भाषांतर
धारावाहिक रूसी उपन्यास(किस्त-3)

हाजी मुराद
लियो तोलस्तोय
हिन्दी अनुवाद : रूपसिंह चंदेल

॥ तीन ॥

बैरकों की खिड़कियों और सैनिकों के कुटीरों में रोशनी बहुत पहले बुझ चुकी थी, लेकिन छावनी के भव्य-भवन की सभी खिड़कियाँ रौशन थीं। यह कुरियन रेजीमेण्ट के कर्नल प्रिन्स माइकल साइमन वोरेन्त्सोव का घर था, जो राज दरबार के एक उच्च अधिकारी और कमाण्डर-इन-चीफ का पुत्र था। वोरोन्त्सोव इस घर में अपनी पत्नी मेरी वसीलीव्ना के साथ रहता था, जो पीटर्सबर्ग की एक सुन्दरी थी। उसके रहन-सहन में एक प्रकार की ऐसी विशिष्टता थी जो काकेशस के इस छोटी छावनी वाले कस्बे में पहले कभी नहीं देखा गया था। वारोन्त्सोव और उसकी पत्नी सोचते कि वे अभावों से भरपूर बहुत साधारण जीवन जी रहे थे, फिर भी स्थानीय निवासी उनके असाधारण विलासितापूर्ण रहन-सहन से विस्मित थे।
आधी रात का समय था। वोरोन्त्सोव अपने विशाल ड्राइंग रूम में, जिसमें कालीन बिछा हुआ था और लंबे भारी परदे पड़े हुए थे, अतिथियों के साथ मेज पर ताश खेल रहा था, जिस पर चार मोमबत्तियाँ जल रही थीं। खिलाडि़यों में एक स्वयं कर्नल वारोन्त्सोव था। उसका चेहरा लंबा, बाल सुन्दर थे और उसने राज्याधिकारी होने के चिन्ह धारण कर रखे थे। उसका साथी पीटर्सबर्ग विश्वविद्यालय का एक स्नातक था, जिसे प्रिन्सेज ने अपने पहले पति से उत्पन्न पुत्र के ट्यूटर के रूप में नियुक्त किया हुआ था। वह उदास भावाकृतिवाला एक सांवला नौजवान था। दो अधिकारी उनके विरुद्ध खेल रहे थे। उनमें से एक चौड़े गाल, गुलाबी चेहरे वाला कम्पनी कमाण्डर पोल्तोरत्स्की था, जो गारद सेना से स्थानांतरित होकर आया था और दूसरा रेजीमंण्टल एडजूटेण्ट था, जो अपने सुन्दर चेहरे पर ठण्डी भावाकृति लिए सीधा तना हुआ बैठा था। बड़ी आंखों और काली भौंहोवाली सुन्दर महिला प्रिन्सेज मेरी वसीलीव्ना, पोल्तोरत्स्की के बगल में बैठी थी और उसके पैरों को अपने पेटीकोट से छू रही थी और उसके हाथों की ओर देख रही थी। उसके बोलने, उसके देखने और मुस्कराने, उसक शरीर के संचलन और उसके द्वारा प्रयोग किये गये परफ्यूम, से सम्मोहित पोल्तोरत्स्की उसका सान्निध्य पाने के अतिरिक्त सब ओर से बेखबर था। उसने एक के बाद दूसरी गलती की थी और इससे उसका साथी भड़क उठा था।
‘‘नहीं यह तो हद है ! तुमने दूसरा इक्का बरबाद कर दिया।” लाल-पीला होता हुआ एड्जूटेण्ट बोला, क्योंकि पोल्तोरत्स्की एक इक्का फेक चुका था।
पोल्तोरत्स्की ने अपनी सौम्य बड़ी काली आंखों से क्रुद्ध एड्जूटेण्ट की ओर न समझने वाले भाव से ऐसे देखा मानो वह अभी-अभी सोकर उठा था।
‘‘अच्छा, उसे क्षमा कर दें।” मुस्कराती हुर्ह मेरी वसीलीव्ना ने कहा। “मैनें तुमको इतना बताया था,” उसने पोल्तोरत्स्की से कहा। ‘‘लेकिन तुमने मुझे सब गलत बताया था।” पोल्तोरत्स्की ने मुस्कराते हुए कहा ।
‘‘सच ?” वह बोली, और मुस्कराई भी। पोल्तोरत्स्की इस मुस्कराहट से इतना उत्तेजित और प्रसन्न हुआ कि वह शर्म से लाल हो उठा और उत्तेजित-सा पत्ते फेटने लगा ।
‘‘तुम्हारे पत्ते नहीं।” एड्जूटेण्ट कठोरतापूर्वक बोला और अपने गोरे हाथों को घुमाते हुए पत्ते फेटने लगा मानो वह उनसे यथाशीघ्र मुक्ति पा लेना चाहता था।
एक नौकर ड्राइंगरूम में प्रविष्ट हुआ और बोला कि ड्यूटी अफसर ने प्रिन्स से भेंट करने का अनुरोध किया है।
‘‘सज्जनों, क्षमा करें,” अंग्रेजी लहजे में प्रिन्स ने रशियन में कहा, ‘‘मेरी तुम मेरा स्थान ग्रहण कर लो।”
‘‘मैं ?” फुर्ती से पूरी तरह खड़ी होती हुई प्रिन्सेज ने पूछा। उसके सिल्क के कपड़ों में सरसराहट हुई और एक प्रसन्न महिला की भाँति उल्लसित होती हुई वह मुस्काराई।
‘‘मैं सदैव हर बात के लिए तैयार रहता हूँ,” एड्जूटेण्ट बोला। अपने विरुद्ध प्रिन्सेज के खेलने से वह बहुत प्रसन्न था, क्योंकि प्रिन्सेज को खेलने का बिल्कुल ज्ञान नहीं था। पोल्तोरत्स्की ने सहजता से बाहें फैलायीं और मुस्कराया।
प्रिन्स जब ड्राइंग रूम में वापस लौटा खेल समाप्त हो रहा था। वह बहुत उत्तेजित और प्रसन्न था।
‘‘सोचो, मैं क्या सूचित करने वाला हूँ।”
‘‘क्या ?”
‘‘आओ हम शैम्पेन पियें।”
‘‘मैं सदैव तैयार रहता हूँ ,” पोल्तोरत्स्की ने कहा।
‘‘हां, कितना सुखद ,” एड्जूटेण्ट बोला।
‘‘वसीली ! हम लोगों को शैम्पेन सर्व करो !” प्रिन्स ने कहा।
‘‘ तुम्हें क्यों बुलाया था?” मेरी वसीलीव्ना ने पूछा।
‘‘ड्यूटी अफसर एक दूसरे आदमी के साथ आया था?”
‘‘कौन? क्यों?” मेरे वीसीलीव्ना ने उत्सुकतापूर्वक पूछा।
‘‘मैं नहीं बता सकता,” वारोन्त्सोव बोला।
‘‘तुम नहीं बता सकते,” मेरी वसीलीव्ना ने दोहराया, ‘‘हम उस पर विचार कर लेगें।”
शैम्पेन सर्व की गई। अतिथियों ने एक-एक गिलास पिया, खेल समाप्त किया, व्यवस्थित हुए और जाने लगे।
‘‘आपकी कम्पनी को कल जंगल के लिए तैनात किया गया है, क्या नहीं? ” प्रिन्स ने पोल्तोरत्स्की से पूछा।
‘‘हाँ, मेरी ... वहाँ कुछ खास है ?”
‘‘तब मैं आपसे कल मिलूंगा।” प्रिन्स ने फीकी मुस्कान के साथ कहा।
‘‘मैं गौरवान्वित हूँ,” मेरी वसीलीव्ना से हाथ मिलाने के विचार के संभ्रम में पोल्तोरत्स्की प्रिन्स के शब्दों को पूरी तरह ग्रहण नहीं कर पाया था।
मेरी वसीलीव्ना ने, प्राय: की भाँति, उसके हाथ को न केवल दृढ़ता से दबाया बल्कि जोरदार ढंग से हिलाया भी। उसने उसे एक बार पुन: उस समय की त्रुटि की याद दिलाई जब वह क्लबों का संचालन किया करता था। वह उस पर मुस्कराई।
‘‘एक मोहक, उत्तेजक और अर्थपूर्ण मुस्कान,” पोल्तोरत्स्की ने सोचा। वह ऐसी उल्लासपूर्ण मनस्थिति में घर गया, जिसे समाज में उसकी तरह पढ़े-लिखे, उसी की भाँति जन्मे और पले-बढ़े लोग ही समझ सकते थे जो उसी की तरह महीनों के एकाकी सैनिक जीवन के बाद अचानक अपनी किसी पूर्व परिचित महिला से मिलते हैं। और प्रिन्सेज वोरोन्त्सोव एक विशिष्ट महिला थीं।
जब वह अपने निवास पर पहुँचा उसने दरवाजे को धक्का दिया, लेकिन चिटखनी अंदर से बंद थी। उसने खटखटाया, लेकिन वह बंद ही रहा। उसका धैर्य चुक गया और उसने बूट और तलवार दरवाजे पर मारना शुरू कर दिया। अंदर पदचाप सुनाई पड़ी और पोल्तोरत्स्की के नौकर ववीला ने चिटकनी खोली।
‘‘ मूर्ख, तुमने बंद क्यों किया था ?”
‘‘लेकिन सच, अलेक्सिस व्लादीमीर …।”
‘‘दोबारा पी ? मैं तुझे सबक सिखा दूँगा …।”
पोल्तोरत्स्की ववीला को लगभग मारने ही वाला था, लेकिन फिर उसने उसे सुधारने की सोचा।
‘‘तुझे लानत है, सुधरने की कभी मत सोचना। चल, मोमबत्ती जला।”
‘‘इसी क्षण।”
ववीला बुरी तरह पिये हुए था। वह क्वार्टर मास्टर के जन्म दिन के आयोजन में शामिल हुआ था। जब वह घर लौटकर आया, वह अपने जीवन की तुलना क्वार्टर मास्टर इवान मैथ्यू के जीवन से करने लगा। इवान मैथ्यू की निश्चित आय थी, वह विवाहित था और आशा करता था कि एक वर्ष में पैसे देकर वह अपने को सेना से मुक्त कर लेगा। ववीला छोटी आयु में ही नौकरी में आ गया था, और इस समय वह चालीस से ऊपर था, अविवाहित था और अपने अनियंत्रित स्वामी के साथ यौद्धिक जीवन जीता आ रहा था। वह एक अच्छा मालिक था और कभी-कभी ही उसे पीटता था, लेकिन यह भी कोई ज़िन्दगी थी ! ‘‘जब वह काकेशस से लौटा था तब उसने मुझे स्वतंत्र करने का वायदा किया था, लेकिन मैं अपनी स्वतंत्रता का करूंगा क्या ? यह एक कुत्ते जैसी ज़िन्दगी है,” ववीला ने सोचा था। वह इतना उनींदा था कि उसने इस भय से दरवाजा बंद कर लिया था और सो गया था कि कोई घर में घुस आ सकता था और कुछ भी चोरी कर सकता था।
पोल्तोरत्स्की उस कमरे में प्रविष्ट हुआ जहाँ वह अपने साथी तिखोनोव के साथ सोता था।
‘‘अच्छा, तुम हार गये ?” उनींदे स्वर में तिखोनोव बोला।
‘‘भगवन, नहीं ! मैनें सत्तरह रूबल जीते और हमने एक बोतल क्लिकोट पी।”
‘‘और मेरी वसीलीव्ना को देखते रहे ?”
‘‘और मेरी वसीलीव्ना को देखता रहा ।” पोल्तोरत्स्की ने दोहराया।
‘‘जल्दी ही हमारे जागने का समय हो जाएगा।” तिखोनोव ने कहा, ‘‘हमें छ: बजे चल देने के लिए उठना है।”
‘‘ववीला,” पोल्तोरत्स्की चीखा, ‘‘ध्यान रहे, मुझे ठीक पाँच बजे जगा देना।”
‘‘मैं कैसे जगा सकता हूँ जब आप मुझसे झगड़ते हैं ?”
‘‘मैं कहता हूँ, मुझे जगा देना। सुना तुमने?”
‘‘बहुत अच्छा।”
ववीला अपने मालिक के जूते और कपड़े लेकर बाहर निकल गया।
पोल्तोरत्स्की बिस्तर पर गया और एक सिगरेट जलायी। उसने बत्ती बुझायी और मुस्कराया। अंधेरे में उसने मेरी वसीलीव्ना का मुस्कराता चेहरा अपने सामने देखा।
वोरोन्त्सोव दम्पति तुरंत बिस्तर पर नहीं गया था। जब अतिथि चले गये थे तब मेरी वसीलीव्ना अपने पति के पास आयी थी और चेहरे पर कठोरता ओढे़ उसके सामने खड़ी हो गयी थी।
‘‘हाँ, तुम्हे मुझे बाताना ही है ?”
‘‘लेकिन मेरी प्यारी … ।”
‘‘तुम मुझे ‘मेरी प्यारी’ मत कहो। वह एक दूत है, क्या नहीं है ?”
‘‘सच, मैं तुम्हें नहीं बता सकता।”
‘‘तुम नहीं बता सकते ? तब वह मैं तुम्हें बताऊंगी।”
‘‘तुम ?”
‘‘वह हाजी मुराद है ? क्या वह नहीं है ?” प्रिन्सेज ने कहा, जिसने कुछ दिन पहले हाजी मुराद के साथ हुए समझौते के विषय में सुना था। उसने अनुमान लगाया था कि हाजी मुराद स्वयं उसके पति से मिलने आया था।
वोरोन्त्सोव इससे इंकार नहीं कर सका, लेकिन हाजी मुराद की उपस्थिति के विषय में पत्नी का भ्रम निवारण करते हुए उसने कहा, कि वह केवल एक दूत था जिसने उसे बताया था कि अगले दिन हाजी मुराद उससे वहाँ मिलेगा जहाँ जंगल काटा जा रहा था।
छावनी के उकताहटपूर्ण जीवन-चर्या में युवा वोरोन्त्सोव दम्पति इस उत्तेजनापूर्ण समाचार से प्रसन्न थे। वे इस विषय में बातें करते रहे कि इस समाचार से उसके पिता कितना प्रसन्न होंगे। और जब वे सोने के लिए बिस्तर पर गये रात के दो बज चुके थे।

(क्रमश: जारी…)

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गतिविधियाँ


नासिरा शर्मा लंदन के हाउस
ऑफ लॉर्ड्स में कथा (यू.के.) सम्‍मान प्राप्‍त करेंगी

कथा (यू के) के मुख्य सचिव एवं प्रतिष्ठित कथाकार श्री तेजेन्द्र शर्मा ने लंदन से सूचित किया है कि वर्ष 2007 के लिए अंतर्राष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान वरिष्ठ उपन्‍यासकार श्रीमती नासिरा शर्मा को सामयिक प्रकाशन से 2005 में प्रकाशित उपन्यास कुइयांजान पर देने का निर्णय लिया गया है। इस सम्मान के अन्तर्गत दिल्ली - लंदन - दिल्ली का आने जाने का हवाई यात्रा का टिकट (एअर इंडिया द्वारा प्रायोजित) एअरपोर्ट टैक्स़, इंगलैंड के लिए वीसा शुल्क़, एक शील्ड, शॉल, लंदन में एक सप्ताह तक रहने की सुविधा तथा लंदन के खास खास दर्शनीय स्थलों का भ्रमण आदि शामिल होंगे। यह सम्मान श्रीमती नासिरा शर्मा को लंदन के हाउस ऑफ लॉर्ड्स में 27 जुलाई 2008 की शाम को एक भव्य आयोजन में प्रदान किया जायेगा।
इंदु शर्मा मेमोरियल ट्रस्ट की स्थापना संभावनाशील कथा लेखिका एवं कवयित्री इंदु शर्मा की स्मृति में की गयी थी। इंदु शर्मा का कैंसर से लड़ते हुए अल्प आयु में ही निधन हो गया था। अब तक यह प्रतिष्ठित सम्मान सुश्री चित्रा मुद्गल, सर्वश्री संजीव, ज्ञान चतुर्वेदी, एस आर हरनोट, विभूति नारायण राय, प्रमोद कुमार तिवारी, असग़र वजाहत और महुआ माजी को प्रदान किया जा चुका है।
श्रीमती नासिरा शर्मा का जन्म 1948 में इलाहबाद में हुआ। उन्होंने फ़ारसी में एम.ए. की डिग्री हासिल की। उनकी प्रकाशित कृतियों में शामिल हैं सात नदियां एक समन्दर, शाल्मली, ठीकरे की मंगनी, ज़िन्दा मुहावरे (सभी उपन्यास), एवं शामी काग़ज़, पत्थर गली, संगसार, इब्ने मरियम, सबीना के चालीस चोर, ख़ुदा की वापसी (सभी कहानी संग्रह शामिल हैं। इसके अतिरिक्त उनके नाम कई अनूदित पुस्तकें व टेलिफ़िल्मों का लेखन शामिल है। इस वर्ष नासिरा जी अपना साठवां जन्‍मदिन मना रही हैं।

वर्ष 2007 के लिए पद्मानन्द साहित्य सम्मान श्रीमती उषा वर्मा को उनके कहानी संग्रह कारावास (2007 – विद्या विहार प्रकाशन, नई दिल्ली) के लिए दिया जा रहा है। श्रीमती उषा वर्मा का जन्म बाराबंकी, उत्तर प्रदेश में हुआ था और उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से एम.ए. (दर्शनशास्त्र) तक शिक्षा प्राप्त की। उनकी प्रकाशित रचनाओं में क्षितिज अधूरे, कोई तो सुनेगा (कविता संग्रह), सांझी कथा यात्रा (संपादन – कहानी संग्रह) आदि शामिल हैं। वे लीड्स विश्विद्यालय में प्राध्यापिका रही हैं। इससे पूर्व इंगलैण्ड के प्रतिष्ठित हिन्दी लेखकों क्रमश: डॉ सत्येन्द श्रीवास्तव, सुश्री दिव्या माथुर, श्री नरेश भारतीय, भारतेन्दु विमल, डा.अचला शर्मा, उषा राजे सक्‍सेना,गोविंद शर्मा और डा. गौतम सचदेव को पद्मानन्द साहित्य सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है।
कथा यू.के. परिवार उन सभी लेखकों, पत्रकारों, संपादकों मित्रों और शुभचिंतकों का हार्दिक आभार मानते हुए उनके प्रति धन्यवाद ज्ञापित करता है जिन्होंने इस वर्ष के पुरस्कार चयन के लिए लेखकों के नाम सुझा कर हमारा मार्गदर्शन किया और हमें अपनी बहुमूल्य संस्तुतियां भेजीं।

कवयित्री अनामिका 'केदार सम्मान' - 2007 से सम्मानित
'केदार शोध पीठ न्यास' बान्दा द्वारा सन् 1996 से प्रति वर्ष प्रतिष्ठित प्रगतिशील कवि केदारनाथ अग्रवाल की स्मृति में दिए जाने वाले साहित्यिक 'केदार-सम्मान' का निर्णय हो गया है। वर्ष २००७ का केदार सम्मान कवयित्री सुश्री अनामिका को उनके काव्य-संग्रह 'खुरदरी हथेलियाँ ' के लिए प्रदान किए जाने का निर्णय किया गया है।

यह सम्मान प्रतिवर्ष ऐसी प्रतिभाओं को दिया जाता है जिन्होंने केदार की काव्यधारा को आगे बढ़ाने में अपनी रचनाशीलता द्वारा कोई अवदान दिया हो। प्रकृति-सौन्दर्य व मानवमूल्यों के प्रबल समर्थक कवि केदारनाथ अग्रवाल की ख्याति उनकी कविताओं के टटकेपने व अछूते बिम्बविधान के साथ साथ कविताओं की सादगी व सहजता के कारण विशिष्ट रही।


'केदार शोध पीठ न्यास' केदार जी के काव्य अवदान को आगामी पीढ़ी तक पहुँचाने व उनमे काव्य के उस स्तर की पहचान विनिर्मित करने के उद्देश्य से गठित की गई संस्था है। प्रति वर्ष सम्मान का निर्णय कविताओं की वस्तु व विन्यास की इसी कसौटी को ध्यान में रखते हुए ही किया जाता है। इसकी निर्णायक समिति में साहित्य के 5 मर्मज्ञ विद्वान सम्मिलित हैं। प्रति वर्ष सितम्बर में इस पुरस्कार के लिए देश-विदेश के हिन्दी रचनाकारों से प्रविष्टियाँ आमन्त्रित की जाती हैं।

अब तक यह पुरस्कार जिन रचनाकारों को प्रदान किया गया है, उनमे अनामिका तीसरी स्त्री रचनाकार हैं। इस से पूर्व सुश्री गगन गिल व सुश्री नीलेश रघुवंशी को इस श्रेणी में गिना जाता था।


पूर्व वर्षों की भांति यह पुरस्कार आगामी अगस्त माह में बान्दा में आयोजित होने वाले एक भव्य समारोह में प्रदान किया जाएगा

इस पुरस्कार के लिए केदार सम्मान समिति, केदार शोधपीठ न्यास,'विश्वम्भरा', 'हिन्दी भारत' समूह व हमारी ओर से अनामिका जी को अनेकश: शुभकामनाएँ।


-कविता वाचक्नवी

नए मांनदंड स्थापित करती माधोपुरी की स्व-जीवनी : “छांग्या रुक्ख”


दिनांक 09.04.2008 को मंडीहाउस स्थित साहित्य अकादमी के सभागार में पंजाबी के जाने-माने कवि, अनुवादक व पत्रकार बलबीर माधोपुरी की चर्चित व कई भाषाओं में अनूदित स्व-जीवनी ‘छांग्या रुक्ख’ पर विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। गोष्ठी में पहले वक्ता के रूप में शिरकत करते हुए सूरजपाल चौहान ने कहा कि पंजाब सबसे अधिक समृद्ध व खुशहाल प्रदेश के रूप में जाना जाता है और यह माना जाता रहा कि पंजाब में उत्तर प्रदेश या राजस्थान की तरह जातीय उत्पीड़न जैसी कोई चीज नहीं है। लेकिन ‘छांग्या रुक्ख’ से गुजरते हुए पंजाब के बारे में पाठकों के दिमाग में बनी खूबसूरत छवि अचानक घृणित छवि में बदल जाती है और इंसानियत के पतन को लेकर एक अजीब से कुढ़न पैदा होती है। माधोपुरी ने पंजाब की असली तस्वीर दिखाकर एक मंजे हुए साहित्यकार व समाज के जिम्मेदार नागरिक की भूमिका अदा की है। निस्संदेह माधोपरी का यह साहसपूर्ण कार्य स्वागत योग्य है।
जे.एन.यू. से पधारे प्रो.चमनलाल ने स्वजीवनी, जिसे आत्मवृत्त के रूप में जाना जाता है, के महत्व को स्वीकारते हुए टिप्पणी की कि आत्मकथा दलित साहित्य की सबसे ताकतवर विधा है, और ‘छांग्या रुख’ ने इसे एक नई पहचान दी है। उन्होंने इसकी तुलना मराठी की आत्मकथाओं से करते हुए कहा कि यह जाटवाद के कुकृत्यों को समाज के सामने लाती है, और पंजाब के सामाजिक-आर्थिक ढांचे की कलई खोल कर रख देती है। उन्होंने स्वीकार किया कि पंजाब के दलितों का संघर्ष ब्राह्मणवाद के नहीं, जाटवाद के विरुद्ध है, क्योंकि पंजाब में ब्राह्मणवाद का कोई वजूद ही नहीं है। चमनलाल ने दलित, नारी, अश्वेत व प्रगतिशील विचारों वाले बुद्धिजीवियों से एक जुट होने का आह्वान किया और इसके लिए किसी के रहमोकरम की आवश्यकता को सिरे से नकारने पर जोर दिया।
अगले वक्ता के रूप में बजरंग तिवारी ने माधोपुरी का नाम लिए बगैर कहा कि ‘छांग्या रुक्ख’ अनुभव और अध्ययन का अनूठा नमूना है। इसे पढ़ते हुए ऐसा लगता है कि जैसे हम कोई स्व-जीवनी नहीं, समाजशास्त्र की कोई पुस्तक पढ़ रहे हैं। उन्होंने विशेष रूप से गांव में प्रचलित शिक्षक व छात्र संबधों में शिक्षक की जातिवादी व क्रूरतापूर्ण भूमिका पर चिंता जताई और ‘छांग्या रुक्ख’ में चित्रित स्कूल संबंधी घटनाक्रम को गुरु के चरित्र के बेनकाब करने वाला बताया। बजरंग तिवारी ने जाति के सवाल को गंभीरता से लेते हुए कहा कि भारत में इस्लाम व इसाई धर्म भी जातिवाद से अछूते नहीं हैं। इसलिए इस जाति-रूपी राक्षस का सामना करने के लिए उन्होंने दलित साहित्य को सभी भाषाओं से जोड़े जाने पर बल दिया। उन्होंने इसकी भाषा की अलग प्रकार की शैली व शब्दावली भी का खुलकर समर्थन किया।
प्रो. अजय तिवारी ने ‘छांग्या रुक्ख’ को आक्रोश से मुक्त बताया, जिसका अम्बेडकरवादी साहित्य पर निरंतर आरोप लगता रहा है। लेकिन उन्होंने इसके चरित्रों के विकास को स्वाभाविक विकास की संज्ञा देते हुए कहा कि ये स्वयं आक्रोश में आए बगैर पाठकों में आक्रोश पैदा हैं। इस परिपक्वता का श्रेय स्व-जीवनी के रचनाकार बलबीर माधोपुरी को जाता है। प्रो. तिवारी ने ‘छांग्या रुक्ख’ को व्यवस्था का सच बयान करने वाली कृति बताया, जो नियति में हस्तक्षेप करने के लिए ललकारती है। उन्होंने कहा कि यह पुस्तक एक दलित स्व-जीवनियों में एक अलग मानदंड स्थापित करती है। काश ! यह पुस्तक मूल रूप से हिन्दी में आई होती।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रही डा. विमल थोराट ने माधोपुरी की पुस्तक ‘छांग्या रुक्ख’ का लोकार्पण किया, पुष्प गुच्छ दिया और एक शाल भेंट कर उनका अभिनंदन किया। इस कड़ी में उनकी पत्नी हरजिन्दर कौर को पुष्प भेंट कर अभिनंदन किया जाना ऐसा था जैसे उनके अप्रत्यक्ष योगदान को मान्यता प्रदान करना। निस्संदेह यह एक प्रशंसनीय व स्वागत योग्य कदम था। इसके उपरान्त उन्होंने कहा कि ‘छांग्या रुक्ख’ एक ऐसा दस्तावेज है, जिसमें इस कृति को दुर्लभ व महत्वपूर्ण बनाने वाले आर्थिक आंकडों का इस्तेमाल किया गया है। इसके लिए उन्होंने पुस्तक के रचनाकार की भूरी-भूरी प्रशंसा की।
लेखक ने अपने वक्तत्व में गांवों के ही नहीं बल्कि अति आधुनिक हरियाणा व पंजाब की राजधानी चंडीगढ़ का उदाहरण देते हुए बताया कि प्रेम-विवाह करने वालों को किस निर्ममतापूर्वक कत्ल कर दिया जाता है, और इसमें जट सिख किस प्रकार सबसे आगे हैं। उन्होंने आगे बताया कि गरुद्वारों में दलितों के साथ किस-किस प्रकार का भेद-भाव बरता जाता है। उन्होंने उन गरुद्वारों को इस भेदभाव से मुक्त बताया जो शिरोमणी गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अंतर्गत आते हैं। उन्होंने आगे बताया कि पंजाब के गावों के 12500 गुरुद्वारे हैं, तो दलितों के अपने भी 10000 शानदार गुरुद्वारे हैं। विभिन्न भाषाओं के साहित्यकारों और प्रबुद्धजनों से खचाखच भरे इस सभागार में उन्होंने घोषणा की कि अम्बेडकरवादी साहित्य की गतिविधियों को देखते हुए यह कहना अतिश्योक्तिपूर्ण नहीं होगा कि वर्तमान सदी हमारी, यानी अम्बेडकरवादी साहित्य व इसके साहित्कारों की होगी। अंत में उन्होंने इस गोष्ठी में शिरकत करने वाले प्रबु़द्धजनों का आभार व्यक्त करते हुए अपना संक्षिप्त-सा वक्तव्य समाप्त किया। कार्यक्रम का संचालन सूरज बड्त्या ने और धन्यवाद ज्ञापन व्यंग्यकार अरुण कुमार गौतम ने किया।
यद्यपि इस गोष्ठी की शुरुआत थोड़े गंभीर माहौल में मराठी के गंभीर चिंतक, समाज की नब्ज को बारीकी से समझने वाले, मराठी दलित साहित्य को नई पहचान देने वाले और परंपरागत साहित्य की अलग-अलग आयाम से व्याख्या करने वाले व्यक्तित्व बाबूराव बागुल को श्रद्धांजली देने के साथ हुई। लेकिन जैसे जैसे ‘छांग्या रुक्ख’ पर चर्चा का सिलसिला शुरु हुआ, माहौल बेहद अकादमिक व उत्साहवर्धक बनता चला गया और प्रत्येक श्रोता इस माहौल में खो गया प्रतीत होता था। निस्संदेह इसका श्रेय पुस्तक ‘छांग्या रुक्ख’ इसके रचनाकार माधोपुरी, वक्तागण व उपस्थित सभी प्रबुद्ध श्रोतागण को जाता है।
प्रस्तुति– ईश कुमार गंगानिया
(संपादक–आजीवक विज़न)


एकांत श्रीवास्तव और अलका सिन्हा सम्मानित

वरिष्ठ पत्रकार लाला जगत ज्योति प्रसाद की दसवीं पुण्यतिथि पर समकालीन साहित्य मंच, मुंगेर के तत्वावधान में स्थानीय शिक्षक संघ के सभागार में एक सम्मान समारोह का आयोजन किया गया। सम्मान समारोह में कथाकार मधुकर सिंह द्वारा ‘वागर्थ’ के संपादक-कवि एकांत श्रीवास्तव को तथा बिहार विधान परिषद सदस्य कथाकार डा0 प्रेम कुमार मणि द्वारा कवयित्री-कथाकार अलका सिन्हा को लाला जगत ज्योति स्मृति सम्मान प्रदान किया गया। समारोह का उदघाटन मुंगेर से पूर्व जिला एवं सत्र न्यायाधीश ओमप्रकाश पांडेय और वरिष्ठ पत्रकार आचार्य लक्ष्मीकांत मिश्र ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलित कर किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता कवि डा0 कुणाल कुमार ने की। विशिष्ट अतिथि वरिष्ठ कथाकार संतोष दीक्षित और पूर्व केन्द्रीय मंत्री डी पी यादव ने अपने विचार व्यक्त किए। इस अवसर पर सम्मानित कवियों ने अपने रचनापाठ से कविता की सार्थकता को रेखांकित किया। जहां एकांत श्रीवास्तव ने अपनी संस्कृति का आभार इन शब्दों में व्यक्त किया- “इस मिट्टी से कहूँगा धन्यवाद जिसमें बंधी रही मेरी जड़ें और मैं वृक्ष रहा छतनार…” वहीं अलका सिन्हा की रचनात्मक प्रतिबद्धता इन शब्दों में मुखरित हुई- “ मैं स्याही से लिख सकूँ/उजली दुनिया के सफेद अक्षर/मुझे जज्ब कर हे कलम/मैं तेरी रोशनाई होना चाहती हूँ।”
सम्मान समारोह के अगले चरण में आयोजित कवि सम्मेलन में कुछ गण्यमान्य कवियों ने रचनापाठ किया जिनमें प्रगतिशील लेखक संघ, पटना के सचिव शहंशाह आलम, ग़ज़लकार अनिरुद्ध सिन्हा, जाने-माने कवि योगेन्द्र कृष्णा, राहुल झा, मृदुला झा, विकास आदि प्रमुख थे। कार्यक्रम का संचालन डा0 शब्बीर हसन ने किया।
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अगला अंक





जून 2008

-मेरी बात
-सूरज प्रकाश की कहानी- “करोड़पति”।
- डा0 हरि जोशी की कविताएं।
- रणीराम गढ़वाली की लघुकथाएं ।
-“भाषान्तर” में लियो ताल्स्ताय के उपन्यास “हाजी मुराद” के धारावाहिक प्रकाशन की चौथी किस्त। हिंदी अनुवाद : रूपसिंह चन्देल
-“नई किताब” तथा “गतिविधियाँ” स्तम्भ।

9 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

Subhashji,

Namaskar.

A very nice E-magazine IN HINDI.

One suggestion: If you will put the email addresses under 'bcc' RATHER THAN under 'to' or 'cc', your complete list will not be available to someone for any misuse etc.

Keep it up. God bless.
Very Very good stories, articles and poetry, and some gazlein etc.

-Sher Singh Agrawal
agrasen@gmail.com

रूपसिंह चन्देल ने कहा…

भाई सुभाष,

गजब की सामग्री से लैस है साहित्य सृजन का अप्रैल-मई अंक. ’मेरी बात’ में तुमने भी महत्वपूर्ण बात कही है, लेकिन रंजन के साथ उसी जनसता में प्रभाष जोशी का आलेख भी था जिसमें कई सवाल उठाए गए थे और कोंडालिजा राइस और बुश महाशय के आरोपों का अच्छा उत्तर दिया गया है. उन दोनों ने बहुत बेशर्मी से कहा था कि विश्व में खाद्यान्य का संकट भारत और चीन की जनता की बढ़ी खूराक के कारण है. मैं इसे इसी भाषा में कहना पसंद करूगां. लेकिन आज एक सर्वे प्रकाशित हुआ है कि विश्व में सर्वाधिक भोजन अमेरिकी करते हैं . अमीरिकियों के मुंह हर समय चलते ही रहते हैं तो बुश बाबू और राइज मोहतरमा से पूछा जाना चाहिए कि पहले वे अपने यहां के लोगों के अधिक खाने पर अंकुश लगाएं तब दूसरे देशों पर टिप्पणी करें.

अन्य रचनाएं भी उत्कृष्ट है.

चन्देल

शैलेश भारतवासी ने कहा…

सुभाष जी,

मैं अविनाश वाचस्पति के माध्यम से यहाँ तक पहुँचा। मैं उनके व्यंग्य पर टिप्पणी से पहले कुछ सुझाव देना चाहूँगा।
ब्लॉग के एक ही पोस्ट में इतने शब्द नहीं भरने चाहिए क्योंकि पेज-लोडिंग टाइम बढ़ जाता है। जिसके यहाँ कम गति का नेट है वो ऐसे ही भाग जायेगा। बस वही व्यक्ति पढ़ेगा जिसकी रचना यहाँ छपी हो। इसलिए यदि आप ई-पत्रिका को ब्लॉगस्पॉट पर ही चलाना चाहते हैं तो एक माह की अलग-अलग रचनाओं को अलग-अलग पोस्ट में डालें और उन सबको को एक मीनूवार पोस्ट में सजा-धजाकर डाल दें। मैं उम्मीद करता हूँ कि आपका अगला अंक प्रभावी होगा।

अब अविनाश जी के व्यंग्य करूँ। भाई माफ करना कम से कम शैली के स्तर पर आपकी रचना में व्यंग्य वाली धार नहीं है। पकड़कर नहीं रख पाती। एक लेख सरीखा व्यंग्य बन गई है। और मेहनत करो।

सादर!

शैलेश भारतवासी
http://www.hindyugm.com
http://podcast.hindyugm.com
http://kahani.hindyugm.com
http://baaludyan.hindyugm.com
http://merekavimitra.blogspot.com

बेनामी ने कहा…

Subhash ji,
Bahut acha laga Dwij ji kii ghazalen par kar..par sir comment posting nahin hai.aisa kyon have u delete the option?
Regards
-Satpal Bhatia
satpalg.bhatia@gmail.com

बेनामी ने कहा…

Priya Bhai

is baar ka issue bhi bahut achha hai..aapka lekh bhi.....Alka aur Akant ji ko samaan prapti ke liye meri badhai bhijva dena..sath hiIndu Sharma Samaan ke liye bhi.

aapki kahani sanp bahut achhi hai..badhai

Harnot

बेनामी ने कहा…

Bhai neerav ji

Apka e-lekhan sahitya jagat main mahattvapoorna jagah bana chuka hai. aap bada kaam kar rahe hain.badhai!
richa ka blog- Naye Kadam-Naye Swar- bhi dekha hai. Bahut achha laga. Maine alag se likha hai.
Sanand honge
Shubhkamanaon sahit

apka
rajendra gautam
b-226, rajnagar palam, new delhi-110077
ph. +91+11+25362321 mob: +91+9868140469

Suresh Chandra Gupta ने कहा…

धन्यवाद सुभाष जी,

'साहित्य सृजन' की और मेरा ध्यान आकर्षित करने के लिए धन्यवाद. फॉण्ट की समस्या के कारण पढ़ नहीं पाया.

बेनामी ने कहा…

Subhash Neerav jee
badhaaee blog spot kay liyay

-Vishwa Mohan Tiwari
onevishwa@gmail.com

सतपाल ने कहा…

Dwij jii kii ghazalen khoob haiN.
ghazal ke Ek sashakat hastakshar haiN vo.
thanks