मंगलवार, 5 अगस्त 2008

कविताएं

योगेंद्र कृष्णा की कविताएं


कम पड़ रहीं बारूदें

आसान नहीं था
शवों को गिनना
मुकम्मल शवों को
ढोया जा रहा था
पर जिनके चिथड़े उड़ चुके थे
वे मरने के बाद भी
मृतकों में शुमार नहीं थे

किसी हवाई जहाज दुर्घटना
या महामारी ने
नहीं लीं उनकी जानें
नहीं मरे वे भूख से

मारे गए क्योंकि
सहमे डरे नहीं थे वे
वे नंगे पांव नंगे हाथ
लड़ रहे थे
अपने समय के
सबसे बड़ झूठ से

शवों की गिनती जरूरी थी
कि समय रहते
पता लगाया जा सके
कितने लोगों ने
झूठ के विरोध में
कितने सच बोये
कितने कंधों ने
कितने शव ढोये

ताकि वे जान सकें
कि कल और कितनी
बारूदों की जरूरत
उन्हें पड़ सकती है

वे माहिर थे
आंकड़ों के इस खेल में
बड़े हिसाब से लगाते थे
बारूदी सुरंग
इसलिए कि
पथरीले अनगढ़ सच की तुलना में
बहुत कम थीं
बारूदें इस प्रदेश में...



प्रेम का अनगढ़ शिल्प

काटने से पहले
लकड़हारे ने पूछा
उसकी अंतिम इच्छा क्या है

वृद्ध पेड़ ने कहा
जीवन भर मैंने
किसी से कुछ मांगा है क्या
कि आज
बर्बर होते इस समय में
मरने के पहले
अपने लिए कुछ मांगूं

लेकिन
अगर संभव हो
तो मुझे गिरने से बचा लेना
आसपास बनी झोपिड़यों पर
श्मशान में
किसी की चिता सजा देना
पर मेरी लकड़ियों को
हवनकुंड की आग से बचा लेना
बचा लेना मुझे
आतंकवादियों के हाथ से
किसी अनर्गल कर्मकांड से

मेरी शाख पर बने
बया के उस घोंसले को
तो जरूर बचा लेना
युगल प्रेमियों ने
खींच दी हैं मेरे खुरदरे तन पर
कुछ आड़ी तिरछी रेखाएं
बड़ी उम्मीद से
मेरी बाहों में लिपटी हैं
कुछ कोमल लताएं भी

हो सके तो बचा लेना
इस उम्मीद को
प्रेम की अनगढ़ इस भाषा
इस शिल्प को
मैंने अब तक
बचाए रखा है इन्हें
प्रचंड हवाओं
बारिश और तपिश से
नैसर्गिक मेरा नाता है इनसे
लेकिन डरता हूं तुमसे

आदमी हो
कर दोगे एक साथ
कई-कई हत्याएं
कई-कई हिंसाएं
कई-कई आतंक

और पता भी नहीं होगा तुम्हें
तुम तो
किसी के इशारे पर
काट रहे होगे
सिर्फ एक पेड़...




मर्द की मूंछ

सपने में एक रात
गांव-गांव के बीच
दीवारों को गिराता
वह
विश्वग्राम की संकल्पना को
साकार कर रहा था...

सभी गांव शहर और देश
सिमट कर एक हो रहे थे
और वह
अपनी ही बनाई सड़कों पर
तेज रफ्तार
आगे बढ़ रहा था...

तभी
पीछे से
जैसे किसी ने आवाज दी
मुड़कर देखा
बहुत पीछे
एक नंगी देह औरत
अपने सफेद-पुते चेहरे ढोती
सड़कों पर चलाई जा रही थी-
जैसे गायें या भैंसे चलाई जाती हैं-
पीछे सारा गांव था
मर्द थे
जो अपनी मूंछें
औरत की नंगी देह में
उगी देखना चाहते थे

सड़कों के किनारे
दोनों तरफ खड़ी औरतें
मजबूर थीं
उस नंगी औरत की देह में उगी
अपने मर्दों की
मूंछ देखने को

नंगी औरत
जिस सड़क पर चल रही थी
हमारी सड़क की तरह
विश्वग्राम की ओर
नहीं जाती थी
एक बियाबान में
गुम हो जाती थी

उस औरत पर
ढाए गए जुल्म की कहानी
विश्वग्राम तक आने वाली
सड़कों से चल कर
एक दिन तड़के
हाईटेक मीडिया की
सुर्खियों में आईं
और एक ग्राम में सिमटे
नींद के हाशिए पर
लेटे-अधलेटे
नंगे-अधनंगे
संपूर्ण विश्व ने
इस हादसे को
सूरज निकलने के पहले
सुबह की पहली चाय के साथ
सुड़क ली

सूरज निकलने तक
यदि उन्हें याद रह गए हैं
तो बस
आज के शेयर बाजारों के भाव
उनके उतार-चढ़ाव
और कुछ बहुमूल्य धातुओं
की बढ़ती चमक से झांकते
अपने भविष्य के सपने
जो उन्हें
बहुत कुछ दे सकते हैं

बहुत पीछे छूट गई
वह नंगी सफेद-पुती औरत
उन्हें क्या दे सकती है

उसकी नग्नता भी
तो दरअसल
उन्हीं की है



पूर्वजों के गर्भ में ठहरा समय

मैं तुम्हें
अपने हिस्से का आकाश
अपनी नदी के दोनों पाट सौंपता हूं
दो पाटों के बीच का
अनंत विस्तार भी तुम्हारा है

मैं तो सिर्फ
इस पाट से उस पाट तक
अनंत इस विस्तार में
शांत उदात्त लहरों के साथ
डूबना उतराना चाहता हूं
तुम्हारी आंखों की नदी के बीच
कुछ लम्हा ठहर जाना चाहता हूं
तुम्हारी जिज्ञासा, सहज कौतुहल बन
उस पाट का स्पर्श कर
इस पाट तक लौट आना चाहता हूं
बहना चाहता हूं
तुम्हारे मन-प्रांतर के कोने-कोने तक
एक नदी बन कर
ले जाना चाहता हूं
मैं तुम्हें
पहाड़ की उन कंदराओं में
जहां होठों से निकले शब्द
संगीत की तरह बजते हैं

मैं नहीं जानता
यह ऋषियों फकीरों की
निरंतर साधना का प्रतिफल है
या तुम्हारे प्यार का
कि मेरे हिस्से का आकाश
पहाड़ और घाटियों का अनवरत संगीत
आज भी सुरक्षित है तुम्हारे लिए

चलो, अच्छा हुआ
इस आकाश और पृथ्वी के बीच
बहुत कुछ देख चुकी आंखों का
अनदेखा जादुई संसार
अब तुम्हारा है

सुदूर गांव से आई
नेह की गुहार लगाती
इस मुनिया के सुख-दुख
की सौगात भी तुम्हारी है
चुन्नू काका के नंगे पांव से
लिपट कर आई
गांव की मिट्टी से
तुम्हारे फर्श पर सज गई अल्पना
अब तुम्हारी है

हमारे पूर्वजों की अस्थियों में
अनजाने सपनों और दुआओं
की सुलगती राख
और उनके गर्भ में
ठहर गए समय का
उफनता ज्वार भी...
तुम्हारा है


अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर। हिन्दी व अंग्रेजी में कविता एवं कहानी लेखन। कहानी, पहल, हंस, कथादेश, वागर्थ, साक्षात्कार, ज्ञानोदय, अक्षरपर्व, पल-प्रतिपल, आउटलुक, आजकल और लोकायत में रचनाएं प्रकाशित। ‘खोई दुनिया का सुराग’ तथा ‘बीत चुके शहर में’ (कविता संग्रह)। ‘गैस चैम्बर के लिए इस तरफ़’ ‘संस्मृतियों में तालस्तॉय’(अनुवाद)। नेट पर “शब्द सृजन” तथा “उर्वर प्रदेश” ब्लाग्स।

सम्पर्क : 82/400, राज वंशी नगर, पटना-800023
दूरभाष : 09835070164
ई-मेल : yogendrakrishna@yahoo.com

3 टिप्‍पणियां:

वर्षा ने कहा…

सारी कविताएं बहुत सुंदर हैं। वृद्ध पेड़ की कविता ख़ासतौर पर। एक बात और...
(एक दिन तड़के,हाईटेक मीडिया की,सुर्खियों में आईं
और एक ग्राम में सिमटे,नींद के हाशिए पर
लेटे-अधलेटे,नंगे-अधनंगे,संपूर्ण विश्व ने
इस हादसे को,सूरज निकलने के पहले,सुबह की पहली चाय के साथ,सुड़क ली)
पहले तो ये बहुत मुश्किल है कि कोई ग़ुमनाम-अधनंगी औरत हाईटेक मीडिया के कैमरे पर अपनी जगह बना पाती है, और जगह मिलनेपर फर्क भी पड़ता है। ऐसी ही वाराणसी से की गई एक ख़बर के बाद सड़क पर रहनेवाली एक औरत के लिए रोटी-कपड़े और छत का जुगाड़ हो गया। और दूसरों की सोच पर भी सकारात्मक फर्क पड़ा। ये कोई मामूली बात नहीं।

शहंशाह आलम ने कहा…

बहुत अच्छी कविताएं पढाने के लिए आपको तथा भाई योगेन्द्र जी को मेरी बधाई। योगेन्द्र जी ने बहुत ही सहज शब्दों में समय के कठोर यथार्थ से सक्षात्कार कराया है। बहुत-बहुत बधाई।

बेनामी ने कहा…

हो सके तो बचा लेना
इस उम्मीद को
प्रेम की अनगढ़ इस भाषा
इस शिल्प को
मैंने अब तक
बचाए रखा है इन्हें
प्रचंड हवाओं
बारिश और तपिश से
Es bachaaye jaane ki aakanksha hi jiwan jiye jaane ka maqsad hai va ek behtar sansaar ki sankalpana bhi---tabhi srijan samrpan ki bhasha se roo-b-roo hoga---"main tumhen/apane hisse ka aakass/apani nadi ke dono pat sounpata hun/do paton ke bich ka anant vistaar tumhaara hai hai----"en panktiyon ke liye vishesh shubhkamnayen.
ranjana shrivastava,siliguri(W.Bengal)