बुधवार, 14 अक्तूबर 2009

हिंदी कहानी



फिर आओगी न
अलका सिन्हा

अब गाड़ी भीतरी सड़क पर आ गई थी। इसी सड़क की दूसरी तरफ- ठीक वहाँ, वो रहा वो मैदान, जहाँ हम खेला करते थे। स्कूल से लौटते ही इस मैदान में आ जमा होते थे। सारी दोपहर, सारी शाम बीत जाती थी, पर हमारे खेल खत्म नहीं होते थे। ''अच्छा तेरी बारी आई तो अब देर हो रही है।'' सब एक-दूसरे को घेर लेते थे। पापा वहाँ उस कोने के मकान से ही हांक लगाते थे, ''जल्दी आओ, रात हो रही है।''
''शीलू... शीलू....।'' कौन पुकार रहा है ? लगा जैसे सड़क ने पहचान लिया था, वही पुकार रही थी- बचपन के नाम से। ''रोको गाड़ी रोको।'' जी किया दो पल इस सड़क से बतिया लूँ। कितने बरस बीत गए यहाँ आए। बस, बचपन ही यहाँ बीता। स्कूल के शैतानियों भरे खट्टे-मीठे दिन। फिर माइक्रो बायजली की पढ़ाई के लिए झांसी चली गई। होस्टल में रही। फिर वहीं नौकरी लग गई, झांसी में। बीच में आना-जाना हुआ मगर इस तरह नहीं। इसबार लम्बी छुट्टी में आ रही हूँ। भास्कर कालेज के सेमिनार में भोपाल गए हैं। हफ्ते भर बाद वे यहीं लौट आएंगे। फिर हम साथ-साथ लौट जाएंगे। वैसे मैके में अकेले ही रुकने का मजा है। तभी तो बीते दिनों में लौटा जा सकता है। वरना वही शीलू, वही चाय, वही पत्नी होने का अहसास ! अरे मैं सिर्फ शीलू होकर जीना चाहती हूँ, शीलू जो अपने गैंग की लीडर थी, जिसकी शरारतों से मोहल्ला परेशान रहता था। रास्ते भर मैं खुद से बतियाती आ रही थी। मगर यहाँ पहुँचकर शब्द मौन हो गए थे, दृश्य धुंधला गए थे। गाड़ी अपनी मंजिल पर आ पहुँची थी। पर सब कितना अनजान लग रहा था।
रात के दस बज चुके थे। कोने का ये मकान एकदम खामोशी से देख रहा था, ''अरे मैं... शीलू, शायद पहचान नहीं पाया।'' पहचानता भी कैसे ! मैं भी कहाँ रह गई पहले सी। साड़ी पहनने पर तो उस उम्र में भी नहीं पहचानी जाती थी। लंबी सांस भरकर द्वार का स्पर्श किया, हल्के से थपथपाया। लगा जैसे लकड़ी का ये दरवाजा थरथरा उठा हो, उसका अंग-अंग चटख गया। उसने अपने दोनों बाहें खोलकर मेरा स्वागत किया।
''बड़ी देर हो गई पहुँचने में। हम तो ताला लगाकर सोने की तैयारी में थे।'' द्वार पर खड़ी भाभी ने आगे बढ़कर गले लगा लिया। मैंने ध्यान से देखा- यह वही दरवाजा था जिसे मैं चुपके से भिड़ाकर बाहर निकल जाती थी और सारी दोपहर ये दरवाजा यों ही भिड़ा रहता था। फिर, मम्मी के जागने से पहले मैं चुपके से भीतर आकर इसे फिर से लगा देती थी। हवा तेज थी और द्वार हिल-हिलकर पुरानी शरारतें दोहरा रहा था।
मेरी निगाहें बच्चों को खोज रही थीं
''सुबह मिलवाऊँगी बच्चों से, '' भाभी ने मिन्नत की, ''अभी जग गए तो सुबह स्कूल नहीं जाएंगे।''
भाभी को खुद की भी चिंता थी। बच्चों को स्कूल भेजकर उन्हें भी अपने बैंक जाना था। कलेजे के भीतर उफनती बाढ़ को बरबस ही काबू में कर लिया। मैं भी थकी थी, सोचा, सुबह ही ठीक रहेगा।
खाने में पालक पनीर के साथ भरवां करेले देखकर माँ की याद ताजा हो गई, ''माँ बड़ी खूबसूरती से करेले भरती थी।''
''ये कैसे भरे हैं ?'' भाभी ने मुझे दुविधा में डाल दिया।
''ये !'' मैंने एक करेला हाथ में उठा लिया, चारों तरफ घुमाकर देखा, ''ये तो भरे ही नहीं हैं भाभी, साबुत ही तल दिए हैं।''
दोनों हँसने लगे। ननद-भाभी का रिश्ता पुराने चावल-सा महकने लगा, ''तुम्हारी ये साड़ी बड़ी सुंदर है भाभी...।''
''ठीक है, तुम ले जाना। काम वाली बाई को मैं कोई और साड़ी दे दूँगी।''
''भाभी... मुझे गुस्सा मत दिलाओ।'' मैंने लाड़ से कहा और कटोरी से दही लेकर भाभी के गाल पर लगा दी, ''होली हय...''
''बस...बस... यही मजाक मुझे नहीं पसंद।''
''पर मुझे तो है...।''
''तू तो बिलकुल नहीं बदली।'' भाई ने कहा तो लगा, मैं सचमुच बचपन के दिनों में लौट आई, ''पर तू बदल गया है भाई !''
''कैसे ?''
''तेरी बीवी अकेली पड़ गई और तू बीच-बचाव करने नहीं आया अब तक।'' मैंने कहा तो भाई ने झूठे गुस्से से एक धौल मेरी पीठ पर जमा दी, ''चल, जल्दी निपटकर सो जा, फिर सुबह सबको काम पर जाना है।''
भाई की बात पर भाभी ने एतराज किया, ''क्यों ? तुम कल छुट्टी ले लो। बहन को कहीं घुमाने नहीं ले जाओगे ?'' भाभी ने मेरा पक्ष लिया तो मुझे अच्छा लगा।
''घुमाने ? अरे यही घुमा देगी मुझे सारा शहर...'' भाई हँसने लगा, ''कौन कहाँ रहता है, गली-मुहल्ले में कौन किसका माई-बाप लगता है, इससे पूछ लो।''
सचमुच पुराने दिन हरे हो गए थे। सारा मुहल्ला मुझे जानता था। बदमाशी तो भाई भी करता था, पर नाम सब मेरा ही पुकारते थे। एक बार हम बबलू के मकान में लगे अमरूद तोड़ रहे थे कि तभी बबलू की मम्मी सामने आ गईं। सब तितर-बितर हो गए। दीवार फांदकर मैं बाहर भागी। जल्दी से घर में घुसी। दरवाजे को कुंडी चढ़ाई और फ्राक बदलकर सो गई। इतनी देर में तो बबलू की मम्मी लगी दरवाजा पीटने।
माँ हैरान, ''शीलू तो घर में बंद गहरी नींद में सो रही है। खुद देख लो बहन जी।'' बेचारी बहन जी चकरा गईं, जिसे कूदते देखा था, वह तो लाल फ्रॉक पहने थी जबकि ये तो आसमानी रंग की स्कर्ट पहने सो रही थी। बेचारी बहन जी शर्मिंदा होकर लौट गईं।
ऐसी कितनी ही कहानियाँ यहाँ के चप्पे-चप्पे में बसी थीं। भाभी ने सोने की व्यवस्था कर दी थी। मेरी इच्छा थी कि मैं भाभी से कहती कि मेरी खाट आँगन में ही बिछा दें, पर उनके चेहरे का उनींदापन देखकर हिम्मत नहीं पड़ी।
''अकेले सोते डर तो नहीं लगेगा ?'' उन्होंने मेरे गाल पर चिकोटी काट ली और दरवाजा भेड़ कर चली गईं। मैंने बत्ती बुझा दी। नींद आँखों से कोसों दूर थी। वह तो हरे रंग की फ्रॉक पहने तीज का झूला झूलने की जिद्द ठाने बैठी थी। आखिर बाबा को जिद्द माननी पड़ी। उन्होंने आँगन में मोटी रस्सी का झूला डाल दिया था।
''शीलू, इसे दांत से पकड़ सकती है ?'' भाई ने झूले की छत से लटकती मोटी रस्सी के टुकड़े की ओर इशारा किया।
''नहीं पकड़ पाई... नहीं पकड़ पाई'' मैं जब तक कुछ समझ पाती, तब तक झूला इस पार से उस पार जा पहुँचा था। अगली पींग पर फिर भाई ने रस्सी की ओर इशारा किया, ''मुँह से पकड़ना है।'' मैंने लपकना चाहा मगर झूला आगे सरक गया। भाई फिर हँसने लगा। मगर कब तक हँसता, अगली झूल में रस्सी मेरे दांतों के बीच थी। पर यह क्या ? झटके से झूला आगे सरका तो लगा मेरा दांत उखड़ जाएगा। मेरा सिर चकरा गया। मैंने रस्सी छोड़ दी। भाई ताली बजाकर हँसने लगा, मगर मैं रोने लगी। मेरे जैसी लड़की रोने लगी...भाई घबरा गया। उसने दौड़कर झूला थाम लिया। मेरे दांतों से खून बह रहा था। रोना सुनकर बाबा आ गए। खून से भरा मेरा मुँह देखकर घबरा उठे, ''ज़रूर तूने तेज का धक्का दिया होगा कि ये गिर जाए।'' बाबा ने गुस्से में भाई पर हाथ तान दिया। भाई घबरा गया। मगर इससे पहले कि बाबा उसे मारते, मैंने रोक लिया, इशारे से बताया कि मैं खुद ही गिर पड़ी। झटपट मुझे डॉक्टर के पास ले जाया गया।
मैंने जीभ दांत के ऊपर फिराई। ऊपर का दांत अब तक नीला है। हम दोनों भाई बहन लड़ते भी खूब थे, पर प्यार भी उतना ही था। एक दूसरे के बिना एक दिन नहीं कटता था। मैं करवट छोड़कर चित्त हो गई। पंखा तेजी से घूम रहा था, फिर भी घुटन लग रही थी। मेरी आदत थी आँगन में सोने की। खुला-सा आँगन मेरा बहुत अपना था। अपना दुख-सुख मैंने इसी आँगन से बांटा था। सभी तारों से मेरी दोस्ती थी। कुछ तारों का तो मैंने नाम भी रख छोड़ा था। दीप्ति मेरी प्रिय तारा सखि का नाम था। मैं दीप्ति से लिने को अकुला गई। अरे, उसे तो अब तक पता लग ही चुका होगा कि मैं यहाँ आई हूँ। वह भी ज़रूर इसी तरह व्याकुल होगी। मैं बिस्तर छोड़कर खिड़की के पास आ गई। बाहर अंधकार था, गहन अंधकार। उसी अंधकार में उभर रहा था अमरूद का पेड़, जिसकी डाल झूम-झूमकर मेरा स्वागत कर रही थी। ''इतने दिनों में क्यों आई, भूल गई हमें ?'' डाल उलाहना दे रही थी। मैंने हाथ बढ़ाकर उसे छूना चाहा, मगर वहाँ तो कुछ भी नहीं था। ''अच्छा, सुबह होने दो, सबसे मिलूँगी।'' मैंने खुद से ही वादा किया।
पानी के तेज शोर से आँख खुली। दिन चढ़ आया था। मैं हड़बड़ाकर उठी। भाभी मेरा नाश्ता हाट केस में रख रही थी, मुझे देखकर मुस्करा दी, ''नींद पूरी हुई या नहीं ?''
''मैके में सोने-जागने का कोई रूटीन नहीं होता। जिम्मेदारी जो भाभी के सिर होती है।'' मैंने अपनी बाहें भाभी के कमर में डाल दीं, ''बंटी जाग गई ?''
''वह तो स्कूल भी गई। दो बार झांक गई, तुम सो रही थी।'' भाभी ने बताया कि वो दो बजे तक लौटेगी।
''मैं भी कोशिश करुँगी कि तीन बजे तक लौट आऊँ। क्या करूँ, महीने के पहले सप्ताह में बैंक में छुट्टी नहीं...।'' भाभी ने मिन्नत की।
''ठीक है, ठीक है। नाश्ते में क्या बनाया है, बताओ।''
''कुछ सरप्राइज भी रहने दो।'' भाभी ने फ्रिज पर रखी चाभी की ओर इशारा किया, ''कहीं गली-मोहल्ले में जाना चाहो तो ताला लगा देना, बंटी के पास दूसरी चाभी है।''
भाभी चली गई। उस घर में मैं अकेली रह गई, जहाँ कभी मेरा एक छत्र राज था। एक पल को लगा, मुझे दुनिया की सारी जायदाद मिल गई है, वो खोया हुआ बचपन मिल गया है, जहाँ मैं सचमुच रानी थी, अपनी मर्जी की मालिक, जिद्दी-शैतान लड़की, चुहल-शरारतों से भरी। मन किया दौड़कर अपनी अलमारी से हरी फ्रॉक निकालकर पहन लूँ और वैसे ही दरवाजा भिड़ाकर गली-मोहल्ले का चक्कर काटा आऊँ। पैर यकबयक अपने कमरे की ओर बढ़ गए। मगर कहाँ, यह तो पहचान में ही आना मुश्किल था। यहाँ डबल बैड सजा था, साफ, धुली चादर बिछा। बाईं ओर वहाँ जहाँ मेरी किताबों की रैक थी, उसकी जगह ड्रेसिंग टेबल सजा था, मेरी कार्टून किताबें लिपिस्टक, नेल पालिश में तब्दील हो चुकी थीं और अलमारी में हरे फ्रॉक, नीली स्कर्ट की जगह साड़ियाँ टंगी थीं।
मन थोड़ा बुझ गया। मुझे याद है, शादी के कुछ पहले मेरी किताबों के रैक हटाने की बात हुई थी।
''इतनी बड़ी हो गई, अभी तक चंदामामा और नंदन पढ़ती है क्या? इसे बाहर निकालने दे।'' भाई झल्ला रहा था।
बात सही थी, मेरी उम्र इन किताबों की नहीं थी और तब मैं वो किताबें पढ़ती भी नहीं थी। मगर उनमें मेरा बचपन सोया था। बाद में तो मैं हॉस्टल चली गई, वरना शायद खुद-ब-खुद दूसरी किताबें इन बचकानी किताबों को खदेड़ देतीं।
यह घर मेरे बचपन का घर था। दुनिया के सबसे खूबसूरत और खुशनुमा अहसास से भरा, जिसे मैं दुनियादारी और जिम्मेदारी के अहसास से बदलने को कतई तैयार नहीं थी। मैंने दोनों हाथों से रैक को थाम लिया था, ''ये रैक यहाँ से नहीं हटेगा। तू चाहे कुछ भी कर ले।''
''मैं अपनी किताबें कहाँ रखूँ ?'' भाई का गुस्सा काफी तेज था।
''खिड़की में सजा ले।''
भाई गुस्से में बढ़ा था रैक की ओर, मगर बाबा ने रोक दिया, ''पड़े रहने दे ये रैक यहीं। आखिर थोड़ा हक तो उसका भी है इस घर पर...।''
हाय ! बाबा ने ये क्या कह दिया ? थोड़ा हक ? बराबर क्यों नहीं ? मैं भीतर-भीतर तड़पती रही, पर किसी से कुछ नहीं कहा। हालांकि रैक भी नहीं हटा। आज समझ रही हूँ, वह थोड़ा-सा हक कितना थोड़ा था। चलो छोड़ो, सच्चाई तो यही है। मैंने बैड के कार्नर में पड़ा डैक ऑन कर दिया। कोई रीमिक्स बजने लगा- पुराना गाना, नए अंदाज में। मैंने जल्दी से स्टॉप का बटन दबाया। पता नहीं आज कल के बच्चों को ये कैसे पसंद आता है। ओरिजनल गानों की सारी खूबसूरती का सत्यानाश पीट दिया है।
मैं कमरे से बाहर निकल आई। बरामदे के दूसरी तरफ सदा से ड्राइंग रूम था। मगर अब यहाँ बरामदे को घेर कर लिविंग रूम बना दिया था, नौ सीटर सोफा, पारदर्शी शीशे की टेबल, जिसके नीचे रखे खूबसूरत बनावटी फूल, ऊपर से भी साफ दिखाई दे रहे थे। मगर यहाँ जगह तो इतनी अधिक नहीं थी। मैंने रेलिंग की तरफ देखा तो पाया कि बाहर का छज्जा तोड़कर इसी में मिला लिया है। आधी दीवार और फिर कांच की खिड़कियाँ।
बराबर में बनी बड़ी सी किचन के दो हिस्से कर दिए थे और खाने की मेज वहीं फिट कर दी थी। मैंने ढका हुआ नाश्ता झांका। आलू के भरवां परांठे, घीये का रायता और साथ में मेवों से सजी खीर। सच में किसी जमाने में यह सब मुझे कितना प्रिय था। मगर उम्र के साथ-साथ पसंद बदल गई थी। अब बहुत तेल-मसाला मुझे नहीं भाता है और मीठा तो बिलकुल ही नहीं। मुझे लगा, ये घर ही नहीं, मैं भी बदल गई हूँ। दोनों अजनबी हो गए हैं। एक-दूसरे का पता पूछ रहे हैं।
बरामदा पार कर दूसरी ओर निकल आई। रात में तो घर की काया-कल्प का कुछ पता नहीं लग रहा था। इस वक्त कुछ टटोल रही थी। मगर हर स्थान मुझे अपरिचय से देख रहा था। माँ-बाबा का कमरा स्टडी में बदल चुका था। सामने की दीवार पर माँ-बाबा की बड़ी-सी तस्वीर लटक रही थी, जिस पर ताजा फूलों की माला सज रही थी। माँ-बाबा रोड एक्सीडेंट में चल बसे, भाई अचानक बड़ा हो गया, सारी जिम्मेदारी भाई पर आ गई। आँखों के कोरों में धुंधलका उतर आया था। मैंने माँ-बाबा की तस्वीर को प्रणाम किया और नज़र दूसरी तरफ घुमा ली।.... सारा कमरा व्यवस्थित और साफ-सुथरा। माँ के लाख समझाने पर भी मैं बहस करने से कहाँ चूकती थी, ''बिखरी पड़ी किताबें जिंदा लगती हैं, सांस लेती... लगता है, इन्हें किसी ने पढ़ा है।''
माँ मेरी दलील के सामने हाथ जोड़ देती। मेरा कमरा, मेरी किताबें हमेशा बिखरी ही रहतीं, बेतरतीब...। मुझे इसी में राहत मिलती थी। पर यहाँ की हर चीज करीने से रखी थी, सजी हुई। लगता ही नहीं, इस घर में कोई बच्च भी रहता है। जिम्मेदारी के अहसास से भरी लाइब्रेरी मेरी ओर देख रही थी। मैं सकपका गई, नहीं-नहीं, यह मेरी जगह नहीं है। मैं उल्टे पांव बाहर लौट आई।
अरे ये क्या ? यहाँ तो आँगन का द्वार था- खुला आसमान नीचे झांकता था, कहाँ गया ? मैं व्याकुल हो गई। आँगन के तीन चौथाई हिस्से में कमरा और एक चौथाई हिस्से में ज्वाइंट टायलट-बाथ ! मैं चकरा गई। भइया, ये तूने क्या कर डाला? मेरा आँगन, मेरे बचपन के साथी- दीप्ति ! मंदाकिनी !! वैभव...!!! मैंने ऊपर की ओर देखा- सफेद छत टुकुर-टुकुर मेरी ओर ताक रही थी, ''किसे ढूंढ रही हो ? हमने तुम्हें पहचाना नहीं ।'' घर के कोने कोने से एक ही आवाज आ रही थी- हमने तुम्हें पहचाना नहीं। मैंने दोनों हाथ कानों पर रख लिए। वहीं कोने में मेरा सूटकेस पड़ा था। मेरी पहचान बस वहीं तक थी। मैंने सूटकेस खोला, बिट्टू-बंटी के कपड़े निकाले और भी जो तोहफे भाई-भाभी के लिए लाई थी, निकाल कर सामने की मेज पर रख दिए।
''तू तो लंबी छुट्टी लेकर आई थी, फिर प्रोग्राम कैसे बदल दिया?'' भाई पूछ रहा था।
''लंबी छुट्टी के चक्कर में ही तो इतने साल आ नहीं सकी, सो अब इतने ही समय के लिए आ गई। वरना इस साल भी नहीं आ पाती..'' मैंने टैक्सी मंगवा ली थी।
''फिर आऊँगी भाभी।'' मैंने भाभी से विदा ली।
बाहर निकलने लगी तो दरवाजे की सिटकनी ने चुन्नी पकड़ ली, ''सच कहो, फिर आओगी न ?'' मैं बिना कोई जवाब दिए टैक्सी में बैठ गई।
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जन्म : 9 नवंबर 1964, भागलपुर, बिहार ।
शिक्षा : एम.बी.ए., एम.ए. पी.जी.डी.टी. केन्द्रीय अनुवाद ब्यूरो, गृह मंत्रालय द्वारा संचालित अनुवाद प्रशिक्षण पाठयक्रम में रजत पदक।
रचना कर्म : 'काल की कोख से', 'मैं ही तो हूँ ये' और 'तेरी रोशनाई होना चाहती हूँ' (कविता संग्रह), 'सुरक्षित पंखों की उड़ान'(कहानी संग्रह)।
कविताएं, कहानियाँ और समीक्षात्मक निबंध प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित और आकाशवाणी एवं दूरदर्शन पर प्रसारित। अनेक कविताओं का पंजाबी और उर्दू में अनुवाद देश-विदेश की पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित। अंतर्राष्ट्रीय लेखन से जुड़ी हिंदी की साहित्यिक पत्रिका 'अक्षरम् संगोष्ठी' की सह-सम्पादक।
सम्मान : कविता संग्रह 'मैं ही तो हूँ ये' पर हिंदी अकादमी, दिल्ली सरकार द्वारा साहित्यिक कृति सम्मान 2002 से सम्मानित। विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ, भागलपुर द्वारा 'कवि रत्न' की उपाधि 2007 ।
संप्रति : एअर इंडिया में कार्यरत।
संपर्क : 371, गुरु अपार्टमेंट्स, प्लॉट नं0 2, सेक्टर-6, द्वारका, नई दिल्ली-110075
फोन : 01128082534(निवास),09910994321(मोबाइल)
ई मेल : alka_writes@yahoo.com

1 टिप्पणी:

Kamal ने कहा…

'Phir Aaogi Naa' us khanabadosh aurat ki kahani hai jo umra bhar apne hi ghar me apna sthan pane ko tadapti rehti hai. Kya stree ko kabhi wah kona hasil hoga jahan wah phir-phir aana chahegi?
Alka Sinha ki yeh kahani stree vimarsh ka ek aisa mudda uthhati hai jis se har stree sajha kerti hai. Badhee!