ममता किरण की चार कविताएँ
(1)स्त्री

स्त्री झाँकती है नदी में
निहारती है अपना चेहरा
सँवारती है अपनी टिकुली, माँग का सिन्दूर
होठों की लाली, हाथों की चूड़ियाँ
भर जाती है रौब से
माँगती है आशीष नदी से
सदा बनी रहे सुहागिन
अपने अन्तिम समय
अपने सागर के हाथों ही
विलीन हो उसका समूचा अस्तित्व इस नदी में।
स्त्री माँगती है नदी से
अनवरत चलने का गुण
पार करना चाहती है
तमाम बाधाओं को
पहुँचना चाहती है अपने गन्तव्य तक।
स्त्री माँगती है नदी से सभ्यता के गुण
वो सभ्यता जो उसके किनारे
जन्मी, पली, बढ़ी और जीवित रही।
स्त्री बसा लेना चाहती है
समूचा का समूचा संसार नदी का
अपने गहरे भीतर
जलाती है दीप आस्था के
नदी में प्रवाहित कर
करती है मंगल कामना सबके लिए
और...
अपने लिए माँगती है
सिर्फ नदी होना।
0
(2) स्मृतियाँ

मेरी माँ की स्मृतियों में कैद है
आँगन और छत वाला घर
आँगन में पली गाय
गाय का चारा सानी करती दादी
पूरे आसमान तले छत पर
साथ सोता पूरा परिवार
चाँद तारों की बातें
पड़ोस का मोहन
बादलों का उमड़ना-घुमड़ना
दरवाजे पर बाबा का बैठना।
जबकि मेरी स्मृतियों में
दो कमरों का सींखचों वाला घर
न आँगन न छत
न चाँद न तारे
न दादी न बाबा
न आस न पड़ोस
हर समय कैद
और हाँ...
वो क्रेच वाली आंटी
जो हम बच्चों को अक्सर डपटती।
0
(3) जन्म लूँ

जन्म लूँ यदि मैं पक्षी बन
चिड़ियाँ बन चहकूँ तुम्हारी शाख पर
आँगन-आँगन जाऊँ, कूदूँ, फुदकूँ
वो जो एक वृद्ध जोड़ा कमरे से निहारे मुझे
तो उनको रिझाऊँ, पास बुलाऊँ
वो मुझे दाना चुगायें, मैं उनकी दोस्त बन जाऊँ।
जन्म लूँ यदि मैं फूल बन
खुशबू बन महकूँ
प्रार्थना बन करबद्ध हो जाऊँ
अर्चना बन अर्पित हो जाऊँ
शान्ति बन निवेदित हो जाऊँ
बदल दूँ गोलियों का रास्ता
सीमा पर खिल-खिल जाऊँ।
जन्म लूँ यदि मैं अन्न बन
फसल बन लहलहाऊँ खेतों में
खुशी से भर भर जाए किसान
भूख से न मरे कोई
सब का भर दूँ पेट।
जन्म लूँ यदि मैं मेघ बन
सूखी धरती पर बरस जाऊँ
अपने अस्तित्व से भर दूँ
नदियों, पोखरों, झीलों को
न भटकना पड़े रेगिस्तान में
औरतों और पशुओं को
तृप्त कर जाऊँ उसकी प्यास को
बरसूँ तो खूब बरसूँ
दु:ख से व्याकुल अखियों से बरस जाऊँ
हर्षित कर उदास मनों को।
जन्म लूँ यदि मैं अग्नि बन
तो हे ईश्वर सिर्फ़ इतना करना
न भटकाना मेरा रास्ता
हवन की वेदी पर प्रज्जवलित हो जाऊँ
भटके लोगों की राह बन जाऊँ
अँधेरे को भेद रोशनी बन फैलूँ
नफ़रत को छोड़ प्यार का पैगाम बनूँ
बुझे चूल्हों की आँच बन जाऊँ।
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(4) वृक्ष था हरा भरा

वृक्ष था हरा-भरा
फैली थी उसकी बाँहें
उन बाहों में उगे थे
रेशमी मुलायम नरम नाजुक नन्हें से फूल
उसके कोटर में रहते थे
रूई जैसे प्यारे प्यारे फाहे
उसकी गोद में खेलते थे
छोटे छोटे बच्चे
उसकी छांव में सुस्ताते थे पंथी
उसकी चौखट पर विसर्जित करते थे लोग
अपने अपने देवी देवता
पति की मंगल कामना करती
सुहागिनों को आशीषता था
कितना कुछ करता था सबके लिए
वृक्ष था हरा भरा।
पर कभी-कभी
कहता था वृक्ष धीरे से
फाहे पर लगते उड़ जाते हैं
बच्चे बड़े होकर नापते हैं
अपनी अपनी सड़कें
पंथी सुस्ता कर चले जाते हैं
बहुएँ आशीष लेकर
मगन हो जाती हैं अपनी अपनी गृहस्थी में
मेरी सुध कोई नहीं लेता
मैं बूढ़ा हो गया हूँ
कमज़ोर हो गया हूँ
कब भरभरा कर टूट जाएँ
ये बूढ़ी हड्डियाँ
पता नहीं
तुम सबसे करता हूँ एक निवेदन
एक बार उसी तरह
इकट्ठा हो जाओ
मेरे आँगन में
जी भरकर देख तो लूँ।
0
समकालीन हिंदी कविता में एक उभरती हुई कवयित्री। हिंदी की अनेक पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं, लेख, साक्षात्कार, पुस्तक समीक्षाएं प्रकाशित। रेडियो, दूरदर्शन तथा निजी टी वी चैनलों पर कविताओं का प्रसारण। अखिल भारतीय कवि सम्मेलनों एवं मुशायरों में शिरकत। अंतर्जाल पर हिंदी की अनेक वेब पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित। इसके अतिरिक्त रेडियो-दूरदर्शन के लिए डाक्यूमेंटरी लेखन। दूरदर्शन की एक डाक्यूमेटरी के लिए अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित। आकाशवाणी के समाचार सेवा प्रभाग में समाचार वाचिका तथा विदेश प्रसारण सेवा में उदघोषिका, आकाशवाणी की राष्ट्रीय प्रसारण सेवा में कार्यक्रम प्रस्तोता(अनुबंध के आधार पर)। ''मसि कागद'' पत्रिका के युवा विशेषांक का संपादन।
संपर्क : के-210, सरोजनी नगर, नई दिल्ली-110023
दूरभाष : 09891384919(मोबाइल)
ई मेल : mamtakiran9@gmail.com
(1)स्त्री

स्त्री झाँकती है नदी में
निहारती है अपना चेहरा
सँवारती है अपनी टिकुली, माँग का सिन्दूर
होठों की लाली, हाथों की चूड़ियाँ
भर जाती है रौब से
माँगती है आशीष नदी से
सदा बनी रहे सुहागिन
अपने अन्तिम समय
अपने सागर के हाथों ही
विलीन हो उसका समूचा अस्तित्व इस नदी में।
स्त्री माँगती है नदी से
अनवरत चलने का गुण
पार करना चाहती है
तमाम बाधाओं को
पहुँचना चाहती है अपने गन्तव्य तक।
स्त्री माँगती है नदी से सभ्यता के गुण
वो सभ्यता जो उसके किनारे
जन्मी, पली, बढ़ी और जीवित रही।
स्त्री बसा लेना चाहती है
समूचा का समूचा संसार नदी का
अपने गहरे भीतर
जलाती है दीप आस्था के
नदी में प्रवाहित कर
करती है मंगल कामना सबके लिए
और...
अपने लिए माँगती है
सिर्फ नदी होना।
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(2) स्मृतियाँ

मेरी माँ की स्मृतियों में कैद है
आँगन और छत वाला घर
आँगन में पली गाय
गाय का चारा सानी करती दादी
पूरे आसमान तले छत पर
साथ सोता पूरा परिवार
चाँद तारों की बातें
पड़ोस का मोहन
बादलों का उमड़ना-घुमड़ना
दरवाजे पर बाबा का बैठना।
जबकि मेरी स्मृतियों में
दो कमरों का सींखचों वाला घर
न आँगन न छत
न चाँद न तारे
न दादी न बाबा
न आस न पड़ोस
हर समय कैद
और हाँ...
वो क्रेच वाली आंटी
जो हम बच्चों को अक्सर डपटती।
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(3) जन्म लूँ

जन्म लूँ यदि मैं पक्षी बन
चिड़ियाँ बन चहकूँ तुम्हारी शाख पर
आँगन-आँगन जाऊँ, कूदूँ, फुदकूँ
वो जो एक वृद्ध जोड़ा कमरे से निहारे मुझे
तो उनको रिझाऊँ, पास बुलाऊँ
वो मुझे दाना चुगायें, मैं उनकी दोस्त बन जाऊँ।
जन्म लूँ यदि मैं फूल बन
खुशबू बन महकूँ
प्रार्थना बन करबद्ध हो जाऊँ
अर्चना बन अर्पित हो जाऊँ
शान्ति बन निवेदित हो जाऊँ
बदल दूँ गोलियों का रास्ता
सीमा पर खिल-खिल जाऊँ।
जन्म लूँ यदि मैं अन्न बन
फसल बन लहलहाऊँ खेतों में
खुशी से भर भर जाए किसान
भूख से न मरे कोई
सब का भर दूँ पेट।
जन्म लूँ यदि मैं मेघ बन
सूखी धरती पर बरस जाऊँ
अपने अस्तित्व से भर दूँ
नदियों, पोखरों, झीलों को
न भटकना पड़े रेगिस्तान में
औरतों और पशुओं को
तृप्त कर जाऊँ उसकी प्यास को
बरसूँ तो खूब बरसूँ
दु:ख से व्याकुल अखियों से बरस जाऊँ
हर्षित कर उदास मनों को।
जन्म लूँ यदि मैं अग्नि बन
तो हे ईश्वर सिर्फ़ इतना करना
न भटकाना मेरा रास्ता
हवन की वेदी पर प्रज्जवलित हो जाऊँ
भटके लोगों की राह बन जाऊँ
अँधेरे को भेद रोशनी बन फैलूँ
नफ़रत को छोड़ प्यार का पैगाम बनूँ
बुझे चूल्हों की आँच बन जाऊँ।
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(4) वृक्ष था हरा भरा

वृक्ष था हरा-भरा
फैली थी उसकी बाँहें
उन बाहों में उगे थे
रेशमी मुलायम नरम नाजुक नन्हें से फूल
उसके कोटर में रहते थे
रूई जैसे प्यारे प्यारे फाहे
उसकी गोद में खेलते थे
छोटे छोटे बच्चे
उसकी छांव में सुस्ताते थे पंथी
उसकी चौखट पर विसर्जित करते थे लोग
अपने अपने देवी देवता
पति की मंगल कामना करती
सुहागिनों को आशीषता था
कितना कुछ करता था सबके लिए
वृक्ष था हरा भरा।
पर कभी-कभी
कहता था वृक्ष धीरे से
फाहे पर लगते उड़ जाते हैं
बच्चे बड़े होकर नापते हैं
अपनी अपनी सड़कें
पंथी सुस्ता कर चले जाते हैं
बहुएँ आशीष लेकर
मगन हो जाती हैं अपनी अपनी गृहस्थी में
मेरी सुध कोई नहीं लेता
मैं बूढ़ा हो गया हूँ
कमज़ोर हो गया हूँ
कब भरभरा कर टूट जाएँ
ये बूढ़ी हड्डियाँ
पता नहीं
तुम सबसे करता हूँ एक निवेदन
एक बार उसी तरह
इकट्ठा हो जाओ
मेरे आँगन में
जी भरकर देख तो लूँ।
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संपर्क : के-210, सरोजनी नगर, नई दिल्ली-110023
दूरभाष : 09891384919(मोबाइल)
ई मेल : mamtakiran9@gmail.com
19 टिप्पणियां:
बहुत ही सुन्दर कविताएं.
बधाई
चन्देल
मानविय संवेदनाओं विशेषकर नारी मन के बारीक से बारीक तंतुओं पर एक अनूठी पकड़ रखने वाली ममता किरण को को प्रकृति के माध्यम से अपनी बात कहने में महारत हासिल है. उनकी कई कविताओं व गीतों-गज़लों का रस मैं गोष्ठियों पुस्तकों या ऑनलाइन लेखन में ले चूका हूँ. उनके काव्य में सुन्दरता व संवेदना का एक अद्भुत सम्मिश्रण है.
premchand sahajwala
ममता किरण की 'स्त्री, स्मृतियाँ ,जन्म लूँ ,वृक्ष था हरा भरा' चारों कविताएँ बेजोड़ हैं । जो कविता का नाम सुनकर बिदकते हैं , उन्हें ये कविताएं एक ताज़गी का अहसास कराएँगी ।
रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
लोक की गंध से अनुभूतियों को महका देने में सक्षम अद्भुत कविताएँ।
पहली बार पढा पर प्रभावित करती हैं कवितायें
शुभकामनाएँ
HAR KAVITA MEIN SURAJ KEE PAHLI
KIRAN KAA SAA AABHAAS HOTA.MAMTA
JEE KO BADHAAEE.
बहुत सुन्दर, मन को छूती कविताएँ..
बधाई!
ममता किरण की कविता शिल्प में अधुनातन और समकालीन कविता पर सार्थक हस्तक्षेप करती प्रतीत तो होती है पर इस कठिन समय के दुर्गम कविता-प्रदेश में टीले -टप्पर, धूल-गर्द भरे रास्ते इतने सहज और सुगम नहीं कि मात्र आशाओं-इच्छाओं के तार से शब्द को आकार दे दिया जाय बल्कि एक अंदरुनी जद्योजहद भी चाहिये समय कें काँटे को कलम से दर्ज करने के लिये। बधाई,संभावना की बेहतर तलाश में बुनी कविताओं के लिये किरण जी को।
mamta kiran jee ki sabhii kavitaen padi achchhi lagin meri ore se badhai svikaren
ashok andrey
ममता किरण की कवितायेँ स्त्री के मर्म को नदी के संघर्ष के माध्यम से या माँकी ममता मई दिन चर्या से सहज रूप में प्रस्तुत करती हैं.चारोंकवितायेँ सुन्दर और पठनीय हैं.बधाई.नीरव जी ने चुनाव अच्छा किया है इस के लिए धन्यवाद .
mamtaji ki ye kavitayen maulik anubhuti ki marmik abhivyakti hain..prabhavit to karti hi hain,un ujaalon ki oar ishara bhi karti hain jahan hamara hamaara kuchh atmiya rakha hua hai
ममता किरण की कविताओं में भरपूर संभावनाएं हैं। उन्हें मेरी शुभकामनाएं।
ममता जी की चारों कवितायेँ विलक्षण हैं...उनके पास सटीक शब्द और बहुत कोमल भाव हैं जो उनकी रचनाओं में स्पष्ट दिखाई देते हैं....मानव मन खास तौर पर स्त्री मन की चितेरी इस कव्येत्री की जितनी प्रशंशा की जाये कम है...बहुत बहुत शुक्रिया आपका उनकी रचनाएँ पढ़वाने का...
नीरज
mamta kiranji ki kavitaen dil ko chhuti hain.. inki goonj der tak aur door tak saath chalti hai...SHAJAR
ममता किरण की कविताएँ सचमुच ममता की किरण जैसी हैं। स्त्री, जन्म लूँ, वृक्ष और स्मृतियाँ- इन चारों कविताओं में कवियित्री की ममता और मर्मस्पर्शी भावुकता का अहसास होता है। ममता जी बिना बौद्धिकता का आवरण रचे सीधे-सरल शब्दों में अपनी बात कहती हैं और यही उनकी कविता को ख़ास बनाती है। देखा जाए तो उनकी कविताएँ एक स्त्री की कविताएँ तो है ही, हम सबकी भी हैं, क्योंकि उनमें हम सबकी छोटी-छोटी ख्वाहिशें अंगड़ाइयाँ ले रही हैं। "स्त्री" कविता की ये पंक्तियाँ तो अपने-आप में हिन्दुस्तानी स्त्रियों का पूरा आईना हैं- "स्त्री झाँकती है नदी में
निहारती है अपना चेहरा
सँवारती है अपनी टिकुली, माँग का सिन्दूर
होठों की लाली, हाथों की चूड़ियाँ
भर जाती है रौब से।"
इसी तरह "स्मृतियाँ" कविता हमें सोचने को मजबूर करती है कि सभ्यता की रेस में हम कहीं पिछड़ते तो नहीं जा रहे हैं। विकास ज़रूरी है, लेकिन क्या इसके लिए हमें प्रकृति से अपना नाता पूरी तरह तोड़ लेना होगा, पूरी तरह मशीन बन जाना होगा? "जन्म लूँ" कविता हमारी निर्मम महत्वाकांक्षाओं को एक मासूम-सा जवाब है। इसी तरह "वृक्ष था हरा-भरा" पढ़कर भी मन कुछ गीला-गीला हो उठता है। कंक्रीट के इन जंगलों में रहकर तो वे वृक्ष हमारे लिए इतिहास ही बन चुके हैं, जो ममता जी के हृदय में अब भी हरे-भरे हैं। उन्हें बधाई और शुभकामनाएँ।
ममता किरण जी को पहली बार पढ़ा। स्त्री कविता मन कॊ छू गई। वृक्ष था.... भी बहुत दिनों तक याद रहेगी। ये सारी कविताएँ उनके स्त्री मन के विस्तार की कविताएँ हैं जो अपने परिवेश से पूरी तरह जुड़ा है। ममता जी आपको बहुत बहुत बधाई। इतनी सुन्दर कविताएँ ममता जी !
सादर
इला
kavitaye bahut acchi lagi.
nisha
Mom, Great poems .. I love u sooooooo much. poem "Janm loon" is extremely nice .. vo kehte hai na kalam todh dena .. bus appne isme kalam tod di hai.
keep writng!! Im so proud of you.
सभी कविताएं दिल को छूती हुई निकलती है , ’स्त्री’ विशेष रूप से :
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स्त्री माँगती है नदी से सभ्यता के गुण
वो सभ्यता जो उसके किनारे
जन्मी, पली, बढ़ी और जीवित रही।
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बहुत सुन्दर ..
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